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'द इंडिया वे': विदेश मंत्री जयशंकर बोले- भारत के विचार को समझने के लिए महाभारत का अध्ययन जरूरी, दुनिया को दी यह खास सलाह

Thu, 28 Apr 2022 04:30 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Thu, 28 Apr 2022 04:30 PM IST
सार

किताब में 'कृष्णा की पसंद: एक उभरती हुई शक्ति की सामरिक संस्कृति' नामक एक अध्याय है। इसमें डॉ. जयशंकर बताते हैं कि भारत को अपनी रणनीतियों और लक्ष्यों को समझने के लिए महाभारत का अध्ययन करना जरूरी है।

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To understand Indian thought process it is necessary to study the MahabharataDr Jaishankar explainsthe India waythrough the greatest story ever told
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में छात्रों को संबोधित करते एस जयशंकर। - फोटो : ANI

विस्तार

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर कार्यभार संभालने के बाद से ही अपने बेबाक बोल के लिए चर्चा में रहते हैं। दिवगंत भाजपा नेता सुषमा स्वराज के नेतृत्व में दिखाई देने वाला आत्मविश्वास और उनकी सुदृढ़ विदेश नीति को आगे ले जाने का काम जयशंकर बखूबी कर रहे हैं। इस बीच जयशंकर ने अपनी किताब 'द इंडिया वे' में सशक्त राष्ट्र के रूप में भारत का जिक्र किया है। उन्होंने बताया है कि वे एक बदलती दुनिया में भारत की भूमिका को कैसे देखते हैं और कैसे चाहते हैं कि दुनिया भारत को देखे?

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किताब में 'कृष्णा की पसंद: एक उभरती हुई शक्ति की सामरिक संस्कृति' नामक एक अध्याय है। इसमें डॉ. जयशंकर बताते हैं कि भारत को अपनी रणनीतियों और लक्ष्यों को समझने के लिए महाभारत का अध्ययन करना जरूरी है। इसके अलावा अगर दुनिया भारत को समझना है, तो भी महाभारत का अध्ययन आवश्यक है। महाभारत हमें सुनाई गई अब तक की सबसे बड़ी कहानी है। 
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अध्याय गोएथे के एक उद्धरण के साथ शुरू होता है- 'एक राष्ट्र जो अपने अतीत का सम्मान नहीं करता है उसका कोई भविष्य नहीं है।' किताब में डॉ. जयशंकर ने एक बात बहुत साफ कर दी है, वह यह कि यहां पहले से ही एक बहुध्रुवीय दुनिया है। यह कुछ ऐसा जिसे कई पश्चिमी शक्तियां स्वीकार करने से हिचकिचाती हैं, कम से कम अपने बयानों और बाकी दुनिया से अपेक्षाओं में तो ऐसा ही दिखता है। डॉ. जयशंकर के विचार में एक बहुध्रुवीय दुनिया में भारतीय विचार प्रक्रिया, विकल्प और दुविधाएं एक प्रतिबिंब हैं और कई मायनों में शक्तिशाली महाकाव्य महाभारत में वर्णित परिदृश्यों के आधुनिक-दिन के अनुमान हैं।
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डॉ. जयशंकर आगे लिखते हैं कि जिस तरह होमर के इलियड या मैकियावेली के द प्रिंस की अनदेखी करते हुए पश्चिमी रणनीतिक परंपरा पर टिप्पणी करना असंभव है, या उनके समकक्ष तीन राज्यों की अवहेलना करते हुए चीन को समझने की कोशिश करना मुमकिन नहीं है। ऐसे ही कोई भी महाभारत का अध्ययन किए बिना भारत को नहीं समझ सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत और यहां तक कि दुनिया के सामने वर्तमान में कई चुनौतियां हैं। यह सब अब तक की सबसे बड़ी कहानी में बताई जा चुकी है।

इससे पहले दिल्ली में रायसीना डायलॉग में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने देश की 25 सालों की विदेश नीति की रूपरेखा पेश की थी। उन्होंने कहा कि देश अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखे और दुनिया क्या है, यह जानने की बजाए, हम क्या हैं, यह देखे और हर क्षेत्र में मौजूद अवसरों का लाभ उठाए। उन्होंने कहा कि एक वक्त था, जब विश्व के इस हिस्से में हम एकमात्र लोकतंत्र थे। हमें हमारी क्षमताओं पर फोकस करना चाहिए और आने वाले वर्षों में दुनिया के माहौल को देखकर हर क्षेत्र में लाभ उठाना चाहिए। 

विदेश मंत्री ने कहा था कि हमें यह भरोसा होना चाहिए कि हम कौन हैं? विश्व से संपर्क के वक्त यह ध्यान रखना होगा कि हम कौन हैं, हमें इस दायरे में सीमित नहीं रहना है कि वे कौन हैं। दुनिया को अब हमें समझना होगा और उसके हिसाब से व्यवहार करना होगा। हमें दूसरे देशों से मंजूरी के ख्याल को छोड़ना पड़ेगा। 

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 'रायसीना डायलॉग' के एक संवाद सत्र में कहा था कि यूक्रेन में संकट यूरोप के लिए 'चेताने वाला' हो सकता है, ताकि वह यह भी देखे कि एशिया में क्या हो रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों से यह दुनिया का आसान हिस्सा नहीं है। यूक्रेन पर भारत के रुख की आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि पश्चिमी शक्तियां एशिया के सामने आने वाली चुनौतियों से बेखबर हैं, जिसमें अफगानिस्तान में पिछले साल की घटनाएं और क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था पर लगातार दबाव शामिल है। 


जयशंकर ने चीन के संदर्भ में कहा कि जब एशिया में नियम-आधारित व्यवस्था को चुनौती दी जा रही थी, तब यूरोप द्वारा भारत को और अधिक व्यापार करने की सलाह दी गई थी। लेकिन कम से कम हम आपको ऐसी सलाह नहीं दे रहे हैं। हमने यूरोप को एशिया की ओर देखने की सलाह दी, जिसकी सीमाएं अस्थिर थीं।

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