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तीन तलाक के खिलाफ बिगुल फूंकने वाली पहली महिला शाहबानो कौन थीं, जानें उनके संघर्ष की पूरी कहानी

Wed, 31 Jul 2019 06:44 AM IST
Nilesh Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nilesh Kumar Updated Wed, 31 Jul 2019 06:44 AM IST
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शाहबानो - फोटो : अमर उजाला

तीन तलाक पर लोकसभा में तीन बार पास होने के बावजूद राज्यसभा में खारिज हो चुका विधेयक आखिरकार मंगलवार को उच्च सदन में भी पास हो गया। बिल के पक्ष में 99 और विरोध में 84 वोट पड़े। मुस्लिम महिला (शादी पर अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक, 2019 अब कानून का रूप लेगा।

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अब मौखिक, लिखित या किसी भी अन्य माध्यम से तीन तलाक देना कानूनन अपराध होगा। मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में सरकार की यह जीत, मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली महिला शाहबानो की जीत है। 

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शाहबानो आज जीवित होतीं तो बहुत खुश होतीं कि उनके संघर्ष और उनकी लड़ाई आखिरकार जीत के मुकाम पर पहुंच ही गई। आइए विस्तार से जानते हैं कि तीन तलाक के खिलाफ बिगुल फूंकने वाली महिला शाहबानो आखिर कौन थीं, क्या था वह चर्चित मामला और यह लड़ाई कैसे अपने मुकाम तक पहुंची?

ऐसे शुरू हुआ पांच बच्चों की मां का संघर्ष

दरअसल, मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद ने 62 वर्ष की उम्र में तलाक दे दिया था। उनके शौहर ने 1978 में ही तीन तलाक कहते हुए उनको घर से निकाल दिया था।

मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्जी के खिलाफ ऐसा करने को स्वतंत्र था।  शाहबानो उस वक्त पांच बच्चों की मां थीं। बच्चों और अपनी जीविका का कोई साधन न होने से पति से गुजारा लेने के लिए शाह बानो अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल लग गए।

कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, फिर चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म का हो। कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाह बानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। तब भी रूढ़िवादी लोगों को कोर्ट का फैसला मजहब में दखल लगा।

कांग्रेस ने अपने इस कदम को धर्मनिरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाजा मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 में आसानी से पास हो गया।

राजीव गांधी सरकार ने फैसला पलट दिया

उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाकशुदा शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो के पक्ष में आए न्यायालय के फैसले के खिलाफ देश भर में आंदोलन छेड़ दिया। देश के तमाम मुस्लिम संगठनों का कहना था कि न्यायालय उनके पारिवारिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करके उनके अधिकारों का हनन कर रहा है।

कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस्लाम में दखल मानकर केंद्र ने नया कानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू होने से ही रोक दिया गया था और शाहबानो इंसाफ से वंचित रह गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

देश की सर्वोच्च अदालत ने मुस्लिम समाज से जुड़े तीन तलाक को अवैध करार दिया और केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वजह जल्द ही इस मुद्दे पर कानून बनाए। इसी के साथ इस फैसले ने इस केस को लड़ने वाली तमाम महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान ला दी।

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सुप्रीम कोर्ट की पांच विद्वान न्यायाधीशों (जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई चारो समुदाय के जज थे) की संवैधानिक पीठ ने ट्रिपल तलाक की सदियों पुरानी परंपरा से मुस्लिम महिलाओं को निजात दिला दी थी। ट्रिपल तलाक और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली मुस्लिम महिलाओं ने फैसले का स्वागत किया था। महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा किया था।

विपक्ष के बिखराव और मित्र दलों की सहायता से पास हुआ बिल

लोकसभा चुनाव 2019 के बाद पहले संसद सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर परिचर्चा के दौरान बीते 25 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस से गलती सुधारने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि महिला सशक्तीकरण के लिए कांग्रेस को कई बड़े मौके मिले, लेकिन हर बार वो चूक गए। 1950 के दशक में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर बहस के दौरान वे पहला मौका चूके। इसके 35 साल बाद शाहबानो केस के दौरान एक और मौका गंवाया। अब तीन तलाक बिल के रूप में इनके पास एक और मौका है। 

सरकार की बड़ी जीत, राज्यसभा में भी तीन तलाक बिल पास, पक्ष में 99 और विरोध में 84 वोट पड़े

पिछले हफ्ते लोकसभा में बहुमत के साथ इस बिल के पास होने के बाद राज्यसभा में चौथी बार इसके पास होने को लेकर संशय था। कारण कि उच्च सदन में सरकार के पास बहुमत नहीं है। इसके बावजूद विपक्षी दलों के बिखराव और मित्र दलों की सहायता से यह बिल पास हो गया और शाहबानो के संघर्ष को आखिरकार न्याय मिला।

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