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प्रशासन की इस घोर लापरवाही से पिता ने खोया अपना बेटा, अब ली ये प्रतिज्ञा

Mon, 01 Oct 2018 03:28 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Updated Mon, 01 Oct 2018 03:28 PM IST
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two mens are giving their service to community by filling potholes on roads
सड़क के गड्ढे भरने वाले सेवानिवृत्त अध्यापक रुपनारायण निरंजन

मुंबई में रहने वाले 48 साल के दादाराव बिलहोरे और उत्तर प्रदेश में रहने वाले 79 साल के रुपनारायण निरंजन अपने आस-पास के इलाकों में स्थित गड्ढों को भरने का काम करते हैं। एक ने बेटे को खोने के बाद यह काम शुरू किया तो दूसरा इसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझकर कर रहा है। वह सड़क पर बने गड्ढों को भरने के साथ ही नागरिक मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करते हैं।

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28 जुलाई, 2015 को दादाराव ने अपने 16 साल के बेटे को एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था। यह हादसा सड़क पर बने गड्ढों की वजह से हुआ था। 15 दिनों के अंदर उन्होंने गड्ढों की वजह से होने वाले ऐसे ही दो मामलों के बारे में पढ़ा। उन्होंने कहा, 'प्रकाश की मौत इसलिए हुई क्योंकि सड़क पर बने गड्ढों को महीनों से नहीं भरा गया था।'
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इसके बाद वह बिलहोरे शहर के जितने गढ्डों को हो सके उन्हें भरने के मिशन पर लग गए। इस कार्य की शुरूआत उन्होंने अपने फल और सब्जी के स्टोर के पास से की। दादाराव ने कहा, 'मुझे लगता है कि किसी और की जिंदगी बचाकर मैं प्रकाश को श्रद्धांजलि दे रहा हूं।' सालों बाद लोगों ने उनका साथ देना शुरू किया। प्रकाश की तीसरी बरसी पर 120 लोग साथ आए और उन्होंने जुहू-विखरोली लिंक रोड पर बनी सड़क के 100 गड्ढों को भर दिया। 
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वहीं बुंदेलखंड क्षेत्र के ललितपुर शहर में रहने वाले निरंजन को रोजाना सड़क साफ करते हुए, गड्ढों को भरते हुए और प्लास्टिक हटाते हुए देखा जा सकता है। 1999 में उन्हें राष्ट्रपति ने अध्यापकों को मिलने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था। एक अध्यापक होने के नाते उन्हें पता चला कि उनके छात्र स्कूल से इसलिए नाता तोड़ रहे हैं क्योंकि सड़क की हालत बहुत खराब है। 


प्राधिकारियों द्वारा इसे नजरअंदाज करने के बाद रुपनारायण ने खुद सड़क को ठीक करने का काम किया। केवल इतना ही नहीं अपनी तनख्वाह से स्कूल में शौचायल और पीने के पानी की व्यवस्था की। सेवानिवृत्त होने के बावजूद वह रोजाना उन स्थानों की तलाश में घूमते हैं जहां सफाई करने और गड्ढे भरे जाने की जरूरत है। इसके बाद भी उन्हें यह नहीं लगता है कि वह समुदाय को अपनी सेवा दे रहे हैं। उनका कहना है कि वह आत्मसंतुष्टि के लिए यह कार्य कर रहे हैं।

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