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संघ के इन चार प्रचारकों ने गढ़ा बिप्लब देब को

Wed, 07 Mar 2018 07:42 AM IST
संजय मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
संजय मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 07 Mar 2018 07:42 AM IST
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these four sangh pracharak behind Biplab Kumar Deb Success
बिप्लब कुमार देब
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बन रहे बिप्लब देब की तकदीर बेशक संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल की एक परीक्षा ने बदली, मगर उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में राम चंद्र सहस्‍त्रभोजनी (राम दा), राकेश गोस्वामी, केएन गोविंदाचार्य और रमेश सिलेदार सरीखे संघ के चार वरिष्ठ प्रचारकों का अहम योगदान रहा है। ये चारों प्रचारक इस वक्त बेशक भगवा परिवार की सियासी चकाचौंध से ओझल हैं, मगर इन्हें इस बात की खुशी है कि उनके मार्गदर्शन में पला-बढ़ा एक स्वयंसेवक वैचारिक रूप से अहम त्रिपुरा सरीखे राज्य में वाम को धूल चटाकर मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। 
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राम दा तो अब भी प्रचारक हैं। अस्वस्थता के बावजूद भी वे संघ मुख्यालय नागपुर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। राम दा ही वे प्रचारक हैं जिनकी उंगली पकड़कर बिप्लब ने सामाजिक जीवन में चलना सीखा है। बिप्लब को त्रिपुरा से दिल्ली पहुंचने में मदद राम दा ने ही की थी। उसके बाद बिप्लब को राकेश गोस्वामी ने राह दिखाई। गोस्वामी उस वक्त दिल्ली के झंडेवालान स्थित संघ कार्यालय में बतौर प्रचारक कार्यरत थे। बाद में गोस्वामी सुरुची प्रकाशन का कार्य देखने लगे तो बिप्लब ने भी उनके सहयोगी के तौर पर सुरुची प्रकाशन में कार्य किया। सुरुची प्रकाशन संघ के साहित्यों को प्रकाशित करने वाली संस्था है। गोस्वामी ने ही बिप्लब को तत्कालीन भाजपा महासचिव केएन गोविंदाचार्य के साथ जोड़ा और बिप्लब गोविंदाचार्य के साथ कार्य करने लगे। इसके बाद उनका संपर्क चौथे प्रचारक रमेश सिलेदार से हुआ।

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रमेश सिलेदार ने उन्हें पूर्वोत्तर के प्रचारकों और संघ अधिकारियों संग संपर्क रखने की नसीहत दी। सिलेदार बताते हैं कि उस वक्त जब बिप्लब से उनकी पहली मुलाकात हुई, तब असम के वरिष्ठ प्रचारक गौरी शंकर चक्रवर्ती (गौरी दा) अपना इलाज कराने के लिए दिल्ली के अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने बिप्लब को गौरी दा से मिलकर उनका हाल—चाल जानने की नसीहत दी। इसके अलावा उन्होंने पूर्वोत्तर में संघ के तत्कालीन क्षेत्रीय प्रचारक एवं वर्तमान में संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल से भेंट करने की भी सलाह दी। उसके बाद बिप्लब पूर्वोत्तर से दिल्ली आने वाले सभी प्रमुख संघ अधिकारियों के संपर्क में रहने लगे। उनके इस सपंर्क ने ही उनकी तकदीर बदली। कृष्ण गोपाल ने उनकी अपरोक्ष परीक्षा ली, जिसमें वे सफल रहे और मुख्यमंत्री बनने का उनका द्वार अब से तीन वर्ष ही पहले खुल गया था, जब वे कृष्ण गोपाल की परीक्षा में पास हुए।

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क्या थी कृष्ण गोपाल की परीक्षा? 

बिप्लब देब की तकदीर बदलने वाली संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल की परीक्षा 3 साल पहले की एक घटना है। मार्च 2‌015 की शुरुआत में एक दिन सुबह बिप्लब जब रूटीन के तहत कृष्ण गोपाल से मिलने दिल्ली के झंडेवालान स्थित संघ कार्यालय पहुंचे तो कृष्ण गोपाल ने उन्हें बड़े निर्णय का ऑफर कर दिया। एक तरह से कृष्ण गोपाल ने बिप्लब के सामने यह ऑफर देकर उसे तौलना चाहा कि उसमें पूर्वोत्तर को लेकर अब भी प्रेम बचा है कि नहीं। दरअसल कृष्ण गोपाल ने जो ऑफर दिया था वह बड़ा ही खतरनाक था।

