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Opposition Meet: AAP-कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल अंतर्विरोध के बावजूद क्यों इकट्ठा हुए, अब तक क्या-क्या हुआ?
Mon, 17 Jul 2023 05:39 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Mon, 17 Jul 2023 05:39 PM IST
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विपक्ष एकजुट
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AMAR UJALA
विस्तार
देश में अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं, लेकिन देश के कई विपक्षी दल इससे पहले ही भाजपा को घेरने में जुट गए हैं। इसे देखते हुए विपक्षी पार्टियों के शीर्ष नेता आज से बेंगलुरु में होने वाली दो दिवसीय एकता बैठक में शामिल होने जा रहे हैं। इनमें से कई बेंगलुरु पहुंच भी गए हैं। इस बीच कई पार्टियों के बैठक में शामिल होने को लेकर संशय भी बना रहा। पिछली बार बैठक का हिस्सा रही आप आदमी पार्टी दूसरी बैठक के एक दिन पहले आने के लिए तैयार हुई। वहीं एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार को लेकर खबरें आईं कि वह महाजुटान में नहीं शामिल होंगे, लेकिन बाद में पता चला कि शरद पवार बैठक में दूसरे दिन शिरकत करेंगे।पटना में हुई पहली विपक्षी बैठक के बाद से बहुत कुछ घट चुका है। इस बीच हमें जानना जरूरी है कि पहली बैठक कब हुई थी और इसमें किन पार्टियों ने हिस्सा लिया था? पहली बैठक में क्या हुआ था? इसके बाद क्या-क्या हुआ? अब दूसरी बैठक में क्या होने जा रहा है? इसमें किन दलों की भागीदारी होगी? इसका एजेंडा क्या है?
पटना में विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक।
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अमर उजाला
पहली बैठक में कब हुई थी और इसमें किन पार्टियों ने हिस्सा लिया था?
बिहार में 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी का मुकाबला करने की रणनीति बनाने के लिए 15 विपक्षी राजनीतिक दलों की पहली बैठक 23 जून को पटना में हुई। यह बैठक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पटना के एक अणे मार्ग स्थित सरकारी आवास पर हुई। बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने राजद का प्रतिनिधित्व किया। सभा में ममता बनर्जी, हेमंत सोरेन, एमके स्टालिन, अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान जैसे मुख्यमंत्रियों ने तृणमूल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, डीएमके और आम आदमी पार्टी (आप) का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और उनकी पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी मौजूद रहे।
इस बैठक को बुलाने की कवायद राज्य के महागठबंधन के घटक दलों जदयू, राजद और कांग्रेस ने की। बैठक में समाजवादी पार्टी, एनसीपी, पीडीपी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेएंडके) और शिव सेना (यूबीटी) के नेता मौजूद रहे। वाम गुट का प्रतिनिधित्व सीपीएम, सीपीआई और सीपीआई (एमएल) ने किया। वहीं बैठक में वरिष्ठ नेताओं के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव, फारूक अब्दुल्ला, शरद पवार, महबूबा मुफ्ती और उद्धव ठाकरे भी मौजूद रहे।
बिहार में 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी का मुकाबला करने की रणनीति बनाने के लिए 15 विपक्षी राजनीतिक दलों की पहली बैठक 23 जून को पटना में हुई। यह बैठक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पटना के एक अणे मार्ग स्थित सरकारी आवास पर हुई। बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने राजद का प्रतिनिधित्व किया। सभा में ममता बनर्जी, हेमंत सोरेन, एमके स्टालिन, अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान जैसे मुख्यमंत्रियों ने तृणमूल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, डीएमके और आम आदमी पार्टी (आप) का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और उनकी पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी मौजूद रहे।
इस बैठक को बुलाने की कवायद राज्य के महागठबंधन के घटक दलों जदयू, राजद और कांग्रेस ने की। बैठक में समाजवादी पार्टी, एनसीपी, पीडीपी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेएंडके) और शिव सेना (यूबीटी) के नेता मौजूद रहे। वाम गुट का प्रतिनिधित्व सीपीएम, सीपीआई और सीपीआई (एमएल) ने किया। वहीं बैठक में वरिष्ठ नेताओं के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव, फारूक अब्दुल्ला, शरद पवार, महबूबा मुफ्ती और उद्धव ठाकरे भी मौजूद रहे।
बैठक में आप से दूर कांग्रेस
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अमर उजाला
पहली बैठक में क्या हुआ था?
