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UP Assembly Election: स्वामी का सपा में शामिल होना और भाजपा में मची भगदड़ का इशारा किस ओर? क्या यूपी में भाजपा कमजोर पड़ रही
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स्वामी प्रसाद मौर्य और अखिलेश यादव
- फोटो :
अखिलेश के ट्विटर अकाउंट से
विस्तार
भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ चुके स्वामी प्रसाद मौर्य शुक्रवार को समाजवादी पार्टी की साइकिल पर सवार हो गए। उनके साथ आठ और बागी विधायक भी सपा में शामिल हुए। इन नेताओं ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में सपा की सदस्यता ली।योगी कैबिनेट में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी के साथ भगवती सागर, विनय शाक्य, रोशनलाल वर्मा, मुकेश वर्मा, बृजेश कुमार प्रजापति, चौधरी अमरसिंह सपा में शामिल हुए। योगी कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले दारा सिंह चौहान 16 जनवरी को सपा की सदस्यता ले सकते हैं। भाजपा छोड़ने वाले सभी नेताओं के इस्तीफे एक ही जैसे लिखे गए हैं। सभी मंत्रियों और विधायकों ने भाजपा पर दलितों और पिछड़ों की उपेक्षा का आरोप लगाया है।
सपा देगी टिकट
माना जा रहा है कि भाजपा से आए सभी नेताओं को सपा टिकट देगी। हालांकि, ऐसे उम्मीदवारों का ट्रैक रिकॉर्ड और जीत का प्रदर्शन मिला-जुला रहा है जो एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों के टिकट पर चुनाव लड़े हैं। 2020 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जहां दूसरी पार्टियों से आए अधिकांश नेता भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते, वहीं बीते साल बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 19 बागी विधायकों में से केवल छह ही जीत दर्ज कर सके।
मुकेश वर्मा ने दिया इस्तीफा
- फोटो :
अमर उजाला
किस ओर इशारा?
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि दो तरह के नेता भाजपा छोड़ रहे हैं, एक जिन्हें लगता है कि पार्टी हारने वाली है और दूसरे जिन्हें लगता है उन्हें टिकट से वंचित कर दिया जाएगा। औसतन भाजपा सत्ता विरोधी लहर को दूर करने के लिए 25 से 35 प्रतिशत विधायकों को टिकट देने से इनकार करती है। पार्टी इस बार भी कुछ ऐसा ही करने का मन बना चुकी है। हाल ही में मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में 42 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके मन में विधायकों के खिलाफ गुस्सा है।
धारणा बनाने की कोशिश
इस बारे में उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी का कहना है कि चुनाव के समय इस तरह ओबीसी और दलित नेता भाजपा छोड़कर सपा में जाकर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि भाजपा अगड़ी जातियों की पार्टी है और भाजपा में पिछड़ी जातियों के हितों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। इस तरह भाजपा के लिए एक धारणा बनाने की कोशिश हुई है।
कमोबेश ऐसा ही आरोप लगाया है कि भाजपा छोड़ने वाले फिरोजाबाद के शिकोहाबाद से भाजपा के विधायक डा मुकेश वर्मा ने। निषाद समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मुकेश वर्मा ने अपने त्याग पत्र में कहा कि सरकार ने पिछले पांच सालों में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं पर कोई ध्यान नहीं दिया और उन्हें उनका उचित सम्मान नहीं दिया गया।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि दो तरह के नेता भाजपा छोड़ रहे हैं, एक जिन्हें लगता है कि पार्टी हारने वाली है और दूसरे जिन्हें लगता है उन्हें टिकट से वंचित कर दिया जाएगा। औसतन भाजपा सत्ता विरोधी लहर को दूर करने के लिए 25 से 35 प्रतिशत विधायकों को टिकट देने से इनकार करती है। पार्टी इस बार भी कुछ ऐसा ही करने का मन बना चुकी है। हाल ही में मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में 42 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके मन में विधायकों के खिलाफ गुस्सा है।
धारणा बनाने की कोशिश
इस बारे में उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी का कहना है कि चुनाव के समय इस तरह ओबीसी और दलित नेता भाजपा छोड़कर सपा में जाकर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि भाजपा अगड़ी जातियों की पार्टी है और भाजपा में पिछड़ी जातियों के हितों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। इस तरह भाजपा के लिए एक धारणा बनाने की कोशिश हुई है।