कृष्ण गोपाल ने बिप्लब को त्रिपुरा जाकर भाजपा की राजनीति करने का ऑफर उस वक्त दिया जब वहां पार्टी का आधार ही नहीं था। लोकसभा चुनाव 2014 में भी यहां भाजपा के खाते में महज 1.3 प्रतिशत वोट मिले थे। ऐसे में दिल्ली की चमक दमक छोड़ पत्थर पर घास उगाने सरीखे कार्य के लिए शायद ही कोई तैयार होता। मगर बिप्लब ने कृष्ण गोपाल के निर्देश को स्वीकारते हुए त्रिपुरा लौटकर राजनीति का निर्णय लिया। कृष्ण गोपाल ने उनके सामने यह शर्त रखी था कि वह अभी निर्णय लें कि वह दिल्ली में अपनी जमी-जमाई गृहस्थी में रहना चाहता है अथवा त्रिपुरा की कमान संभालना चाहता है। दिल्ली के ठाठ-बाट और सिस्टम से जाने का फैसला लेना तब बिप्लब के लिए भी मुश्किल था।

क्योंकि यहां पत्नी की सरकारी नौकरी और बच्चों की पढ़ाई के अलावा बिप्लब की खुद की सत्ता के गलियारों से लेकर भाजपा संगठन में मजबूत पकड़ थी। लेकिन अपना फैसला सुनाने से पहले बिप्लब ने एक दिन का समय कृष्ण गोपाल से मांगा। मगर कृष्ण गोपाल थे कि उन्होंने तत्काल फैसला लेने को कहा। हालांकि बिप्लब के प्रति स्नेह के कारण उन्होंने उसे एक दिन का समय दिया साथ में यह शर्त भी जोड़ी कि वह इस बात को किसी से साझा नहीं करे। अगले दिन बिप्लब ने कृष्णगोपाल से मिलकर जब उन्हें अपना फैसला बताया तो संघ सह सरकार्यवाह बेहद प्रसन्न हुए। मानो जैसे की उन्हें कोई नगीना मिल गया हो। बिप्लब को उन्होंने तुरंत प्रभाव से त्रिपुरा जाकर भाजपा की राजनीति में सक्रियता बनाने को कहा।

उनके निर्देशों का पालन करते हुए बिप्लब मई में त्रिपुरा चले गए और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बाद में उन्हें संपर्क अभियान का प्रभारी बनाया। उसके बाद वर्ष 2016 में वे राज्य भाजपा के अध्यक्ष बने। हालांकि प्रदेश के कुछ नेता एवं कार्यकर्ताओं की ओर से उनका विरोध भी हुआ। लेकिन अपने मृदुभाषी रवैये से बिप्लब ने सबको साथ लिया और सूबे में भाजपा की एक ऐसी फौज तैयार की जो कि वाम से उसकी शैली में ही लोहा ले सके। हालांकि बाद में उनके मित्र स्वरूप नेता सुनील देवधर सूबे के प्रभारी बने। बिप्लब और देवधर की जोड़ी ने जमकर पसीना बहाया और सूबे में संगठन को मजबूत बनाया। चुनावी रणनीति को अंजाम देने के लिए बाद में भाजपा ने लकी महासचिव राम माधव को प्रदेश की रणनीति से जोड़ दिया। 

खुद कष्ट सहकर दूसरों की चिंता करने वाले हैं बिप्लब

बिप्लब को गढ़ने वालों में शुमार पूर्व भाजपा संगठन महासचिव केएन गोविंदाचार्य ने अपनी खुशी का इजहार करते हुए बताया कि उन्होंने बिप्लब को मुख्यमंत्री बनने के बाद गरीबों की चिंता करने की नसीहत दी है। बतौर गोविंदाचार्य, बिप्लब हमेशा से ही स्वयं कष्ट सहकर दूसरों की चिंता करने वाला व्यक्ति रहा है। उनके साथ कार्यालय पर रहते हुए कई दफे ऐसे अवसर आए जब बिप्लब ने अतिथि सत्कार के क्रम में अपनी फोल्डिंग दूसरों को देकर खुद दरी बिछाकर नीचे जमीन पर सोना मुनासिब समझा।

