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ICMR: 75 वर्षों से विदेशी मानकों से हो रहा इलाज, अब आईसीएमआर तय करेगा जांच के मानक

Sun, 29 Oct 2023 05:46 AM IST
जलज मिश्रा परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Sun, 29 Oct 2023 05:46 AM IST
सार

आईसीएमआर ने 49,486 मरीजों के रक्त के नमूना लेकर अपने और विदेशी दोनों मानकों के आधार पर विश्लेषण में पाया कि विदेशी मानक और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आधार पर 30% एनीमिया ग्रस्त मिले जबकि आईसीएमआर ने अपने मानकों से जांच की तो यह आंकड़ा 19% पाया।

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Treatment is being done according to foreign standards for 75 years,
आईसीएमआर - फोटो : Social media

विस्तार

भारत में विदेशी मानकों के आधार पर मरीजों का इलाज किया जा रहा है। बीपी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल या फिर हीमोग्लोबिन जैसी प्रयोगशाला जांच वर्षों से अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं जबकि खानपान, आदत और अनुवांशिकता के आधार पर पश्चिम देशों की तुलना में भारतीय आबादी काफी अलग है, लेकिन अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) भारतीय आबादी के हिसाब से प्रयोगशाला जांच के मानक तय करेगी। 

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आईसीएमआर ने 49,486 मरीजों के रक्त के नमूना लेकर अपने और विदेशी दोनों मानकों के आधार पर विश्लेषण में पाया कि विदेशी मानक और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आधार पर 30% एनीमिया ग्रस्त मिले जबकि आईसीएमआर ने अपने मानकों से जांच की तो यह आंकड़ा 19% पाया। अब आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने टास्क फोर्स का गठन कर भारतीय आबादी के हिसाब से प्रयोगशाला जांच के मानक तय करने का फैसला लिया है। डॉ. नीलेश बताते हैं कि इस अध्ययन में करीब तीन से चार साल का वक्त लगा।

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मानक इसलिए जरूरी
डॉ. नीलेश ने बताया कि मानक के आधार पर ही मरीज का इलाज किया जाता है। इसके अलावा, इन्हीं मरीजों की संख्या के आधार पर यह देखा जाता है कि देश में कितने एनीमिया, दिल, रक्तचाप या कोलेस्ट्रॉल के मरीज हैं? उदाहरण के लिए सरकार हर साल राष्ट्रीय एनीमिया मुक्त अभियान चलाती है जिसमें 700 से 800 करोड़ रुपये का बजट भी खर्च होता है जबकि मानक अलग होने से एनीमिया रोगियों की संख्या में अंतर आईसीएमआर के अध्ययन में ही साबित हुआ है।

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