पहली बैठक में नेताओं ने विपक्षी दलों के नए गठबंधन को बनाने के तौर-तरीकों, प्रस्तावित गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम और 2024 के लोकसभा चुनावों से संबंधित अन्य प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की। वहीं बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी पार्टियों में आम सहमति बनाना था।
जब इस बैठक के लिए अलग-अलग दलों के नेता जुटे तो चर्चा शुरू हुई। जानकारी के मुताबिक, केजरीवाल ने इस बैठक में कहा कि केंद्र के लाए अध्यादेश का हम विरोध कर रहे हैं और बाकी दलों को इस मुद्दे पर हमारा समर्थन करना चाहिए। जैसे ही केजरीवाल ने यह बात कही, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एतराज जताया। उन्होंने कहा कि जब कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था, तब तो आपकी पार्टी ने हमारा समर्थन नहीं किया था और संसद में सरकार का साथ दिया था।
23 जून को ढाई बजे बैठक खत्म हुई। उम्मीद थी कि चार नेता संवाददाता सम्मेलन करेंगे। लेकिन, हो गया कुछ और। बैठक में केजरीवाल जिस दिल्ली अध्यादेश को लेकर कांग्रेस का हाथ अपने साथ चाहते थे, उस पर बात नहीं बनी और वह निकल गए। आप नेता मीडिया के सवालों का जवाब दिए बगैर निकल गए।
पहली बैठक में नेताओं ने विपक्षी दलों के नए गठबंधन को बनाने के तौर-तरीकों, प्रस्तावित गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम और 2024 के लोकसभा चुनावों से संबंधित अन्य प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की। वहीं बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी पार्टियों में आम सहमति बनाना था।
जब इस बैठक के लिए अलग-अलग दलों के नेता जुटे तो चर्चा शुरू हुई। जानकारी के मुताबिक, केजरीवाल ने इस बैठक में कहा कि केंद्र के लाए अध्यादेश का हम विरोध कर रहे हैं और बाकी दलों को इस मुद्दे पर हमारा समर्थन करना चाहिए। जैसे ही केजरीवाल ने यह बात कही, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एतराज जताया। उन्होंने कहा कि जब कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया था, तब तो आपकी पार्टी ने हमारा समर्थन नहीं किया था और संसद में सरकार का साथ दिया था।
23 जून को ढाई बजे बैठक खत्म हुई। उम्मीद थी कि चार नेता संवाददाता सम्मेलन करेंगे। लेकिन, हो गया कुछ और। बैठक में केजरीवाल जिस दिल्ली अध्यादेश को लेकर कांग्रेस का हाथ अपने साथ चाहते थे, उस पर बात नहीं बनी और वह निकल गए। आप नेता मीडिया के सवालों का जवाब दिए बगैर निकल गए।
बैठक में आप से दूर कांग्रेस,
- फोटो :
अमर उजाला
पहली बैठक के बाद क्या-क्या हुआ?
विपक्ष के नजरिए से आप को छोड़कर पहली बैठक में सब कुछ सही हुआ। इस बीच केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ विपक्ष से समर्थन मांगने निकली आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के बीच जंग शुरू हो गई। इस मुद्दे पर आप प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि विश्वस्त सूत्रों से हमें खबर मिली है कि राहुल गांधी और भाजपा के बीच समझौता हो चुका है। इतना मुश्किल क्या है उनके लिए? कांग्रेस को यह साफ करना चाहिए कि वह देश के संविधान के साथ खड़ी है या भाजपा के साथ है या दिल्ली की जनता के खिलाफ है?