कमोबेश ऐसा ही आरोप लगाया है कि भाजपा छोड़ने वाले फिरोजाबाद के शिकोहाबाद से भाजपा के विधायक डा मुकेश वर्मा ने। निषाद समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मुकेश वर्मा ने अपने त्याग पत्र में कहा कि सरकार ने पिछले पांच सालों में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं पर कोई ध्यान नहीं दिया और उन्हें उनका उचित सम्मान नहीं दिया गया।
धर्म सिंह सैनी के साथ स्वामी प्रसाद मौर्य
- फोटो :
ANI
ओबीसी नेताओं का भाजपा से मोहभंग
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक और लेखक अपूर्वानंद बताते हैं भाजपा ने लंबे समय से यह प्रयास किया कि वह सोशल इंजीनियरिंग करे और जो पिछड़ी जातियां हैं उन्हें हिंदुत्व के घेरे में ला सकें। लेकिन अब ओबीसी नेताओं का भाजपा से मोहभंग हुआ है कि उन्हें लगता है कि भाजपा में ब्राह्मणवाद है उसका वर्चस्व ही बना रहेगा, पिछड़ी जातियों को सशक्त होने का एहसास नहीं हुआ।
सपा में जाने से क्या उनका सशक्तिकरण होगा, इसके जवाब में अपूर्वानंद कहते हैं सपा और भाजपा का फर्क यह है कि सपा का नेतृत्व एक पिछड़ी जाति के हाथ में है, जहां अपने समुदाय के लिए कुछ करने के उनके पास मौके ज्यादा हैं। हालांकि सपा ने भी पिछली बार यह गलती की थी उसने दूसरी जातियों को ज्यादा तरजीह नहीं दी, लेकिन ऐसा लग रहा है कि सपा अपनी गलतियों को सुधारेगी और पिछड़ी जातियों को प्रभावी मौके देगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक और लेखक अपूर्वानंद बताते हैं भाजपा ने लंबे समय से यह प्रयास किया कि वह सोशल इंजीनियरिंग करे और जो पिछड़ी जातियां हैं उन्हें हिंदुत्व के घेरे में ला सकें। लेकिन अब ओबीसी नेताओं का भाजपा से मोहभंग हुआ है कि उन्हें लगता है कि भाजपा में ब्राह्मणवाद है उसका वर्चस्व ही बना रहेगा, पिछड़ी जातियों को सशक्त होने का एहसास नहीं हुआ।
सपा में जाने से क्या उनका सशक्तिकरण होगा, इसके जवाब में अपूर्वानंद कहते हैं सपा और भाजपा का फर्क यह है कि सपा का नेतृत्व एक पिछड़ी जाति के हाथ में है, जहां अपने समुदाय के लिए कुछ करने के उनके पास मौके ज्यादा हैं। हालांकि सपा ने भी पिछली बार यह गलती की थी उसने दूसरी जातियों को ज्यादा तरजीह नहीं दी, लेकिन ऐसा लग रहा है कि सपा अपनी गलतियों को सुधारेगी और पिछड़ी जातियों को प्रभावी मौके देगी।
कानपुर मेट्रो में सफर करते पीएम नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ
- फोटो :
Agency
क्या यूपी में भाजपा कमजोर पड़ रही?
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा छोड़ने वाले नेता राज्य में ओबीसी का प्रतिनिधित्व करते हैं और राज्य में सत्ताधारी पार्टी की छवि के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, फिर भी कुछ नेताओं के इस्तीफे से इस बात का अनुमान बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि भाजपा उत्तर प्रदेश में कमजोर पड़ रही है।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी के मुताबिक निश्चित तौर पर ओबीसी नेताओं के पार्टी छोड़ने से भाजपा के खिलाफ और सपा के पक्ष में माहौल बन रहा है। ध्यान देने वाली बात है कि चुनाव में माहौल बड़ी बात होती है। अभी भी कई सर्वे में भाजपा आगे दिखाई दे रही है, लेकिन यदि माहौल इसी तरह का बना रहा तो चुनाव पर इसका गहरा असर दिखाई देगा।
नेताओं को जमीनी हालत का एहसास
उनका कहना है, ‘गैर यादव ओबीसी 2014 से भाजपा के साथ थे और 2019 तक उनके साथ रहे, लेकिन नेताओं को कहीं न कहीं इस बात का आभास हो गया है कि जमीनी हालात क्या है, इसलिए वे सपा में जा रहे हैं क्योंकि उन्हें वहां अपना भविष्य दिखाई दे रहा है।’
नीरजा चौधरी के मुताबिक पिछले साल सितंबर में ही भाजपा के कुछ ओबीसी नेताओं ने उन्हें कथित 'ठाकुर राज' के प्रति अपनी चिंता जताई थी और कहा था कि जनता में यह धारणा बनती जा रही है कि यह सरकार केवल उच्च जातियों की है और ऐसे में हमें ओबीसी वोट बैंक को लेकर बहुत फिक्र हो रही है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भाजपा छोड़ने वाले नेता राज्य में ओबीसी का प्रतिनिधित्व करते हैं और राज्य में सत्ताधारी पार्टी की छवि के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, फिर भी कुछ नेताओं के इस्तीफे से इस बात का अनुमान बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि भाजपा उत्तर प्रदेश में कमजोर पड़ रही है।
