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EPF के लिए इन्हीं महिलाओं ने खोला था मोर्चा, करोड़ों भारतीयों को मिली राहत

Tue, 26 Apr 2016 01:36 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 26 Apr 2016 01:36 PM IST
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The women behind rollback of proposed changes in PF withdrawal scheme
19 अप्रैल को ईपीएफ नियमों में बदलाव के विरोध में बंगलूूरू में हिंसक प्रदर्शन हुए थे। - फोटो : Hindustan Times

केंद्र सरकार ने पिछले हफ्ते कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) निकालने की नियमों में बदलाव किया था, जिसके विरोध में बंगलूरू में हिंसक प्रदर्शन हुए और सरकार को पैर पीछे खींचने पड़े। विरोध का नेतृत्व बंगलूरू की एक गारमेंट फैक्ट्री के कर्मचारियों ने किया, जिसमें महिलाएं अग्रणी थी। रत्ना उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। बंगलूरू के बाहरी इलाके पीनया औद्योगिक क्षेत्र की एक फैक्ट्री टेक्सपोर्ट्स क्रिएशन में पिछले कई सालों से काम कर रही रत्ना की तनख्वाह महज 6,500 रुपए महीना है, जिसमें से अधिकांश पैसे केवल मकान के किराए में खर्च हो जाते हैं। वे रोजाना छह किमी सफर कर फैक्‍ट्री आती हैं। 

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रत्ना के पति की दशक भर पहले मौत हो गई और अपनी दोनों बे‌टियों की पढ़ाई का जिम्‍मा उन्हीं पर है। कॉलेज जा रही दोनों बेटियों और घर के तमाम खर्चों के लिए वो ईपीएफ की ही रकम पर निर्भर हैं। पीएफ निकालने के नियमों में बदलाव के बाद उन्हें विरोध प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतरना पड़ा। 
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हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे हर पांचवे साल पर अपना पीएफ निकालती हैं, जो कि तकरीबन 20,000 रुपए होता है और उसी से बेटियों की पढ़ाई का खर्च उठाती हैं। उन्होंने कहा कि अगर हमें पीएफ की दूगनी रकम (नियोक्ता और कर्मचारी का अंशदान) न मिले तो हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।

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बंगलूरू में हुए प्रदर्शनों से 1,500 करोड़ का नुकसान हुआ

The women behind rollback of proposed changes in PF withdrawal scheme

रत्ना और उनके साथियों ने 19 अप्रैल का ईपीएफ नियमों में बदलाव के विरोध में हिंसक प्रदर्शन किया था। उन्होंने सड़कों पर जाम लगा दिया और पुलिस से भी झड़प हुई। 100 से ज्यादा वाहनों को आग लगा दिया और 43 पुलिसवालों को चोटे आईं। 80 से ज्यादा कर्मचारियों और प्रत्यक्षदर्शियों को भी चोट आई। कर्मचारियों के विरोध के कारण दो तीन दिन तक फैक्ट्री बंद करनी पड़ी, जिससे तकरीबन 1,500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।  

उल्लेखनीय है कि पिछले हफ्ते केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान कानून, 1952 में संशोधन करन कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के सदस्यों को घर की खरीदारी, गंभीर बीमारियों के इलाज, शादी और बच्चों की प्रोफेशनल शिक्षा के लिए ईपीएफ की पूरी राशि निकालने की अनुमति देने का प्रस्ताव दिया था और उसे अनुमति के लिए कानून मंत्री के पास भी भेज दिया गया था।

ईपीएफ में हर महीने एक कर्मचारी की तनख्वाह की 12 फीसदी राशि जमा होती है, नियोक्ता भी उसी के अनुपात में अंशदान देता है। रत्ना ने बताया,''हमारी फैक्ट्री की 950 महिलाओं में केवल चार या पांच की ही पांच या 10 साल की लगातार की नौकरी होगी। हमने जब ये खबर पढ़ी की सरकार ने पीएफ निकालने के नियम बदल दिए हैं, हम परेशान हो गए। बंगलूरू में तकरीबन 700 गारमेंट फै‌क्ट्रियां हैं, जिनमें 12 लाख से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। श्रम मंत्रालय ने फरवरी में जारी नो‌‌‌‌टीफिकेशन में कहा था कि कर्मचारी केवल अपना अंशदान और उस पर अर्जित ब्याज निकाल सकते हैं। वे नियोक्ता के अंशदान को नहीं निकाल सकते। 

प्रदर्शन के बाद केंद्र सरकार को झुकना पड़ा

The women behind rollback of proposed changes in PF withdrawal scheme

बंगलूरू में ही एक फैक्ट्री में काम करने वाली भारती ने बताया, "कई महिलाएं ऐसी हैं, जो चंद महीने ही किसी फैक्ट्री में काम करती हैं और बचत के तौर पर पीएफ इकट्ठा करती हैं। कुछ महीनों बाद नौकरी छोड़ती हैं और पीएफ के पैसे निकाल लेती हैं ताकि अपने बच्‍चों की फीस जमा कर सकें। हम बहुत ही अन्याय और शोषण बर्दास्त करते हैं, और ये तो हद ही थी।" 

अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए रत्ना घर पर पेटिकोट सिला करती हैं। उन्होंने बताया कि कई महिलाएं फैक्ट्री जाने से पहले बतोरी नौकरानी काम करती हैं और कुछ अगरबत्ती बनाती हैं। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं किया जा सकता। 

रत्ना ने बताया कि ऐसे फैसले से केवल फैक्ट्री के मालिकों को फायदा होगा, जो ग्रेच्युटी देने से बच जाएंगे। एक अन्य महिला अंसुयम्मा ने बताया कि फैक्ट्री मालिक कहते हैं कि वे हमें दोगुना पीएफ नहीं देंगे। लेकिन हम इस मानेंगे नहीं, हमें मर भी जाना पड़े। अंसुयम्मा की साथ काम करने वाली आशा और पवित्रा को उस प्रदर्शन में सिर में गंभीर चोटें आईं। पुलिस ने अपने पीएफ के हक में प्रदर्शन कर रही दो महिलाओं को सिर और मुंह में मारा था, जिससे वो ‌बोल भी नहीं पा रही हैं। पुलिस ने उस प्रदर्शन में शामिल हजारों कर्मचारियों पर मुकदमा भी दर्ज किया है। उन महिलाओं के प्रदर्शन का ही नतीजा था कि सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और पांच करोड़ भारतीयों को राहत मिली।

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