कांग्रेस ने भी आप के हमलों का जवाब दिया। पार्टी नेता अजय माकन ने आप और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ सीएम अरविंद केजरीवाल कांग्रेस का समर्थन मांग रहे हैं, दूसरी तरफ राजस्थान जाकर पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक अशोक गहलोत, जो तीन बार के मुख्यमंत्री रहे हैं उनके खिलाफ बोल रहे हैं। सचिन पायलट और राजस्थान में पार्टी के जो वरिष्ठ नेता हैं, उनके खिलाफ बोल रहे हैं। ऐसा करके क्या वे कांग्रेस के साथ समझौता करना चाहते हैं या कांग्रेस से दूरी बनाना चाहते हैं।
आगे माकन ने कहा कि दरअसल, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भाजपा से मिले हुए हैं और जेल नहीं जाना चाहते, अन्यथा उनकी जेल जाने की पूरी तैयारी हो चुकी है, क्योंकि भ्रष्टाचार किया है।
विपक्ष के नजरिए से आप को छोड़कर पहली बैठक में सब कुछ सही हुआ। इस बीच केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ विपक्ष से समर्थन मांगने निकली आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के बीच जंग शुरू हो गई। इस मुद्दे पर आप प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि विश्वस्त सूत्रों से हमें खबर मिली है कि राहुल गांधी और भाजपा के बीच समझौता हो चुका है। इतना मुश्किल क्या है उनके लिए? कांग्रेस को यह साफ करना चाहिए कि वह देश के संविधान के साथ खड़ी है या भाजपा के साथ है या दिल्ली की जनता के खिलाफ है?
कांग्रेस ने भी आप के हमलों का जवाब दिया। पार्टी नेता अजय माकन ने आप और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ सीएम अरविंद केजरीवाल कांग्रेस का समर्थन मांग रहे हैं, दूसरी तरफ राजस्थान जाकर पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक अशोक गहलोत, जो तीन बार के मुख्यमंत्री रहे हैं उनके खिलाफ बोल रहे हैं। सचिन पायलट और राजस्थान में पार्टी के जो वरिष्ठ नेता हैं, उनके खिलाफ बोल रहे हैं। ऐसा करके क्या वे कांग्रेस के साथ समझौता करना चाहते हैं या कांग्रेस से दूरी बनाना चाहते हैं।
आगे माकन ने कहा कि दरअसल, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भाजपा से मिले हुए हैं और जेल नहीं जाना चाहते, अन्यथा उनकी जेल जाने की पूरी तैयारी हो चुकी है, क्योंकि भ्रष्टाचार किया है।
Maharashtra Politics
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ANI
दूसरी बैठक की तैयारी के बीच एनसीपी में हुई टूट
बिहार में 23 जून को हुई विपक्ष की बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने कहा था कि 11 या 12 जुलाई को शिमला में अगली बैठक होगी। इसके बाद कहा गया कि यह बैठक शिमाल की जगह जयपुर में हो सकती है। हालांकि, बाद में 13-14 जुलाई को बेंगलुरू में बैठक होने की जानकारी दी गई। इसी बीच, दो जून को महाराष्ट्र में एनसीपी में अजित पवार के नेतृत्व में एक धड़ा टूटकर एनडीए में शामिल हो गया। वहीं इस बड़े सियासी घटनाक्रम के बाद यह तारीख टाल भी दी गई। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बैठक की अगली तारीख 17-18 जुलाई और जगह बेंगलुरू होने की घोषणा की।
बिहार में 23 जून को हुई विपक्ष की बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने कहा था कि 11 या 12 जुलाई को शिमला में अगली बैठक होगी। इसके बाद कहा गया कि यह बैठक शिमाल की जगह जयपुर में हो सकती है। हालांकि, बाद में 13-14 जुलाई को बेंगलुरू में बैठक होने की जानकारी दी गई। इसी बीच, दो जून को महाराष्ट्र में एनसीपी में अजित पवार के नेतृत्व में एक धड़ा टूटकर एनडीए में शामिल हो गया। वहीं इस बड़े सियासी घटनाक्रम के बाद यह तारीख टाल भी दी गई। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बैठक की अगली तारीख 17-18 जुलाई और जगह बेंगलुरू होने की घोषणा की।
पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में हिंसा
