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जेलों में बंद दो तिहाई कैदी एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग से
अमित कुमार निरंजन/ नई दिल्ली
Updated Sun, 06 Nov 2016 04:49 AM IST
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भारत की जिला, राज्य और केन्द्रीय जेलों पर गैर सरकारी संगठन सीएचआरआई के अध्ययन में कई चौंकाने वाली जानकारी मिली हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक 1401 भारतीय जेलों में 31 फीसदी कैदी ओबीसी, 13 फीसदी कैदी एसटी, और 21 फीसदी कैदी एससी वर्ग के हैं। रिपोर्ट से यह भी पता लगा कि एक करोड़ 77 लाख लोगों को कानूनी मदद दी गई, जिसमें से 26 प्रतिशत उत्तर प्रदेश के थे।
कॉमनवेल्थ ह़यूमन राइट्स एनिशिएटिव (सीएचआरआई) ने जिला, राज्य, केंद्रीय जेलों पर एनसीआरबी के 2015 और सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण किया। सीएचआरआई की सदस्य सना दास ने बताया कि वर्ष 2015 में 1584 कैदियों की मौत जेल में ही हुई। भारतीय जेलों में दो तिहाई कैदी विचाराधीन हैं। विश्व में केवल 17 ही ऐसे देश हैं जिनकी आबादी का 67 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विचाराधीन कैदी हैं।
वहीं 70 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं जो10 वीं से कम पढ़े हैं। 31 दिसंबर 2015 तक 1597 महिला कैदी ऐसी थीं जो 1866 बच्चों के साथ जेल में कैद रहीं। जबकि भारतीय जेलों में 19 प्रतिशत कैदी मुस्लिम समुदाय से संबंधित हैं। इसके अलावा छह हजार 185 विदेशी नागरिक भारतीय जेलों में कैद हैं। इनमें सबसे ज्यादा बांग्लादेशी है। जेलों में 4072 कैदी बांग्लादेशी, 589 नेपाल, 417 म्यांमार, 210 पाकिस्तान और 897 कैदी अन्य देशों के हैं।
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सीएचआरआई में कार्यरत राजा बग्गा ने बताया कि 1987 से 30 नवंबर 2014 तक सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट का कानूनी मदद के बारे में अध्ययन किया। इसके हिसाब से उत्तर प्रदेश के 16 हजार 596 लोगों को कस्टडी में कानूनी मदद दी गई। पंजाब में 38 हजार 479, चंडीगढ़ में 5738, उत्तराखंड में 1474, जम्मू व कश्मीर में 365, और हिमाचल प्रदेश के 220 लोगों को कस्टडी के कानूनी मदद मिली। सबसे ज्यादा दिल्ली में एक लाख 10 हजार और मध्यप्रदेश में 55 हजार 940 लोगों को कानूनी मदद मिली। कुल मिलाकर एक करोड़ 77 लाख कानूनी मदद पाने वाले लोगों में से 4 लाख 68 हजार लोग ही सलाखों के पीछे हैं।
गौरतलब है कि एससी, एसटी वर्ग के लोगों, महिलाओं, बच्चों, मानसिक तौर पर बीमार और दिव्यांग वर्ग के लोगों को सरकारी कानूनी मदद मुफ्त में दी जाती है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) न्यायायिक और पुलिस कस्टडी में लोगों को मुफ्त में मदद देती है।
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कॉमनवेल्थ ह़यूमन राइट्स एनिशिएटिव (सीएचआरआई) ने जिला, राज्य, केंद्रीय जेलों पर एनसीआरबी के 2015 और सुप्रीम कोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण किया। सीएचआरआई की सदस्य सना दास ने बताया कि वर्ष 2015 में 1584 कैदियों की मौत जेल में ही हुई। भारतीय जेलों में दो तिहाई कैदी विचाराधीन हैं। विश्व में केवल 17 ही ऐसे देश हैं जिनकी आबादी का 67 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विचाराधीन कैदी हैं।
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वहीं 70 प्रतिशत कैदी ऐसे हैं जो10 वीं से कम पढ़े हैं। 31 दिसंबर 2015 तक 1597 महिला कैदी ऐसी थीं जो 1866 बच्चों के साथ जेल में कैद रहीं। जबकि भारतीय जेलों में 19 प्रतिशत कैदी मुस्लिम समुदाय से संबंधित हैं। इसके अलावा छह हजार 185 विदेशी नागरिक भारतीय जेलों में कैद हैं। इनमें सबसे ज्यादा बांग्लादेशी है। जेलों में 4072 कैदी बांग्लादेशी, 589 नेपाल, 417 म्यांमार, 210 पाकिस्तान और 897 कैदी अन्य देशों के हैं।
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सीएचआरआई में कार्यरत राजा बग्गा ने बताया कि 1987 से 30 नवंबर 2014 तक सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट का कानूनी मदद के बारे में अध्ययन किया। इसके हिसाब से उत्तर प्रदेश के 16 हजार 596 लोगों को कस्टडी में कानूनी मदद दी गई। पंजाब में 38 हजार 479, चंडीगढ़ में 5738, उत्तराखंड में 1474, जम्मू व कश्मीर में 365, और हिमाचल प्रदेश के 220 लोगों को कस्टडी के कानूनी मदद मिली। सबसे ज्यादा दिल्ली में एक लाख 10 हजार और मध्यप्रदेश में 55 हजार 940 लोगों को कानूनी मदद मिली। कुल मिलाकर एक करोड़ 77 लाख कानूनी मदद पाने वाले लोगों में से 4 लाख 68 हजार लोग ही सलाखों के पीछे हैं।
गौरतलब है कि एससी, एसटी वर्ग के लोगों, महिलाओं, बच्चों, मानसिक तौर पर बीमार और दिव्यांग वर्ग के लोगों को सरकारी कानूनी मदद मुफ्त में दी जाती है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) न्यायायिक और पुलिस कस्टडी में लोगों को मुफ्त में मदद देती है।