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छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा से नाराज हैं आदिवासी वोटर, ये है बड़ी वजह

Thu, 25 Oct 2018 09:14 PM IST
हरेन्द्र, नई दिल्ली
हरेन्द्र, नई दिल्ली Updated Thu, 25 Oct 2018 09:14 PM IST
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Tribal Voter is angry with BJP in Chhattisgarh, Madhya Pradesh and Rajasthan
PM Narendra Modi
छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अनुसूचित जनजाति की कुल विधानसभा सीटों की संख्या 91 है। इनमें सबसे ज्यादा सीटें मध्य प्रदेश में हैं। लेकिन भाजपा शासित तीनों राज्यों में आदिवासी समाज में इस बार सरकार विरोधी लहर है। वहीं आदिवासियों के बूते पर सत्ता तक पहुंचने का सपना देख रही कांग्रेस ने हाल में जय आदिवासी युवा शक्ति के साथ हाथ मिलाया है। उनका कहना है कि सरकार उन्हें सुरक्षा देने वाले कानूनों से खिलावड़ कर रही है।
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छत्तीसगढ़ में 29, मध्य प्रदेश में 37 और राजस्थान में 25 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी डेढ़ करोड़ (21 प्रतिशत) है, वहीं राजस्थान में 92 लाख (13.5 प्रतिशत), छत्तीसगढ़ में 78 लाख (30.6 प्रतिशत) अनुसूचित जनजाति की आबादी है।
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आदिवासी इलाकों में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन चलाने वाले जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरालाल अलावा कहते हैं कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 15 सालों से भाजपा सरकार है, लेकिन हालात जस के तस हैं। 
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आदिवासी बहुल राज्यों में कुपोषण के गंभीर हालात हैं और पलायन यहां अहम मुद्दा है। 'अबकी बार मध्य प्रदेश में आदिवासी सरकार' का नारा देने वाले अलावा के मुताबिक संविधान की 5वीं अनुसूची के तहत 2006 में बनाया गया वन अधिकार कानून अभी तक लागू नहीं हुआ है। वह कहते हैं कि अब वादों से मुकरने की बाजीगरी नहीं चलेगी।

सामाजिक कार्यकर्ता और स्वराज इंडिया के प्रमुख योगेंद्र यादव आदिवासियों के इन मुद्दे से इत्तेफाक रखते हैं। वह कहते हैं कि भाजपा ने 2014 में अनुसूचित जनजाति के वोट बटोर कर तीनों राज्यों में अपनी जीत का मार्ग प्रशस्त किया था। लेकिन सरकार ने जिस तरह से आदिवासियों की अनदेखी की है, उससे उनके समाज में गलत संदेश गया है।

कई सालों से आदिवासियों के बीच काम करे रहे आदिवासी युवा सेवा संघ के अध्यक्ष सचिन सातवी का कहना है कि आज भी आदिवासी इलाकों में इंफ्रास्ट्र्क्चर की कमी है, न स्कूल हैं और न ही अस्पताल। देश में जो माहौल है उससे आदिवासी भी घबराए हुए हैं। उनका सोचना है कि उनको सुरक्षा देने वाले कानूनों को खत्म किया जा रहे हैं। 


अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार की रोकथाम वाले कानून में बदलाव होने से भी आदिवासी नाराज हैं। जिसके चलते आदिवासी और अन्य समाज के बीच दूरियां बढ़ रही हैं। उनका सोचना है कि सरकार ने उन पर हुए अत्याचारों के मामलों को ठीक से मैनेज नहीं किया।
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