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अमर उजाला
बंगाल में पंचायत चुनाव में हिंसा को लेकर भिड़े विपक्षी दल
दूसरी विपक्षी बैठक से पहले पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव हुए। इस दौरान राज्यभर में हिंसा की घटनाएं हुईं और टीएमसी की मानें तो आठ जून को पंचायत चुनाव की घोषणा होने के बाद से 27 लोगों की मौत हुई और उनमें से 17 तृणमूल से हैं। इन घटनाओं की निंदा उन दलों ने भी, जो कुछ दिन पहले पटना में इकट्ठा बैठे थे। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तो हिंसा के बीच धरने पर भी बैठे रहे और आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के गुंडों को खुली छूट मिल रही है और जनादेश को लूटा गया है।
वहीं, माकपा के वरिष्ठ नेता डॉ. सुजान चक्रवर्ती ने से कहा, 'हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है और इन सभी घटनाओं के पीछे सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का हाथ है। उन्होंने मतदान के दिन गड़बड़ी पैदा करने और वोट लूटने के लिए पहले से ही इसकी योजना बना रखी थी।
उधर आरोपों का जवाब देते हुए ममता बनर्जी ने कहा, 'चुनावों के दौरान हिंसा के कारण जानमाल के नुकसान के लिए 'राम, शाम और वाम - भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम जिम्मेदार हैं।' इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने कांग्रेस और सीपीएम पर विरोधाभासी व्यवहार का आरोप लगाया और कहा, 'आप मुझे यहां गाली देंगे, और मैं वहां आपकी पूजा करूंगा...इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती।'
उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'मैं उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहती क्योंकि हम राष्ट्रीय स्तर पर एक मोर्चे के लिए बातचीत कर रहे हैं। लेकिन उन्हें बोलने से पहले सोचना चाहिए।'
दूसरी विपक्षी बैठक से पहले पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव हुए। इस दौरान राज्यभर में हिंसा की घटनाएं हुईं और टीएमसी की मानें तो आठ जून को पंचायत चुनाव की घोषणा होने के बाद से 27 लोगों की मौत हुई और उनमें से 17 तृणमूल से हैं। इन घटनाओं की निंदा उन दलों ने भी, जो कुछ दिन पहले पटना में इकट्ठा बैठे थे। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तो हिंसा के बीच धरने पर भी बैठे रहे और आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के गुंडों को खुली छूट मिल रही है और जनादेश को लूटा गया है।
वहीं, माकपा के वरिष्ठ नेता डॉ. सुजान चक्रवर्ती ने से कहा, 'हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है और इन सभी घटनाओं के पीछे सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का हाथ है। उन्होंने मतदान के दिन गड़बड़ी पैदा करने और वोट लूटने के लिए पहले से ही इसकी योजना बना रखी थी।
उधर आरोपों का जवाब देते हुए ममता बनर्जी ने कहा, 'चुनावों के दौरान हिंसा के कारण जानमाल के नुकसान के लिए 'राम, शाम और वाम - भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम जिम्मेदार हैं।' इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने कांग्रेस और सीपीएम पर विरोधाभासी व्यवहार का आरोप लगाया और कहा, 'आप मुझे यहां गाली देंगे, और मैं वहां आपकी पूजा करूंगा...इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती।'
उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'मैं उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहती क्योंकि हम राष्ट्रीय स्तर पर एक मोर्चे के लिए बातचीत कर रहे हैं। लेकिन उन्हें बोलने से पहले सोचना चाहिए।'
अजित पवार और शरद पवार के बीच राकांपा के लिए रस्साकशी।
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Amar Ujala
दूसरी बैठक में पहले दिन क्यों नहीं आए शरद पवार?
