{"_id":"5e136dae8ebc3e87c11d7bb9","slug":"trade-union-claim-25-crore-people-join-nationwide-strike-on-8-january","type":"story","status":"publish","title_hn":"8 जनवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल में शामिल होंगे 25 करोड़ लोग, ट्रेड यूनियनों का दावा ","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
8 जनवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल में शामिल होंगे 25 करोड़ लोग, ट्रेड यूनियनों का दावा
Tue, 07 Jan 2020 12:27 AM IST
Mohit Mudgal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Mohit Mudgal
Updated Tue, 07 Jan 2020 12:27 AM IST
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ देश की दस मुख्य ट्रेड यूनियनों ने आठ जनवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। ट्रेड यूनियनों के अनुसार इस हड़ताल में 25 करोड़ लोग शामिल होंगे। ट्रेड यूनियनों इंटक, एटक, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एसईडब्ल्यूए, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ, यूटीयूसी सहित विभिन्न संघों और फेडरेशनों ने पिछले साल सितंबर में आठ जनवरी 2020 को हड़ताल पर जाने की घोषणा की थी।
विज्ञापन
दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त बयान में कहा कि आठ जनवरी को आगामी आम हड़ताल में हम कम से कम 25 करोड़ लोगों की भागीदारी की उम्मीद कर रहे हैं। उसके बाद हम कई और कदम उठाएंगे और सरकार से श्रमिक विरोधी, जनविरोधी, राष्ट्र विरोधी नीतियों को वापस लेने की मांग करेंगे। बयान में कहा गया है कि श्रम मंत्रालय अब तक श्रमिकों को उनकी किसी भी मांग पर आश्वासन देने में विफल रहा है। श्रम मंत्रालय ने दो जनवरी 2020 को बैठक बुलाई थी। सरकार का रवैया श्रमिकों के प्रति अवमानना का है।
विज्ञापन
बयान में कहा गया है कि छात्रों के 60 संगठनों तथा कुछ विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों ने भी हड़ताल में शामिल होने का फैसला किया है। उनका एजेंडा बढ़ी फीस और शिक्षा के व्यावसायीकरण का विरोध करने का है। ट्रेड यूनियनों ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंसा तथा अन्य विश्वविद्यालय परिसरों में इसी तरह की घटनाओं की आलोचना की है और देशभर में छात्रों तथा शिक्षकों को समर्थन देने की घोषणा की है।
विज्ञापन
यूनियनों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि जुलाई, 2015 से एक भी भारतीय श्रम सम्मेलन का आयोजन नहीं हुआ है। इसके अलावा यूनियनों ने श्रम कानूनों की संहिता बनाने और सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण का भी विरोध किया है।