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'जब तक बगल से बुलेट न गुजरे जंग-ए मैदान का अहसास नहीं होता'
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 16 Sep 2017 10:01 PM IST
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शुरू से ही मैं नीले आसमान में उड़ते हवाई जहाज देखकर रोमांचित हो उठता था। पहली बार अपने गांव लायलपुर से ऊपर उन्हें उड़ते देखा था। लाहौर से कराची का हवाई रूट हमारे गांव के ऊपर से होकर गुजरता था। मुझे लगता था कि एक दिन मुझे भी उन्हीं हवाई जहाजों को उड़ाना है।
गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में साढ़े तीन साल की पढ़ाई के बाद 1938 में 19 साल की उम्र में मुझे ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ एयरफोर्स (आरएएफ) के लिए चुन लिया गया।
वहां हमारी ट्रेनिंग दो साल तक चलनी थी लेकिन इस बीच सितंबर, 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उसी साल दिसंबर में हमें रॉयल इंडियन एयरफोर्स में कमीशन मिल गया।
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उन दिनों ब्रिटेन के रॉयल एयरफोर्स से लेकर भारतीय वायु सेना तक, हर जगह पायलटों की भारी कमी थी। भारतीय वायु सेना के पास तब अंबाला में सिर्फ एक स्क्वाड्रन हुआ करता था। जनवरी, 1940 में मैंने और पटियाला राजघराने के पृथीपाल सिंह ने एक साथ रॉयल इंडियन एयरफोर्स ज्वाइन की।
फ्रंटियर प्रोविंस के अनुभव
अंबाला में ज्वाइनिंग के बाद मैं कराची गया और वहां से नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस पहुंचा। पठानों के उस इलाके में जंग लड़ना बहुत कुछ अफगानिस्तान में लड़ने जैसा था।
अफगानिस्तान की ही तरह उस इलाके में निशाना बनाने लायक कोई टारगेट नजर नहीं आता था क्योंकि वह मैदानी इलाका नहीं बल्कि गुफाओं और घाटियों से भरा क्षेत्र था।
मेरा माना है कि जब तक कोई बुलेट आपके पास से होकर नहीं गुजरे, लगता ही नहीं है कि आप जंग में है। शुरू-शुरू में मुझे भी डर लगा लेकिन धीरे-धीरे वह निकलता गया। 1940 में नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में मेरे विमान को पठानों ने मार गिराया। हमारा विमान दो पहाड़ियों के बीच एक सूखी नदी में जा गिरा, जिसकी चौड़ाई घग्गर नदी जितनी थी।
तीन साल में चार प्रमोशन
मुझे 1943 में जापानियों के खिलाफ मोर्चा संभालने के लिए इंफाल भेजा गया। तब तक मैं चार रैंक के प्रमोशन के साथ स्क्वाड्रन लीडर बन चुका था।
जापानियों ने इंफाल घाटी को चारों तरफ से घेर लिया था और एकमात्र सड़क मार्ग को भी अवरूद्ध कर दिया था। ऐसी सूरत में अमेरिकी एयर फोर्स ने हमारी मदद की और सप्लाई जारी रखी।
इस जंग ने यह साबित कर दिया कि भारतीय वायु सेना स्थापित वायु सेना से भी लड़ने में सक्षम है। इस जंग के बाद मुझे विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से नवाजा गया। मेरे स्क्वाड्रन को कुल आठ डीएफसी मिले, जो उस समय ब्रिटेन और भारतीय वायु सेना के किसी भी स्क्वाड्रन के लिए एक रिकॉर्ड था।
पाकिस्तान से जंग
पाकिस्तान ने 1965 की जंग की शुरुआत की थी। उसकी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ की और चंब-जौरियां सेक्टर में हमला बोल दिया। जनरल जेएन चौधरी ने मुझसे कहा कि इस हमले को नाकाम करने में सेना को मुश्किलें आ रही हैं।
हम दोनों रक्षा मंत्री वाईबी चह्वाण के पास पहुंचे। उन्होंने तत्काल हवाई हमले की अनुमति दे दी और देखते ही देखते हमने पाकिस्तान को धूल चटा दी। अखनूर ब्रिज पर कब्जे का उसका ख्वाब कभी पूरा नहीं हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध का अनुभव बहुत काम आया, लेकिन यह जंग बहुत जल्दी खत्म हो गई। इससे मैं बहुत निराश हुआ क्योंकि हम यहां से पाकिस्तान के हर शहर पर हमला कर रहे थे जबकि उसके विमान अंबाला से आगे नहीं बढ़ पाए थे। वे दिल्ली को भी निशाना नहीं बना पा रहे थे, मुंबई और अहमदाबाद तो बहुत दूर की कौड़ी थे।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)