पहले खबर आई कि राकांपा प्रमुख शरद पवार बेंगलुरु में आज होने वाली बैठक का हिस्सा नहीं होंगे। अभी इसके पीछे की वजहों का खुलासा नहीं किया गया है। हालांकि, कहा गया कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले विपक्षी एकता के लिए हो रही बैठक का हिस्सा होंगी। इस बीच, दोबारा जानकारी सामने आई कि बेंगलुरु में संयुक्त विपक्ष की बैठक में एनसीपी प्रमुख शरद पवार आज नहीं, लेकिन कल शामिल होंगे।
शरद पवार के पहले दिन की बैठक से दूरी बनाने को लेकर राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं, 'इसका मतलब राजनीतिक है क्योंकि शरद पवार नेतृत्व करने वाले भाव से थोड़ा अलग हो गए हैं। उनकी परिस्थिति अब नेतृत्व करने वाली नहीं नहीं रही। विपक्ष को एकजुट करने की उनकी एक जो छवि थी, उसके साथ अब एक आरोप जुड़ गया कि जो अपनी पार्टी को साथ नहीं रख सका वो विपक्ष को कैसे एकजुट रख सकेंगे। वह राजनीतिक रूप से दूरदर्शी व्यक्ति हैं वो बैठक में मौजूद रहते और ऐसे में उनको नेतृत्व नहीं मिलता या कोई प्रस्ताव रख दे तो उसे स्वीकार या रिजेक्ट करने में दिक्क्त होती। इससे परहेज करने के लिए उन्होंने पहले दिन न जाकर दूसरे दिन जाने की रणनीति अपनाई। इसका मतलब भी साफ है कि वो विपक्ष के साथ हैं, लेकिन इसका नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं हैं। चूंकि वो वरिष्ठ थे तो उनको नेतृत्व मिल सकता था लेकिन अब 2024 में पवार विपक्षी एकता को लीड नहीं करेंगे।ट
पहले खबर आई कि राकांपा प्रमुख शरद पवार बेंगलुरु में आज होने वाली बैठक का हिस्सा नहीं होंगे। अभी इसके पीछे की वजहों का खुलासा नहीं किया गया है। हालांकि, कहा गया कि उनकी बेटी सुप्रिया सुले विपक्षी एकता के लिए हो रही बैठक का हिस्सा होंगी। इस बीच, दोबारा जानकारी सामने आई कि बेंगलुरु में संयुक्त विपक्ष की बैठक में एनसीपी प्रमुख शरद पवार आज नहीं, लेकिन कल शामिल होंगे।
शरद पवार के पहले दिन की बैठक से दूरी बनाने को लेकर राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं, 'इसका मतलब राजनीतिक है क्योंकि शरद पवार नेतृत्व करने वाले भाव से थोड़ा अलग हो गए हैं। उनकी परिस्थिति अब नेतृत्व करने वाली नहीं नहीं रही। विपक्ष को एकजुट करने की उनकी एक जो छवि थी, उसके साथ अब एक आरोप जुड़ गया कि जो अपनी पार्टी को साथ नहीं रख सका वो विपक्ष को कैसे एकजुट रख सकेंगे। वह राजनीतिक रूप से दूरदर्शी व्यक्ति हैं वो बैठक में मौजूद रहते और ऐसे में उनको नेतृत्व नहीं मिलता या कोई प्रस्ताव रख दे तो उसे स्वीकार या रिजेक्ट करने में दिक्क्त होती। इससे परहेज करने के लिए उन्होंने पहले दिन न जाकर दूसरे दिन जाने की रणनीति अपनाई। इसका मतलब भी साफ है कि वो विपक्ष के साथ हैं, लेकिन इसका नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं हैं। चूंकि वो वरिष्ठ थे तो उनको नेतृत्व मिल सकता था लेकिन अब 2024 में पवार विपक्षी एकता को लीड नहीं करेंगे।ट
केसी वेणुगोपाल
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अमर उजाला
आप की शर्त के सामने क्यों झुकी कांग्रेस?
दूसरी बैठक के एक दिन पहले रविवार को कांग्रेस ने दिल्ली अध्यादेश पर आप के साथ जाने का एलान किया। पार्टी के महासचिव महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि प्रमुख विपक्षी दल अध्यादेश का समर्थन नहीं करेंगे। उन्होंने आप के बैठक में शामिल होने की उम्मीद जताई और कहा कि जहां तक दिल्ली अध्यादेश का सवाल है, हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है। हम इसका समर्थन नहीं करने जा रहे हैं।
उधर इस घोषणा के बाद आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता में रविवार को उसकी पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की बैठक हुई। बैठक के बाद आप के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बताया कि बंगलुरू में समान विचारधारा वाले दलों की होने जा रही बैठक में अरविंद केजरीवाल के शामिल होने का निर्णय लिया गया है।
