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चिंताजनक: जंगलों की अंधाधुंध कटाई से महामारी-जैव-विनाश का खतरा, 2050 तक करीब 2.5 करोड़ किमी नई सड़कें बनेंगी

Fri, 02 Jan 2026 07:27 AM IST
शिवम गर्ग अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली। Published by: शिवम गर्ग Updated Fri, 02 Jan 2026 07:27 AM IST
सार

वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि 2050 तक जैव-विविधता वाले इलाकों में बनने वाली 2.5 करोड़ किमी सड़कें जंगलों के विनाश के साथ नई महामारियों का खतरा बढ़ा सकती हैं।

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Uncontrolled Road Expansion Threatens Forests, Biodiversity and Future Pandemics Study Warns
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : freepik

विस्तार

दुनिया भर में सड़क निर्माण को अब तक विकास की बुनियादी शर्त माना जाता रहा है, लेकिन ताजा वैज्ञानिक अध्ययन चेतावनी दे रहे हैं कि यही सड़कें भविष्य के पर्यावरणीय विनाश और नई महामारियों की नींव भी बन सकती हैं। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया में करीब 2.5 करोड़ किलोमीटर नई पक्की सड़कें बनेंगी, जिनमें से लगभग 90 फीसदी निर्माण जैव-विविधता से भरपूर उष्णकटिबंधीय इलाकों में होगा। वैज्ञानिकों ने अब एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो पहले ही यह संकेत दे सकती है कि कहां सड़कें बनेंगी, कहां जंगल कटेंगे और कहां से इंसानों के लिए नई बीमारियों का खतरा जन्म ले सकता है।

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ऑस्ट्रेलिया की जेम्स कुक यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं के सहयोग से किए गए एक नए अध्ययन के मुताबिक, दुनिया इस समय सड़क निर्माण की अभूतपूर्व दौड़ में शामिल है। आने वाले दशकों में बनने वाली 2.5 करोड़ किलोमीटर नई सड़कों का बड़ा हिस्सा उन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होगा, जहां पृथ्वी की सबसे समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। यही इलाके कार्बन संतुलन, जलवायु नियंत्रण और असंख्य प्रजातियों के अस्तित्व के लिए अहम माने जाते हैं। अमेजन, एशिया-प्रशांत और अफ्रीका के जंगलों में किए गए अध्ययनों से सामने आया है कि जमीन पर मौजूद सड़कों की वास्तविक लंबाई सरकारी आंकड़ों से कई गुना अधिक है। अध्ययन से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर बिल लॉरेंस के अनुसार, ब्राजील के अमेजन, एशिया-प्रशांत क्षेत्र और अन्य उष्णकटिबंधीय इलाकों में नक्शों के जरिये किए गए विश्लेषण बताते हैं कि वास्तविक सड़क नेटवर्क, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सड़कों की तुलना में 13 गुना तक अधिक हो सकता है।
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जंगल से इंसान तक बीमारी का सीधा रास्ता
सबसे चिंताजनक पहलू स्वास्थ्य से जुड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब जंगलों के भीतर सड़कें बनती हैं, तो वे इंसानों को सीधे उन इलाकों तक पहुंचा देती हैं, जहां जंगली जानवरों में पनपने वाले रोग मौजूद होते हैं। यही सड़कें जानवरों से इंसानों में फैलने वाली जूनोटिक बीमारियों का सबसे आसान रास्ता बन जाती हैं। नई तकनीक की मदद से उन क्षेत्रों की भी पहचान संभव है, जहां भविष्य में नई महामारियों की चिंगारी सुलग सकती है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के दौर में यह खतरा और भी गंभीर माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार सड़कें सिर्फ बीमारियों का रास्ता नहीं बनतीं, बल्कि विदेशी खरपतवारों और आक्रामक प्रजातियों के फैलाव का माध्यम भी बनती हैं। ऐसी प्रजातियां अक्सर सड़कों के किनारे तेजी से पनपती हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं। इस लिहाज से यह टूल उन इलाकों को भी चिन्हित कर सकता है, जहां जैव विविधता पर बहुआयामी खतरे मंडरा रहे हैं।
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विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती
तेजी से बढ़ते वैश्विक बुनियादी ढांचे के दौर में वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसे पूर्वानुमान आधारित उपकरण सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। इनके जरिए संवेदनशील उष्णकटिबंधीय इलाकों में समय रहते हस्तक्षेप कर विकास और जंगलों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। प्रोफेसर बिल लॉरेंस के अनुसार सड़कें अब सिर्फ कंक्रीट और डामर की पट्टियां नहीं रहीं, बल्कि वे पर्यावरणीय चेतावनी के संकेत बन चुकी हैं। सवाल यह है कि दुनिया इस चेतावनी को समय रहते समझ पाती है या नहीं।

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