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ट्रांसजेंडर को समान विचार वाले के साथ रहने का हक, मां की याचिका खारिज कर ‘बेटे’ को किया आजाद
एजेंसी, कोच्चि
Updated Wed, 13 Jun 2018 06:34 AM IST
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Transgender
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केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी ट्रांसजेंडर को भी समान विचार वाले व्यक्ति के साथ घूमने या रहने का हक है और उसे मां-बाप के पास रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जस्टिस वी. चितंबरेश और जस्टिस केपी ज्योतिंद्रनाथ की पीठ ने एक ट्रांसजेंडर की मां की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की याचिका ठुकराते हुए यह फैसला दिया।
ट्रांसजेंडर की मां ने याचिका दायर कर दावा किया था कि उसके 25 वर्षीय ‘बेटे’ को ट्रांसजेंडर समुदाय के कुछ लोगों ने अवैध तरीके से बंधक बना रखा है। इस मामले में पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर की तरह रहने का अधिकार देती है।
पिछले सप्ताह पीठ ने ट्रांस-वीमेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए मेडिकल जांच में उसे मानसिक समस्या होने की पुष्टि होने के बाद उसे अपनी इच्छा के अनुसार रहने की अनुमति दी थी। गौरतलब है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका किसी व्यक्ति को अवैध कब्जे से छुड़ाकर आजाद करने के लिए दायर की जाती है।
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इस मामले में याचिकाकर्ता ने गुहार लगाई थी कि वह अपने ‘बेटे’ को औरत के लिबास में नहीं देख सकती है और न ही उसे ‘अरुंधति’ नाम से बुला सकती है। महिला ने यह भी दलील दी कि उसके बेटे में घर वापसी के प्रति कोई रुझान नहीं है और वह दूसरे ट्रांसजेंडरों के साथ घूम रहा है जिससे उसका सेक्स बदलवाने की आशंका है।
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ट्रांसजेंडर की मां ने याचिका दायर कर दावा किया था कि उसके 25 वर्षीय ‘बेटे’ को ट्रांसजेंडर समुदाय के कुछ लोगों ने अवैध तरीके से बंधक बना रखा है। इस मामले में पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर की तरह रहने का अधिकार देती है।
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पिछले सप्ताह पीठ ने ट्रांस-वीमेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए मेडिकल जांच में उसे मानसिक समस्या होने की पुष्टि होने के बाद उसे अपनी इच्छा के अनुसार रहने की अनुमति दी थी। गौरतलब है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका किसी व्यक्ति को अवैध कब्जे से छुड़ाकर आजाद करने के लिए दायर की जाती है।
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इस मामले में याचिकाकर्ता ने गुहार लगाई थी कि वह अपने ‘बेटे’ को औरत के लिबास में नहीं देख सकती है और न ही उसे ‘अरुंधति’ नाम से बुला सकती है। महिला ने यह भी दलील दी कि उसके बेटे में घर वापसी के प्रति कोई रुझान नहीं है और वह दूसरे ट्रांसजेंडरों के साथ घूम रहा है जिससे उसका सेक्स बदलवाने की आशंका है।