इस पर प्रेम कुमार कहते हैं, 'इस घटनाक्रम के दो मायने निकाले जाने चाहिए। पहला यह कि कांग्रेस ने अपमान का घूंट पिया है और पार्टी ने एक बड़े गोल के सामने इस अपमान को बहुत तुच्छ समझा है। बड़ा लक्ष्य विपक्षी एकता है, ऐसे में किसी की शर्त को मान लेने जैसी स्थिति को भी उन्होंने स्वीकार किया है। उधर आप द्वारा इस तरह की शर्त रखना कहीं से वाजिब नहीं था क्योंकि देश में और भी मुद्दे हैं। विपक्षी एकता के लिए कोई शर्त रखे, यह अच्छी मानसिकता नहीं है। कांग्रेस की ये दूरदर्शिता को दिखाता है कि दिल्ली इकाई की इच्छा के उल्ट जाकर कांग्रेस आलाकमान निर्णय लेती है क्योंकि यह राष्ट्रीय हित के लिए जरूरी है।'
उनका कहना है, 'दूसरा मायने आप के लिए है कि आप कांग्रेस से दूरी बनाकर चलती थी। ये बड़ा परिवर्तनकारी समय है कि जब उसने मांग करके समर्थन लिया है न कि स्वतः मिला है। राजनीतिक रूप से उनको लग सकता है कि उनकी जीत है लेकिन वास्तव में जिस कांग्रेस के खिलाफ आप पैदा हुई। कांग्रेस के साथ जाकर अपने सिद्धांतों से भटकती हुई दिख रही है।'
इसी मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं, 'दोनों दलों का साथ आना राजनीतिक मजबूरियां हैं। एक है कि आप के दो नेता जेल में हैं और बाकी पर भी तलवार लटकी है। तो चाहकर भी वो एक दूसरे से दूर नहीं रह सकते। दूसरा यह है कि कांग्रेस और आप दोनों अपने सेकुलर या मुस्लिम वोटर को यह दिखाना चाहते हैं कि भले ही उनमें कितना ही अंतर्विरोध है लेकिन विपक्षी एकता के लिए वो साथ हैं।'
दूसरी बैठक के एक दिन पहले रविवार को कांग्रेस ने दिल्ली अध्यादेश पर आप के साथ जाने का एलान किया। पार्टी के महासचिव महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि प्रमुख विपक्षी दल अध्यादेश का समर्थन नहीं करेंगे। उन्होंने आप के बैठक में शामिल होने की उम्मीद जताई और कहा कि जहां तक दिल्ली अध्यादेश का सवाल है, हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है। हम इसका समर्थन नहीं करने जा रहे हैं।
उधर इस घोषणा के बाद आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता में रविवार को उसकी पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की बैठक हुई। बैठक के बाद आप के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बताया कि बंगलुरू में समान विचारधारा वाले दलों की होने जा रही बैठक में अरविंद केजरीवाल के शामिल होने का निर्णय लिया गया है।
इस पर प्रेम कुमार कहते हैं, 'इस घटनाक्रम के दो मायने निकाले जाने चाहिए। पहला यह कि कांग्रेस ने अपमान का घूंट पिया है और पार्टी ने एक बड़े गोल के सामने इस अपमान को बहुत तुच्छ समझा है। बड़ा लक्ष्य विपक्षी एकता है, ऐसे में किसी की शर्त को मान लेने जैसी स्थिति को भी उन्होंने स्वीकार किया है। उधर आप द्वारा इस तरह की शर्त रखना कहीं से वाजिब नहीं था क्योंकि देश में और भी मुद्दे हैं। विपक्षी एकता के लिए कोई शर्त रखे, यह अच्छी मानसिकता नहीं है। कांग्रेस की ये दूरदर्शिता को दिखाता है कि दिल्ली इकाई की इच्छा के उल्ट जाकर कांग्रेस आलाकमान निर्णय लेती है क्योंकि यह राष्ट्रीय हित के लिए जरूरी है।'
उनका कहना है, 'दूसरा मायने आप के लिए है कि आप कांग्रेस से दूरी बनाकर चलती थी। ये बड़ा परिवर्तनकारी समय है कि जब उसने मांग करके समर्थन लिया है न कि स्वतः मिला है। राजनीतिक रूप से उनको लग सकता है कि उनकी जीत है लेकिन वास्तव में जिस कांग्रेस के खिलाफ आप पैदा हुई। कांग्रेस के साथ जाकर अपने सिद्धांतों से भटकती हुई दिख रही है।'
इसी मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं, 'दोनों दलों का साथ आना राजनीतिक मजबूरियां हैं। एक है कि आप के दो नेता जेल में हैं और बाकी पर भी तलवार लटकी है। तो चाहकर भी वो एक दूसरे से दूर नहीं रह सकते। दूसरा यह है कि कांग्रेस और आप दोनों अपने सेकुलर या मुस्लिम वोटर को यह दिखाना चाहते हैं कि भले ही उनमें कितना ही अंतर्विरोध है लेकिन विपक्षी एकता के लिए वो साथ हैं।'
बेंगलुरु में लगे विपक्षी दलों के नेताओं के पोस्टर।
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अमर उजाला
अब जानते हैं कि दूसरी बैठक में किन दलों की भागीदारी होगी?
