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चीनी OBOR के जवाब में भारत-जापान का 'खास' प्रोजेक्ट, समंदर के सहारे आर्थिक मोर्चे पर घेरने की तैयारी

Wed, 31 May 2017 08:36 PM IST
amarujala.com- Written by: श्रवण शुक्ला
amarujala.com- Written by: श्रवण शुक्ला Updated Wed, 31 May 2017 08:36 PM IST
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To counter OBOR, India and Japan propose Asia-Africa sea corridor
चीनी ओबीओआर को टक्कर देगा भारत-जापान का 'खास' प्रोजेक्ट, समंदर के सहारे आर्थिक मोर्चे पर घेरने की तैयारी - फोटो : PTI
चीन के OBOR (वन बेल्ट, वन रोड) परियोजना को टक्कर देने के लिए भारत AAGC प्रोजेक्ट पर काम शुरू की योजना बना रहा है। भारत द्वारा ओबीओआर को लाल झंडी दिखाते समय माना जा रहा था कि चीन को घेरने के लिए भारत कोई बड़ी रणनीति बनाएगा, ऐसे में भारत ने अनोखी परियोजना के तहत जापान के साथ मिलकर चीनी ओबीओार की हवा निकालने की तैयारी की है। अगर सबकुछ ठीक रहा, तो भारत और जापान मिलकर एएजीसी पर काम करेंगे और इसमें कई देशों का साथ मिलने की वजह से भारत ओबीओआर की काट भी निकाल लेगा।
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क्या है एएजीसी प्रोजेक्ट?

एएसीजी का पूरा नाम एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर है। इसके बारे में पहली बार बात पिछले साल जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के समय हुई थी। अब ये परियोजना आगे बढ़ाई जा रही है। इसके तहत भारत, अफ्रीका और अन्य सहयोगी देशों के बंदरगाहों को एक नए रूट से जोड़ा जाएगा, जो सुरक्षित होने के साथ ही फायदा देने वाला होगा। इसके तहत भारत के जामनगर पोर्ट, अफ्रीकी देश दिजिबूती के पोर्ट, मोंबासा, जांजीबार के पोर्ट के साथ ही म्यांमार के सित्तवे पोर्ट को भी जोड़ा जाएगा। भारत पहले से ही अपने बंदरगाहों को सागरमाला प्रोजेक्ट के जरिए उन्नत बनाने के काम में लगा हुआ है। एएजीसी प्रोजेक्ट 'इंडो-पैसिफिक रीजन में मुक्त और खुले व्यापारिक सहयोग' को बढ़ाने की कोशिश है।
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ओबीओआर से किस तरह अलग है एएजीसी?

चीन का ओबीओआर प्रोजेक्ट पुराने सिल्क रूट को जिंदा करने की कोशिश है, जिसके तहत चीन जमीन के रास्ते सभी देशों में पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है। वो कच्चे माल को इकट्ठा कर उसे खपाने के लिए बड़े बाजार की तलाश कर रहा है, जिसके तहत चीनी सरकार भारी मात्रा में विनिर्माण कार्यों में निवेश कर रहा है। खास बात ये है कि चीन का ओबीओआर पूरी तरह से चीनी सरकार के प्रभुत्व वाली परियोजना है, जिसपर आने वाला पूरा खर्च भी चीनी सरकार उठा रही है।
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एएजीसी परियोजना भारत और जापान की अगुवाई में समंदर के रास्ते नया रूट सामने लाने की कोशिश है। इसके तहत भारत और जापान अफ्रीकी देशों के साथ ही दक्षिण एशियाई, पूर्वी एशियाई और आसियान देशों के साथ मिलकर सी-कॉरिडोर पर काम कर रहे हैं। इस परियोजना के तहत भारत, जापान, म्यांमार, दक्षिण अफ्रीका, मोजांबिक, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हो रहे हैं। इसके अलावा इसकी फंडिंग सरकारों के जिम्मे न होकर अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक जैसी बड़ी संस्थाएं फंड करेंगी।

साथ ही जापान और भारत अपने स्तर पर इसमें निवेश करेंगे, तो प्राइवेट निवेशकों के पास भी निवेश का भारी मौका होगा। इसके लिए भारत और जापान के उद्यमी संयुक्त कंपनियों के माध्यम से निवेश करेंगे। वैसे, ओबीओआर के साथ ही चीन समंदर पर भी निगाहें गड़ाए बैठा है, जिसके लिए वो पाकिस्तानी, श्रीलंकाई, बांग्लादेशी बंदरगाहों को विकसित कर रहा है। पर एएजीसी की वजह से उसका ये रुट निष्प्रभावी किया जा सकता है। इसकी वजह है एएजीसी के रूट का सीधा और सपाट होना, जो सुरक्षित, छोटा और सुविधाजनक होगा।

भारत को किन देशों का मिलेगा साथ?