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गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में साढ़े तीन साल की पढ़ाई के बाद 1938 में 19 साल की उम्र में मुझे ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ एयरफोर्स (आरएएफ) के लिए चुन लिया गया।
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वहां हमारी ट्रेनिंग दो साल तक चलनी थी लेकिन इस बीच सितंबर, 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उसी साल दिसंबर में हमें रॉयल इंडियन एयरफोर्स में कमीशन मिल गया।
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उन दिनों ब्रिटेन के रॉयल एयरफोर्स से लेकर भारतीय वायु सेना तक, हर जगह पायलटों की भारी कमी थी। भारतीय वायु सेना के पास तब अंबाला में सिर्फ एक स्क्वाड्रन हुआ करता था। जनवरी, 1940 में मैंने और पटियाला राजघराने के पृथीपाल सिंह ने एक साथ रॉयल इंडियन एयरफोर्स ज्वाइन की।
फ्रंटियर प्रोविंस के अनुभव
अंबाला में ज्वाइनिंग के बाद मैं कराची गया और वहां से नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस पहुंचा। पठानों के उस इलाके में जंग लड़ना बहुत कुछ अफगानिस्तान में लड़ने जैसा था।
अफगानिस्तान की ही तरह उस इलाके में निशाना बनाने लायक कोई टारगेट नजर नहीं आता था क्योंकि वह मैदानी इलाका नहीं बल्कि गुफाओं और घाटियों से भरा क्षेत्र था।
मेरा माना है कि जब तक कोई बुलेट आपके पास से होकर नहीं गुजरे, लगता ही नहीं है कि आप जंग में है। शुरू-शुरू में मुझे भी डर लगा लेकिन धीरे-धीरे वह निकलता गया। 1940 में नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में मेरे विमान को पठानों ने मार गिराया। हमारा विमान दो पहाड़ियों के बीच एक सूखी नदी में जा गिरा, जिसकी चौड़ाई घग्गर नदी जितनी थी।
तीन साल में चार प्रमोशन
मुझे 1943 में जापानियों के खिलाफ मोर्चा संभालने के लिए इंफाल भेजा गया। तब तक मैं चार रैंक के प्रमोशन के साथ स्क्वाड्रन लीडर बन चुका था।
जापानियों ने इंफाल घाटी को चारों तरफ से घेर लिया था और एकमात्र सड़क मार्ग को भी अवरूद्ध कर दिया था। ऐसी सूरत में अमेरिकी एयर फोर्स ने हमारी मदद की और सप्लाई जारी रखी।
इस जंग ने यह साबित कर दिया कि भारतीय वायु सेना स्थापित वायु सेना से भी लड़ने में सक्षम है। इस जंग के बाद मुझे विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से नवाजा गया। मेरे स्क्वाड्रन को कुल आठ डीएफसी मिले, जो उस समय ब्रिटेन और भारतीय वायु सेना के किसी भी स्क्वाड्रन के लिए एक रिकॉर्ड था।
पाकिस्तान से जंग
पाकिस्तान ने 1965 की जंग की शुरुआत की थी। उसकी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ की और चंब-जौरियां सेक्टर में हमला बोल दिया। जनरल जेएन चौधरी ने मुझसे कहा कि इस हमले को नाकाम करने में सेना को मुश्किलें आ रही हैं।
हम दोनों रक्षा मंत्री वाईबी चह्वाण के पास पहुंचे। उन्होंने तत्काल हवाई हमले की अनुमति दे दी और देखते ही देखते हमने पाकिस्तान को धूल चटा दी। अखनूर ब्रिज पर कब्जे का उसका ख्वाब कभी पूरा नहीं हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध का अनुभव बहुत काम आया, लेकिन यह जंग बहुत जल्दी खत्म हो गई। इससे मैं बहुत निराश हुआ क्योंकि हम यहां से पाकिस्तान के हर शहर पर हमला कर रहे थे जबकि उसके विमान अंबाला से आगे नहीं बढ़ पाए थे। वे दिल्ली को भी निशाना नहीं बना पा रहे थे, मुंबई और अहमदाबाद तो बहुत दूर की कौड़ी थे।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)