विपक्षी एकता की बढ़ती ताकत को दिखाते हुए बेंगलुरु में कुल 26 दलों के शामिल होने की उम्मीद है। यह संख्या पटना में हुई बैठक से 10 से भी ज्यादा है। बताया जा रहा है कि इस बीच, विपक्षी नेता एक अनौपचारिक बैठक में शामिल होंगे। इसके बाद सोमवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया रात्रिभोज आयोजित करेंगे और मंगलवार सुबह 11 बजे से एक मैराथन बैठक होगी।
ये हैं नई पार्टियां
. मरूमलारची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके)
. कोंगु देसा मक्कल काची (केडीएमके)
. विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके)
. रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी)
. ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक
. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
. केरल कांग्रेस (जोसेफ)
. केरल कांग्रेस (मणि)
जानकारी के मुताबिक, इसके अलावा कृष्णा पटेल का अपना दल (कामेरावादी) और एमएच जवाहिरुल्ला के नेतृत्व वाली तमिलनाडु की मनिथानेया मक्कल काची (एमएमके) को भी निमंत्रण भेजे जाने के बाद मोर्चे में शामिल होने की संभावना है। वहीं आरएलडी की ओर से जयंत चौधरी इस जुटान में शिरकत करेंगे जो पहली बैठक में नहीं थे।
विपक्षी एकता की बढ़ती ताकत को दिखाते हुए बेंगलुरु में कुल 26 दलों के शामिल होने की उम्मीद है। यह संख्या पटना में हुई बैठक से 10 से भी ज्यादा है। बताया जा रहा है कि इस बीच, विपक्षी नेता एक अनौपचारिक बैठक में शामिल होंगे। इसके बाद सोमवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया रात्रिभोज आयोजित करेंगे और मंगलवार सुबह 11 बजे से एक मैराथन बैठक होगी।
ये हैं नई पार्टियां
. मरूमलारची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके)
. कोंगु देसा मक्कल काची (केडीएमके)
. विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके)
. रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी)
. ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक
. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
. केरल कांग्रेस (जोसेफ)
. केरल कांग्रेस (मणि)
जानकारी के मुताबिक, इसके अलावा कृष्णा पटेल का अपना दल (कामेरावादी) और एमएच जवाहिरुल्ला के नेतृत्व वाली तमिलनाडु की मनिथानेया मक्कल काची (एमएमके) को भी निमंत्रण भेजे जाने के बाद मोर्चे में शामिल होने की संभावना है। वहीं आरएलडी की ओर से जयंत चौधरी इस जुटान में शिरकत करेंगे जो पहली बैठक में नहीं थे।
विपक्षी एकता के लिए बेंगलुरु कूच को तैयार
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अमर उजाला
किन मुद्दों पर होगी चर्चा?
बैठक से पहले कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टियां उन साझा कार्यक्रमों पर गौर करेंगी, जिन पर काम किया जा सकता है। जैसे- आम मुद्दे जिन्हें उजागर किया जाना चाहिए और आने वाले समय के लिए एक रोडमैप तैयार किया जाएगा।
इन सामान्य मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना:
बैठक से पहले कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टियां उन साझा कार्यक्रमों पर गौर करेंगी, जिन पर काम किया जा सकता है। जैसे- आम मुद्दे जिन्हें उजागर किया जाना चाहिए और आने वाले समय के लिए एक रोडमैप तैयार किया जाएगा।
इन सामान्य मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना:
- पार्टियों को भविष्य में क्या करने की आवश्यकता है?
- वर्तमान राजनीतिक स्थिति का आकलन करना।
- आकलन के बाद आगामी संसद सत्र के लिए रणनीति बनाएं।
- समस्याओं पर रोडमैप होगा तैयार