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एससी-एसटी एक्ट पर सरकार ला सकती है अध्यादेश, पलट जाएगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 14 May 2018 05:36 PM IST
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नरेंद्र मोदी अमित शाह (फाइल फोटो)
- फोटो : pti
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अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 (एससी/एसटी एक्ट) पर कई मोर्चों पर घिरी केंद्र सरकार अब बड़ा फैसला लेने वाली है। केंद्र सरकार एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी कर रही है। अध्यादेश के बाद सरकार संसद में इसे विधेयक के रूप में पेश कर सकती है।
सरकार इसे न्यायिक समीक्षा से अलग रखने के लिए संसद के मानसून सत्र में एक विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है। इस बिल के जरिए एससी/एसटी एक्ट को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा। इस अनुसूची में आने के बाद एक्ट को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले पर 16 मई को सुनवाई होनी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार की अपील की है। सरकार का अगला कदम कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। अपील के खारिज होने पर सरकार अध्यादेश के जरिए इस साल मार्च में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट सकती है और पहले के प्रावधानों को अमल में लाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि कोर्ट का काम कानून बनाना नहीं है। यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते सरकार को देशभर में विपक्षी दलों के साथ दलित संगठनों के विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को कमजोर किया जा रहा है।
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सरकार इसे न्यायिक समीक्षा से अलग रखने के लिए संसद के मानसून सत्र में एक विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है। इस बिल के जरिए एससी/एसटी एक्ट को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा। इस अनुसूची में आने के बाद एक्ट को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
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सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले पर 16 मई को सुनवाई होनी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार की अपील की है। सरकार का अगला कदम कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। अपील के खारिज होने पर सरकार अध्यादेश के जरिए इस साल मार्च में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट सकती है और पहले के प्रावधानों को अमल में लाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि कोर्ट का काम कानून बनाना नहीं है। यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते सरकार को देशभर में विपक्षी दलों के साथ दलित संगठनों के विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को कमजोर किया जा रहा है।
SC ने एससी/एसटी एक्ट में बदलाव को सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 3 मई को हुई सुनवाई में एससी-एसटी एक्ट पर 20 मार्च के अपने फैसले को उचित ठहराते हुए उस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक उसके निर्णय के खिलाफ केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक वह रोक के पक्ष में नहीं है।
न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि वह 100 फीसदी एससी-एसटी समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने और दोषियों को दंड दिए जाने के पक्ष में है। इसके मद्देनजर 20 मार्च को इस संबंध में दिशानिर्देश देने से पहले अदालत ने इसके सभी पहलुओं और इससे जुड़े पहले के सभी फैसलों का गहराई से अध्ययन किया था।
सुनवाई के दौरान पीठ ने इस मामले के अग्रिम जमानत के प्रावधान करने के अपने आदेश को सही मानते हुए कहा कि यह जरूरी है। पीठ ने कहा कि इस मामले में अधिकतम 10 साल की सजा का प्रावधान है जबकि न्यूनतम सजा छह महीने है। जब न्यूनतम सजा छह महीने है, तो अग्रिम जमानत का प्रावधान क्यों नहीं होना चाहिए। वह भी तब जबकि गिरफ्तारी के बाद अदालत से जमानत मिल सकती है।
पीठ ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत दायर जिन शिकायतों में ऐसा लगता हो कि वह मनगढ़ंत या फर्जी है, उन मामले में प्रारंभिक जांच की जरूरत है। कुछ ऐसी शिकायतें होती हैं जिनके बारे में पुलिस अधिकारी भी यह महसूस करते हैं कि उनमें दम नहीं है। इस तरह की शिकायतों पर ही प्रांरभिक जांच होनी चाहिए न कि सभी शिकायतों पर।
पीठ ने कहा कि हमने अपने आदेश में प्रारंभिक जांच को आवश्यक नहीं बताया था बल्कि यह कहा था कि प्रारंभिक जांच होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि फिलहाल ऐसा हो रहा है कि सभी मामलों में गिरफ्तारी हो रही है, भले ही पुलिस अधिकारी भी यह महसूस करते हो कि इनमें से कई शिकायतें फर्जी हैं।
न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि वह 100 फीसदी एससी-एसटी समुदाय के अधिकारों की रक्षा करने और दोषियों को दंड दिए जाने के पक्ष में है। इसके मद्देनजर 20 मार्च को इस संबंध में दिशानिर्देश देने से पहले अदालत ने इसके सभी पहलुओं और इससे जुड़े पहले के सभी फैसलों का गहराई से अध्ययन किया था।
सुनवाई के दौरान पीठ ने इस मामले के अग्रिम जमानत के प्रावधान करने के अपने आदेश को सही मानते हुए कहा कि यह जरूरी है। पीठ ने कहा कि इस मामले में अधिकतम 10 साल की सजा का प्रावधान है जबकि न्यूनतम सजा छह महीने है। जब न्यूनतम सजा छह महीने है, तो अग्रिम जमानत का प्रावधान क्यों नहीं होना चाहिए। वह भी तब जबकि गिरफ्तारी के बाद अदालत से जमानत मिल सकती है।
पीठ ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत दायर जिन शिकायतों में ऐसा लगता हो कि वह मनगढ़ंत या फर्जी है, उन मामले में प्रारंभिक जांच की जरूरत है। कुछ ऐसी शिकायतें होती हैं जिनके बारे में पुलिस अधिकारी भी यह महसूस करते हैं कि उनमें दम नहीं है। इस तरह की शिकायतों पर ही प्रांरभिक जांच होनी चाहिए न कि सभी शिकायतों पर।
पीठ ने कहा कि हमने अपने आदेश में प्रारंभिक जांच को आवश्यक नहीं बताया था बल्कि यह कहा था कि प्रारंभिक जांच होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि फिलहाल ऐसा हो रहा है कि सभी मामलों में गिरफ्तारी हो रही है, भले ही पुलिस अधिकारी भी यह महसूस करते हो कि इनमें से कई शिकायतें फर्जी हैं।