उसकी दूसरी खूबी यह है कि वह कभी साधनों की चिंता नहीं करता है। सिद्धांत एवं मूल्यों के प्रति हमेशा गंभीर रहा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उससे यही अपेक्षा रहेगी। पूर्व प्रचारक राकेश गोस्वामी जिन्होंने शुरुआती दिनों में बिप्लब को दिल्ली में सहारा दिया। उनका कहना है कि शुरू से ही बिप्लब की प्रवृत्ति सौम्य एवं मृदुभाषी रही है। बिप्लब हमेशा कार्ययोजना बनाकर ही काम करते हैं। उसके नेतृत्व में त्रिपुरा का विकास होगा। वहीं सिलेदार का कहना है कि संघ की मूल भावनाओं को जीवन में उतारने के साथ बिप्लब में अपार संगठन क्षमता है। उसके मृदुभाषी और सरल स्वभाव का होना उसके पक्ष में जाता है। इसी के बदौलत कम समय में वह त्रिपुरा सरीखे राज्य में वाम को धूल चटाने में सफल रहा है। 

बस यही है त्रिपुरा भाजपाध्यक्ष की कहानी

बिप्लब देब वर्तमान में त्रिपुरा भाजपा के अध्यक्ष हैं। उनकी क्षमता में विश्वास जताते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 9 मई 2015 को उन्हें त्रिपुरा के लिए जन संपर्क अभियान का प्रमुख बनाया था। उनकी कार्यकुशलता को देख शाह ने उन्हें 6 जनवरी 2016 को त्रिपुरा भाजपा का अध्यक्ष बनाया। बिप्लब का जन्म 29 नवंबर 1971 को गोमती त्रिपुरा के राजधर नगर में हुआ था। परिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है, इसलिए बचपन से ही बिपल्ब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। संघ में विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए बिप्लब ने संघ की प्रथम वर्ष शिक्षा भी ग्रहण की है। उनके पिता हीरूधन देब त्रिपुरा में जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में एक रहे।

जनसंघ के टिकट पर हीरूधन ने तीन दफे चुनाव भी लड़ा था। दीन दयाल उपाध्याय और केशव राम बलिराम हेडगेवार को अपना आदर्श मानने वाले बिप्लब का संघ के प्रचारकों से बेहद लगाव रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनका संपर्क उस वक्त हुआ था जब मोदी भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री थे, तब से ही मोदी उनके आदर्श बन गए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की संगठन क्षमता के बिप्लब बेहद कायल हैं। शाह की संगठन क्षमता ने उन पर खासा प्रभाव छोड़ा है। संगठन में शाह को अपना रोल मॉडल मानते हुए ही बिप्लब ने त्रिपुरा में जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत बनाया और 42 हजार पन्ना प्रमुखों की फौज तैयार की।

अगरतला से स्नातक की डिग्री के बाद वर्ष 1989 में वह दिल्ली आ गए थे। कुछ दिनों तक संघ कार्यालय में कार्य करने के बाद बिपल्ब ने संघ से जुड़ी सुरुची प्रकाशन में काम किया। वहां से वे तत्कालीन भाजपा महासचिव गोविंदाचार्य के संपर्क में आए और वे उनके साथ कार्य करने लगे। राजग एक की सरकार बनने के बाद बिप्लब ने केंद्रीय मंत्री रीता वर्मा के साथ सहयोगी के रूप में कार्य किया। उसके बाद वे मध्य प्रदेश के सतना से सांसद गणेश सिंह के साथ बतौर सहयोगी के रूप में जुड़े। इस बीच उनकी सक्रियता संघ और भाजपा में विभिन्न रूप से बनी रही। बाल आप्टे और प्यारे लाल खंडेलवाल सरीखे तत्कालीन भाजपा नेताओं संग बिप्लब का लगातार संपर्क रहा है।

कुशाभाऊ ठाकरे से लेकर वेंकैया नायडू तक का विशेष स्नेह रहा है। दिल्ली में रहते हुए भी त्रिपुरा के विकास की चिंता करते रहे। संघ की संस्थाओं के जरिए पूर्वोत्तर में चलने वाले प्रकल्पों को यहां से मदद भी करते थे। संघ—भाजपा के अलावा बिप्लब देब कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े रहे। बिप्लब की शादी दिल्ली की नीति देब से हुई। वर्तमान में नीति स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत हैं। उनकी एक पुत्री और एक पुत्र हैं। भारतीय गृहणी की तरह नीति का सहयोग बिप्लब को हमेशा मिलता रहा है। 

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