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी के मुताबिक निश्चित तौर पर ओबीसी नेताओं के पार्टी छोड़ने से भाजपा के खिलाफ और सपा के पक्ष में माहौल बन रहा है। ध्यान देने वाली बात है कि चुनाव में माहौल बड़ी बात होती है। अभी भी कई सर्वे में भाजपा आगे दिखाई दे रही है, लेकिन यदि माहौल इसी तरह का बना रहा तो चुनाव पर इसका गहरा असर दिखाई देगा।
नेताओं को जमीनी हालत का एहसास
उनका कहना है, ‘गैर यादव ओबीसी 2014 से भाजपा के साथ थे और 2019 तक उनके साथ रहे, लेकिन नेताओं को कहीं न कहीं इस बात का आभास हो गया है कि जमीनी हालात क्या है, इसलिए वे सपा में जा रहे हैं क्योंकि उन्हें वहां अपना भविष्य दिखाई दे रहा है।’
नीरजा चौधरी के मुताबिक पिछले साल सितंबर में ही भाजपा के कुछ ओबीसी नेताओं ने उन्हें कथित 'ठाकुर राज' के प्रति अपनी चिंता जताई थी और कहा था कि जनता में यह धारणा बनती जा रही है कि यह सरकार केवल उच्च जातियों की है और ऐसे में हमें ओबीसी वोट बैंक को लेकर बहुत फिक्र हो रही है।
पीएम मोदी, अमित शाह, सीएम योगी और जेपी नड्डा
- फोटो :
अमर उजाला
भाजपा संकट में लेकिन कोई भी अनुमान लगाना गलत
उनका कहना है कि भाजपा संकट में दिख रही है, लेकिन फिर भी इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि भाजपा पिछड़ जाएगी। पिछले चुनाव में उसने इतनी बढ़त ली थी कि उसके वोट बैंक में एकदम से सेंध नहीं लगेगी। हां, ये जरूर हो सकता है कि उसकी सीटें कुछ कम हो सकती है, क्योंकि इन इस्तीफों ने भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग को एक धक्का जरूर लगाया है।
वे कहती हैं ‘ यह देखना जरूरी है कि भाजपा को लेकर लोगों में नाराजगी है या आक्रोश है। यदि केवल नाराजगी है तो भाजपा के पास इन नाराजगी को दूर करने के कई तरीके हो सकते हैं। पार्टी आखरी वक्त में कोई ऐसा दांव चल सकती है, जिससे लोगों की नाराजगी दूर की जा सके। जैसे मकर संक्रांति के मौके पर आज यानी शुक्रवार को सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दलितों के घर भोजन किया, पार्टी इसी तरह के कई और कदम उठा सकती है, जिससे गैर यादव ओबीसी वोटर्स को मनाया जा सके।
नए गैर यादव ओबीसी चेहरे ला सकती है भाजपा
नीरजा चौधरी कहती हैं कि यदि ओबीसी समुदाय के यदि कुछ नेता सपा में गए हैं तो भाजपा ओबीसी समुदाय के नए चेहरों पर दांव चल सकती है। भाजपा के पास बड़ी मशीनरी है। वर्चुअल कैंपेन में भाजपा की ज्यादा तैयारी और उसका प्रभाव भी ज्यादा है। इसलिए संकट के बावजूद भाजपा को कम आंकना गलत साबित हो सकता है। याद रखिए पार्टी ने नोटबंदी के कुछ महीनों के भीतर यूपी विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व जीत हासिल की थी और 2019 के संसदीय चुनावों में भी जबरदस्त प्रदर्शन किया था।
उनका कहना है कि भाजपा संकट में दिख रही है, लेकिन फिर भी इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि भाजपा पिछड़ जाएगी। पिछले चुनाव में उसने इतनी बढ़त ली थी कि उसके वोट बैंक में एकदम से सेंध नहीं लगेगी। हां, ये जरूर हो सकता है कि उसकी सीटें कुछ कम हो सकती है, क्योंकि इन इस्तीफों ने भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग को एक धक्का जरूर लगाया है।
वे कहती हैं ‘ यह देखना जरूरी है कि भाजपा को लेकर लोगों में नाराजगी है या आक्रोश है। यदि केवल नाराजगी है तो भाजपा के पास इन नाराजगी को दूर करने के कई तरीके हो सकते हैं। पार्टी आखरी वक्त में कोई ऐसा दांव चल सकती है, जिससे लोगों की नाराजगी दूर की जा सके। जैसे मकर संक्रांति के मौके पर आज यानी शुक्रवार को सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दलितों के घर भोजन किया, पार्टी इसी तरह के कई और कदम उठा सकती है, जिससे गैर यादव ओबीसी वोटर्स को मनाया जा सके।
नए गैर यादव ओबीसी चेहरे ला सकती है भाजपा
नीरजा चौधरी कहती हैं कि यदि ओबीसी समुदाय के यदि कुछ नेता सपा में गए हैं तो भाजपा ओबीसी समुदाय के नए चेहरों पर दांव चल सकती है। भाजपा के पास बड़ी मशीनरी है। वर्चुअल कैंपेन में भाजपा की ज्यादा तैयारी और उसका प्रभाव भी ज्यादा है। इसलिए संकट के बावजूद भाजपा को कम आंकना गलत साबित हो सकता है। याद रखिए पार्टी ने नोटबंदी के कुछ महीनों के भीतर यूपी विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व जीत हासिल की थी और 2019 के संसदीय चुनावों में भी जबरदस्त प्रदर्शन किया था।