भारत को इस परियोजना में जापान, म्यांमार, दक्षिण अफ्रीका, मोजांबिक, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का साथ मिलेगा। 

भारत और जापान की प्राथमिक जिम्मेदारियां

इसके तहत जापान इस प्रोजेक्ट के तहत आने वाले बंदरगाहों पर सुविधाओं का विस्तार करेगा और उन्हें विकसित करेगा। भारत अपने अफ्रीका में काम करने के अनुभव का इस्तेमाल करेगा। जापान को बंदरगाह विकसित करने की तकनीकी के मामले में महारत हासिल है। इसके अलावा दोनों ही देशों के उद्यमी इस परियोजना में निवेश भी करेंगे।

To counter OBOR, India and Japan propose Asia-Africa sea corridor
इस परियोजना के तहत चीन को किस तरह से घेरेंगे? - फोटो : Amar Ujala
चीन भारत को घेरने के लिए भारत के पड़ोसी देशों में निवेश और व्यापार के बहाने अपनी पैठ बढ़ा रहा है। पर इस नए रूट के खुल जाने से समंदर के रास्ते होने वाले व्यापार का बड़ा हिस्सा इसमें आ जाएगा। दूसरी बात ये है कि चीन का ओबीओआर प्रोजेक्ट जमीन के रास्ते बनना है, जिसमें काफी ज्यादा समय और धन खर्च हो रहा है, वहीं एएजीसी प्रोजेक्ट पानी के रास्ते भारत को अफ्रीका, दक्षिण एशियाई और पूर्वी एशियाई-आसियान देशों तक पहुंचाएगा।

अभी अफ्रीकी देशों में चीन की उपस्थिति किस तरह की है

अभी चीन ने अफ्रीकी देशों में भारी निवेश किया है। अफ्रीकी महाद्वीप में तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में चीन का बड़ा हिस्सा है। चीन इन देशों में सड़कों, कारखानों के विकास में लगा हुआ है। साथ ही चीन इन देशों के कुल निर्यात का 28 फीसदी माल भी खरीदता है। ऐसे में एएजीसी परियोजना द्वारा भारत और जापान चीन की हिंद महासागर में नाकेबंदी के लिए तैयार हैं। चीन ने साल 2015-2016 में अफ्रीकी देशों में 38.4 बिलियन डॉलर का निवेश किया, इसके मुकाबले भारत ने महज 2.2 बिलियन डॉलर का निवेश किया। ये निवेश ग्रीनफील्ड इनवेस्टमेंट के तौर पर की गई। इस बड़े अंतर को कम करने के लिए भी एएजीसी मददगार साबित हो सकता है।

अफ्रीका में किस तरह से बढ़ेगा भारत का दखल

भारत-जापान मिलकर अफ्रीकी देशों में बंदरगाहों का विकास करेंगे। नए रूट के खुलने से व्यापार में बढ़ोतरी होगी। निजी निवेश भी बढ़ेगा। भारत के अफ्रीका से संबंध बहुत पहले से रहे हैं। चीन की उपस्थिति की वजह से असंतुलिन हुए संबंधों को फिर से संतुलित किया जा सकेगा। अफ्रीकी देशों को भारत के रूप में भरोसेमंद सहयोगी के साथ व्यापार करने में दिक्कत भी नहीं आएगी। इसके साथ ही हिंद महासागर के साथ ही अरब सागर, बंगाल की खाडी, अदन की खाड़ी तक भारतीय नौसेना का भी एकछत्र राज होगा।

कब तक मूर्त रूप में आएगा AAGC

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शिंजो अबे
एएजीसी के मूर्त रूप में आने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की मुलाकात होनी है। दोनों की मुलाकात जी20 बैठक के दौरान जुलाई में जर्मनी में हो सकती है, या सितंबर में जब अबे भारत आएंगे तब। दोनों की मुलाकात के बाद ही एएजीसी के बारे में अधिक जानकारी भी सामने आ पाएगी। 

बता दें कि गुजरात की राजधानी गांधी नगर में कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जापानी समकक्ष के साथ बनाए इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक(एएफडीबी) की सालाना बैठक में चर्चा की थी। इस बैठक में 30 पन्नों वाला एएजीसी का विजन डॉक्यूमेंट भी पेश किया गया, जिसका अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक के अधिकारियों ने समर्थन किया है। 
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