अयोध्या मामला : इतिहास की गवाही देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में 'हाजिर' हुए ये दस्तावेज
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अयोध्या मामले पर सुनवाई के आखिरी दिन बुधवार को हिंदू पक्ष ने एक किताब के नक्शे को सबूत के तौर पर पेश करना चाहा। मगर मुस्लिम पक्ष के वकील ने उसे मुख्य न्यायाधीश के सामने ही फाड़ दिया। इस पूरे कोर्टरूम ड्रामे पर काफी हंगामा भी खड़ा हो गया और मामला सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गया। हालांकि इस बरसों पुराने विवाद में पहले भी कई बार किताबों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को 'गवाह' बनाने की कोशिश की गई। आइए जानते हैं इन्हीं के बारे में।
विलियम फोस्टर की 'अर्ली ट्रैवल इन इंडिया'
अयोध्या विवाद में हिंदू पक्ष की ओर से पेश वकील सी.एस. वैद्यनाथन ने सुनवाई के दौरान अंग्रेज लेखक विलियम फोस्टर की किताब 'अर्ली ट्रैवल इन इंडिया' का जिक्र किया था। इस किताब में अकबर और जहांगीर के काल में भारत आने वाले ट्रैवलर्स विलियम फिंच और विलियम हॉकिंंस के यात्रा वृतांतों का वर्णन है। वैद्यनाथन ने दावा किया था कि इस किताब में अयोध्या और राम मंदिर का जिक्र किया गया है।
जोसेफ टाईफेंथेलर के यात्रा वृतांत
जोसेफ टाईफेंथेलर ईसाई मिशनरी होने के साथ भूगोल के अच्छे जानकार भी थे। 1740 में भारत आने के बाद उन्होंने गंगोत्री से कोलकाता तक गंगा किनारे यात्रा की और इसका विस्तृत नक्शा भी तैयार किया। सुनवाई के दौरान इनके दस्तावेजों का भी जिक्र हुआ। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि जोसेफ टाईफेंथेलर ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि हिंदुओं का इस बात पर विश्वास है कि अयोध्या ही भगवान राम का जन्मस्थान है और मंदिर को ढहाने के बाद मस्जिद बनाई गई।
बाबरनामा का भी आया जिक्र
अयोध्या सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा था कि बाबरी मस्जिद शब्द का इस्तेमाल कब किया जाना शुरू हुआ। इस पर हिंदू पक्ष के वकील ने कहा कि 19वीं सदी में शायद पहली बार यह नाम लिया गया। इससे पहले के कोई सबूत नहीं मिलते हैं। वर्ष 1786 से पहले ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं, जिसमें इस जगह को बाबरी मस्जिद कहा गया हो। वैद्यनाथन ने कहा, 'बाबर ने अपनी सेना को मस्जिद बनाने का आदेश दिया था। बाबरनामा में बाबर के अयोध्या आने का जिक्र भी है।' हालांकि मुस्लिम पक्ष ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि इस अध्याय के दो पन्ने गायब हैं।
रॉबर्ट मोंटगोमेरी मार्टिन
हिंदू पक्ष के वकील सी.एस.वैद्यनाथन ने अपनी दलील के दौरान एक और ब्रिटिश सर्वेअर रॉबर्ट मोंटगोमेरी मार्टिन का भी जिक्र किया। मार्टिन 1807 से 1814 के दौरान भारत आए थे। वैद्यनाथन ने उनके हवाले से कहा, 'लगातार होने वाली तीर्थयात्रा और श्रद्धालुओं का विश्वास इस जगह को लेकर है, जिसे जन्मस्थान कहा जाता है।'