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मुरली मनोहर जोशी की खरी बात: पेपर लीक पर बोले- घूस देकर नियुक्तियां, इसलिए पर्चा लीक-नकल को गलत नहीं मानते लोग

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Wed, 26 Aug 2026 05:51 AM IST
सार

नीट पेपर लीक को लेकर हुए विवाद, छात्र आंदोलन और नई शिक्षा नीति पर जारी चर्चा के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे (अब इसी मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय है) डॉ मुरली मनोहर जोशी ने अमर उजाला के सवालों पर बेबाकी से जवाब दिए।

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Murali Manohar Joshi Edu Row appointments through bribes people do not view paper leaks and cheating as wrong
मुरली मनोहर जोशी - फोटो : अमर उजाला के साथ खास बातचीत

विस्तार

शिक्षा नीति सिर्फ इस आधार पर बदलना ठीक नहीं कि इसे पूर्ववर्ती सरकार ने बनाया। वाजपेयी सरकार के समय हमने जहां जरूरी लगा, वहीं हस्तक्षेप और सुधार किया। पर्चा लीक और शिक्षा सुधारों पर जारी बहस के बीच पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी से बातचीत के खास अंश...

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इन दिनों शिक्षा-परीक्षा में सुधार की मांग बहुत तेज है। आपका क्या कहना है?

देश जब स्वाधीन हुआ तो शिक्षा व्यवस्था राज्यों का विषय थी। तब केंद्र सरकार का ज्यादा ध्यान आईआईटी, आईआईएम और एआईआईएमएस जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों के गठन पर था। इंदिरा गांधी सत्ता में आईं तो उन्होंने शिक्षा को समवर्ती सूची में डालकर केंद्र के अधीन लाने का कानून बनाया। अब राज्यों को केंद्र की दिशा का अनुसरण करना होता है। लेकिन शिक्षा में  सुधार के लिए केंद्र और राज्य दोनों के  बीच समन्वय होना चाहिए।

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प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के लिए केंद्रीय विद्यालय प्रणाली को कैसा मानते हैं?

यह बहुत अच्छा प्रयोग रहा है। मैंने एक योजना बनाकर एक साथ सौ केंद्रीय विद्यालय खुलवाए। जमीनें राज्य सरकारों ने दी और केंद्र ने स्कूल खोले। इसका पैसा हमने बचा रखा था।

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क्या शिक्षा प्रणाली में समावेशिता का अभाव है?

शिक्षा समावेशी ही नहीं, सर्वग्राही भी होनी चाहिए। शिक्षा निशुल्क होगी, तभी सबके लिए सुलभ होगी। शिक्षा रोजगार से तो जुड़ी हो लेकिन इसका व्यवसायीकरण नहीं होनी चाहिए। शिक्षा का अर्थ संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास है, न कि सिर्फ कामगार पैदा करना। आईएमएफ से फंड लेकर जब शिक्षा में सुधार का सुझाव आया तो मैं उधार लेकर शिक्षा देने के पक्ष में नहीं था। मैंने में शिक्षा खर्च के लिए तीन फीसदी सेस लगाने का सुझाव दिया।

क्या मौजूदा सरकार शिक्षा को लेकर गंभीर है? केंद्र की नई शिक्षा नीति को कैसे देखते हैं?

शिक्षा का संबंध समाज, इतिहास, मूल्य, संस्कृति-सभ्यता, अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति से होना चाहिए। अफसोस किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हमने पहली बार शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दुरुस्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया। कई लोगों ने कहा कि नई शिक्षा नीति बनाइए। मैंने पुरानी शिक्षा नीति देखी तो नई नीति बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। शिक्षा नीति सिर्फ इस आधार पर बदलना ठीक नहीं कि इसे पूर्ववर्ती सरकार ने बनाया है। जहां जरूरी लगा, हस्तक्षेप किया और चीजों को सुधारा। दुनिया का सबसे बड़ा अभियान सर्वशिक्षा अभियान चलाया।

नकल व पर्चा लीक की मूल वजह?

शिक्षा के साथ रोजगार भी जुड़ा है। सिर्फ कॉलेज खोलने और विश्वविद्यालय बनाने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा रोजगार देने वाली भी होनी चाहिए। भारत की शिक्षा पद्धति पांच छह हजार साल पुरानी है। यही  वजह है कि लोग घूस देकर अध्यापक या कोई और नियुक्ति पा लेते हैं। जब लोग देखते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की शिकायतें हैं, हर जगह पैसे का बोलबाला है तो वे यही रास्ता अपनाने में संकोच नहीं करते। कसूर सरकार का है, लोगों का नहीं।

शिक्षा बजट लगातार क्यों कम होता जा रहा है?

शिक्षा अब सरकार की प्राथमिकता नहीं है। सड़क परिवहन का बजट लगातार बढ़ रहा है। निजी उद्योगीकरण प्राथमिकता में है इसलिए पैसा उसमें ज्यादा खर्च हो रहा है। लेकिन सड़क-पुल बनाने के लिए तो इंजीनियर तभी मिलेंगे जब देश में शिक्षा संस्थान होंगे।  सूचना तकनीक के बाद अब आप एआई पर जोर दे रहे हैं लेकिन इसके लिए जरूरी मूल तत्व आपके पास नहीं है। तकनीक हम विदेश से चीन और अमेरिका से ला रहे हैं। बिजली और पानी जरूरत के मुताबिक अपर्याप्त है। विश्व गुरु बनना चाहते हैं लेकिन विकसित देश हमसे छह गुना आगे हैं।

क्या शिक्षा में गड़बड़ी के लिए अंधाधुंध निजीकरण भी जिम्मेदार है?

हमारी प्रस्तावना थी कि देश में करीब दस हजार केंद्रीय विद्यालय खोले जाने चाहिए। साथ ही संविधान में एक संशोधन भी किया जाना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने पड़ोस के स्कूल में ही निशुल्क पढ़ेगा। उच्च शिक्षा का भी व्यसायीकरण नहीं होना चाहिए। शिक्षा में निजी क्षेत्र भी आगे आए और पैसा कमाए। लेकिन कमाई का एक निश्चित अनुपात शिक्षा के विकास में ही लगाए। शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र सिर्फ पैसा बनाने के लिए ही नहीं होने चाहिए।

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