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Odisha: मनमोहन सिंह से सम्मानित दो आदिवासियों की आंखें नम, कहा- पूर्व PM की मुस्कराहट और शब्द अविस्मरणीय

Sat, 28 Dec 2024 01:48 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भुवनेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भुवनेश्वर Published by: काव्या मिश्रा Updated Sat, 28 Dec 2024 01:48 PM IST
सार

बोलिगुडा गांव के रैला मुदुली और नुआगुडा के चंद्र प्रधानी ने कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह के निधन पर दुख व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द नहीं हैं।
 

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Two Odisha tribals awarded by Manmohan Singh bid tearful adieu news in hindi
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह - फोटो : PTI

विस्तार

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन से पूरे देश में शोक की लहर है। आज दिल्ली के निगम बोध घाट पर राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। हर कोई उन्हें और उनके अहम योगदान को याद कर भावुक है। इसी क्रम में, साल 2012 में बायोडायवर्सिटी संरक्षण के लिए सिंह से सम्मान होने वाले ओडिशा के दो आदिवासियों की आंखें नम दिखीं।

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बोलिगुडा गांव के रैला मुदुली और नुआगुडा के चंद्र प्रधानी ने कहा कि सिंह के निधन पर दुख व्यक्त करने के लिए शब्द काफी नहीं हैं।

गुरुवार रात हुआ निधन
बता दें, पूर्व प्रधानमंत्री का निधन गुरुवार रात दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) में उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण हुआ। उनकी उम्र 92 वर्ष थी। 
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'मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं'
मुदुली और प्रधानी को 2012 में भुवनेश्वर में आयोजित 99वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान मनमोहन सिंह ने बायोडायवर्सिटी संरक्षण के लिए प्रमाण पत्र दिए थे। भुमिया जनजाति के किसान रैला ने कहा, 'जब मैंने शुक्रवार को उनके निधन के बारे में सुना, तो मेरे पास कहने के लिए कुछ शब्द नहीं बचे थे। मैं उस दिन (2012 में) बहुत नर्वस था, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री से पुरस्कार लेना अविस्मरणीय पल था। वह बहुत सौम्य और मृदुभाषी थे और हमें बायोडायवर्सिटी संरक्षण के लिए समर्पण से काम करने के लिए प्रेरित किया।'
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काश मुलाकात के लिए मिलता अधिक समय: प्रधानी
आंखों में आंसू लिए प्रधानी ने मनमोहन सिंह के साथ हुई छोटी सी मुलाकात को याद किया। उन्होंने कहा, 'जब मैं पुरस्कार ले रहा था तो वह मुझे देखकर मुस्कराए। उन्होंने हमें बायोडायवर्सिटी संरक्षण के प्रयासों को जारी रखने के लिए प्रेरित किया। उनके शब्द हमेशा प्रेरणा के रूप में हमारे साथ रहेंगे। काश मुझे उनसे अधिक मुलाकात करने का अवसर मिलता।'


पूर्व पीएम ने समुदाय के प्रयासों की सराहना की थी
ओडिशा के जेयपुर के एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक प्रशांत परिदा ने बताया कि 2012 में कोरापुट को खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण कृषि विरासत प्रणाली (जीआईएएचएस) के रूप में मान्यता दी गई थी। उन्होंने कहा कि रैला और चंद्र ने उस कार्यक्रम में कोरापुट का प्रतिनिधित्व किया था, जहां पूर्व प्रधानमंत्री ने उनके समुदाय के प्रयासों की सराहना की थी। 

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