क्या ऐसे बचेंगी और पढ़ेंगी हमारी बेटियां?
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‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के आकर्षक नारे के बीच दिल्ली के एक कथित प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ने वाली एक बेटी जान दे देती है। प्रिंसिपल साहब माथे पर टीका लगाए संस्कारी और धार्मिक होने का ढोंग करते हैं। वह इस घटना पर बेशर्मी से हंसते हैं और लड़की का दोष बताकर टीचर्स को बेदाग बता देते हैं। नवीं क्लास में पढ़ने वाली यह बेटी अपनी प्रतिभा की बदौलत कई बार स्कूल का नाम रौशन कर चुकी थी, पंडित बिरजू महाराज के शिष्य रहे अपने पिता के हुनर का सम्मान करते हुए नन्हीं सी उमर में इस बच्ची ने कथक में मंच पर कई बार कमाल दिखाया था। जिससे साफ था कि आने वाले दिनों में यह प्रतिभा देश का नाम रौशन करेगी।
नृत्य भी एक हुनर है यानी स्किल। ‘स्किल इंडिया’ के नारे वाले इस देश में स्किल या हुनर का ऐसा अपमान होता रहता है। यह घटना चूंकि दिल्ली के एक प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल की है, इसलिए सामने आ गई। देश के तमाम शहरों में, दूर दराज के इलाकों में ऐसी न जाने कितनी हुनरमंद प्रतिभाएं हैं जो स्कूली माहौल, टीचर्स की यातनाओं और उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ देती हैं, यह तफ्तीश का विषय है।
पब्लिक स्कूलों में बच्चों की उपेक्षा, उनका शोषण और उन्हें हतोत्साहित करके फेल करने की घटनाएं नई नहीं हैं। बच्चियों को गलत निगाह से देखने और उनके साथ बदसलूकी करने वाले मानसिक रूप से विकृत शिक्षकों की शिकायतें कई बार बच्चे घर पर करते हैं। लेकिन ज्यादातर माता पिता अपने बच्चों को ही समझा बुझाकर शांत कर देते हैं। उन्हें डर होता है कि शिक्षकों के खिलाफ शिकायत करने से कहीं उनके बच्चे का भविष्य न खराब हो जाए।
इतनी मुश्किलों से स्कूलों में दाखिला मिलता है, कहीं इसकी वजह से उनके बच्चे को स्कूल से हटा न दिया जाए, कहीं टीचर्स बच्चे को फेल न कर दें, कहीं उसे हीन भावना से न भर दें या कहीं उनका बच्चा सबसे पीछे न धकेल दिया जाए... ऐसे तमाम डर और आशंकाएं इन स्कूलों ने बच्चों के साथ साथ अभिभावकों में भर रखी हैं। जिसका खामियाजा सीधे तौर पर बच्चों को भुगतना पड़ता है।
गुड़गांव के एक नामी स्कूल में नन्हा प्रद्युम्न मार दिया जाता है। स्कूल की सुरक्षा से लेकर उसके प्रशासन तक पर गंभीर सवाल उठते रह जाते हैं। लेकिन महीनों के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती। सियासी रसूख वाले इन मालिकानों के लिए बच्चों के जान की कीमत क्या है, इससे साफ हो जाता है। पीलीभीत में पिछले साल हुई घटना याद कीजिए। स्कूल की फीस न दे पाने की वजह से कैसे एक गरीब छात्र और उसके पिता ने खुदकुशी कर ली थी। कैसे सीकर के एक स्कूल में एक्स्ट्रा क्लास के नाम पर छात्राओं के साथ टीचर्स के यौन शोषण का मामला सामने आया था।
ऐसा ही एक मामला कोलकाता के एक स्कूल से भी आया था, जहां दस साल की एक लड़की ने स्कूली माहौल से परेशान होकर जान दे दी थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देखें तो देश में हर रोज कोई न कोई छात्र या छात्रा खुदकुशी करने को मजबूर है। अकेले 2015 में करीब 9 हजार छात्रों ने खुदकुशी की। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ये संख्या काफी ज्यादा है।
लेकिन सवाल आंकड़े गिनने या उसे देखकर परेशान होने का नहीं है। दिल्ली के मयूर विहार के प्रतिष्ठित स्कूल इस बच्ची की खुदकुशी ने जो सवाल छोड़े हैं, वो बेहद गंभीर हैं। क्या अब ऐसे नामी स्कूलों में गुंडों का राज है? क्या शिक्षकों को बच्चों के साथ बदसलूकी करने, उन्हें फेल करने और उनके साथ बदसलूकी करने का लाइसेंस दे दिया गया है? क्या स्कूल प्रशासन महज कमाई करने के नाम पर बच्चों के साथ कुछ भी कर सकता है और मौत के बाद भी स्कूल के शिक्षक और प्रिंसिपल पूरी दबंगई के साथ खुद को निर्दोष बताकर हंसते हुए ऐसी घटनाओं से पल्ला झाड़ सकते हैं? क्या ऐसे बचेंगी और पढेंगी हमारी बेटियां और क्या यही है स्किल इंडिया मिशन का असली चेहरा?