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Shiv Sena: उद्धव ठाकरे के पास शिवसेना वापस पाने के अब तीन रास्ते, ‘तीर-कमान’ की लड़ाई में आगे क्या-क्या होगा?
Mon, 20 Feb 2023 02:02 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Mon, 20 Feb 2023 02:02 PM IST
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उद्धव ठाकरे
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
शिवसेना 'नाम' और 'चुनाव चिह्न' की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया। उद्धव गुट के वकील ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देते हुए इस मामले पर सुनवाई की मांग की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने वकील को इस मामले को कल मेंशन करने के लिए कहा है।हालांकि, उद्धव ठाकरे से पहले ही एकनाथ शिंदे गुट सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुका है। शिंदे गुट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दायर की है। इस याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने के लिए उद्धव गुट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गुहार लगा सकता है। ऐसे में इस मामले में कोई भी फैसला सुनाने से पहले शीर्ष अदालत महाराष्ट्र सरकार की दलील को भी सुने।
चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव से पिता की बनाई पार्टी एक झटके में छिन गई। आयोग के इस फैसले के बाद उद्धव के पास सिर्फ तीन विकल्प ही बचे थे। इसमें पहले विकल्प के जरिए उन्होंने कोशिश भी शुरू कर दी है। मतलब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुके हैं। आइये जानते हैं उद्धव ठाकरे के विकल्पों के बारे में। साथ ही यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या उद्धव वापस शिवसेना को हासिल कर सकेंगे या नहीं?
उद्धव गुट के पास पार्टी बचाने के क्या विकल्प?
1. न्यायालय की चौखट पर दस्तक देना: ये काम आज उद्धव गुट ने कर दिया। चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। अब ये देखना होगा कि कोर्ट इस मामले में क्या फैसला सुनाता है? कोर्ट इस मामले में दोनों गुटों के अलावा महाराष्ट्र सरकार, महाराष्ट्र राजभवन, केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांग सकता है। इसके बाद ही तय होगा कि शिवसेना पर शिंदे गुट का कब्जा बरकरार रहेगा या उद्धव ठाकरे की वापसी होगी। यहां से भी अगर उद्धव गुट को झटका लगेगा तो उनके पास सिर्फ एक ही विकल्प रह जाएगा।
1. न्यायालय की चौखट पर दस्तक देना: ये काम आज उद्धव गुट ने कर दिया। चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ उद्धव गुट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। अब ये देखना होगा कि कोर्ट इस मामले में क्या फैसला सुनाता है? कोर्ट इस मामले में दोनों गुटों के अलावा महाराष्ट्र सरकार, महाराष्ट्र राजभवन, केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांग सकता है। इसके बाद ही तय होगा कि शिवसेना पर शिंदे गुट का कब्जा बरकरार रहेगा या उद्धव ठाकरे की वापसी होगी। यहां से भी अगर उद्धव गुट को झटका लगेगा तो उनके पास सिर्फ एक ही विकल्प रह जाएगा।
2. उद्धव के पास दूसरा विकल्प शिंदे गुट से समझौता करना: इसके लिए वह भावनात्मक रूख अख्तियार कर सकते हैं। पार्टी के नेताओं को वापस अपने पाले में करने के लिए पुरानी दुहाई दे सकते हैं। हालांकि, इसकी गुंजाइश भी कम ही दिखती है। अब शिंदे गुट नहीं चाहेगा कि शिवसेना की कमान वापस ठाकरे परिवार के पास जाए।
3. जयललिता फॉर्मूले पर काम करना: इस रास्ते पर भी उद्धव ने चलना शुरू कर दिया। इसके जरिए भी उद्धव शिवसेना पर फिर से दावा जता सकते हैं। दरअसल, 1987 में एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद उनकी पार्टी एआईएडीएमके दो धड़ो में टूट गई। पार्टी के ज्यादातर विधायक एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ थे। जानकी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन, जयललिता की संगठन पर पकड़ थी।
जयललिता ने 1989 में राज्य में हुए चुनावों में जानकी गुट के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया। जानकी गुट को नौ फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। वहीं, जयललिता गुट को 22 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। पार्टी संगठन पर पकड़ और अपनी क्षमताओं के दम पर जयललिता ने अंतत: एआईएडीमके पर नियंत्रण दोबारा हासिल कर लिया था।
जयललिता ने 1989 में राज्य में हुए चुनावों में जानकी गुट के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया। जानकी गुट को नौ फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। वहीं, जयललिता गुट को 22 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। पार्टी संगठन पर पकड़ और अपनी क्षमताओं के दम पर जयललिता ने अंतत: एआईएडीमके पर नियंत्रण दोबारा हासिल कर लिया था।
आगे की लड़ाई कैसे लड़ेंगे उद्धव?
इसे समझने के लिए हमने महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषक आनंद त्रिपाठी से बात की। उन्होंने कहा, 'अगर कोर्ट की लड़ाई भी ठाकरे हार जाते हैं और शिंदे गुट से बात नहीं बनती है तो उद्धव नए सिरे से राजनीति में उतर सकते हैं। उद्धव ने अभी से कहना भी शुरू कर दिया है कि हम मशाल लेकर उनका मुकाबला करेंगे। ऐसे में उनके सामने नगर निकाय चुनाव सबसे अहम सीढ़ी होगी। वह जनता के बीच जाकर भावनात्मक तौर पर प्रचार कर सकते हैं। पार्टी की लड़ाई और पुरानी बातों को याद दिलाने की कोशिश कर सकते हैं। अगर इस चुनाव में उद्धव गुट को फायदा हुआ तो वह शिवसेना के नाम की लड़ाई के लिए फिर से कोशिश कर सकते हैं। हां, अगर चुनाव के नतीजे उद्धव गुट के पक्ष में नहीं हुए तो जरूर उन्हें और उनके बेटे के राजनीतिक करियर को बड़ा झटका लग सकता है।
इसे समझने के लिए हमने महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषक आनंद त्रिपाठी से बात की। उन्होंने कहा, 'अगर कोर्ट की लड़ाई भी ठाकरे हार जाते हैं और शिंदे गुट से बात नहीं बनती है तो उद्धव नए सिरे से राजनीति में उतर सकते हैं। उद्धव ने अभी से कहना भी शुरू कर दिया है कि हम मशाल लेकर उनका मुकाबला करेंगे। ऐसे में उनके सामने नगर निकाय चुनाव सबसे अहम सीढ़ी होगी। वह जनता के बीच जाकर भावनात्मक तौर पर प्रचार कर सकते हैं। पार्टी की लड़ाई और पुरानी बातों को याद दिलाने की कोशिश कर सकते हैं। अगर इस चुनाव में उद्धव गुट को फायदा हुआ तो वह शिवसेना के नाम की लड़ाई के लिए फिर से कोशिश कर सकते हैं। हां, अगर चुनाव के नतीजे उद्धव गुट के पक्ष में नहीं हुए तो जरूर उन्हें और उनके बेटे के राजनीतिक करियर को बड़ा झटका लग सकता है।