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इन वजहों से मज़बूत होती जा रही है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी

Mon, 24 Jul 2017 11:53 AM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Mon, 24 Jul 2017 11:53 AM IST
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The Reasons For Modi Being Stronger Than Ever
NDA
बीते गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद भारत के राष्ट्रपति चुन लिए गए। उम्मीद यही है कि अगले महीने एम वेंकैया नायडू उपराष्ट्रपति भी बन जाएंगे। ऐसा होने पर ये पहला मौका होगा जब देश के चारों शीर्ष संवैधानिक पदों पर भारतीय जनता पार्टी के लोग होंगे। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी और लोकसभा स्पीकर के रूप में सुमित्रा महाजन इस सूची में शामिल है।
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हालांकि उदारवादी लोग कट्टर हिंदुत्व वाली पार्टी के मज़बूत उभार से सशंकित हैं। उन्हें डर है कि इससे देश दक्षिणपंथी सोच के रास्ते पर बढ़ सकता है जो देश के लिए ख़तरनाक ट्रेंड है। लेकिन भारतीय राजनीति में इस बात के स्पष्ट रुझान मिल रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी का असर कम हो रहा है। कांग्रेस अब अखिल भारतीय पार्टी नहीं रही है और दूसरी ओर उसकी जगह भरने के लिए भारतीय जनता पार्टी तेजी से बढ़ रही है।
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इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आम चुनावो मे भारतीय जनता पार्टी को महज दो सीटें मिली थी। लेकिन चार दशक से भी कम समय में पार्टी ने काफ़ी दूरी तय की है। 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था। 1984 के लोकसभा चुनाव मे दो सीटो से शुरू करके 1989 में पार्टी 85 सीटों तक पहुंचने में कामयाब रही।
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1991 के आम चुनाव में पार्टी ने 120 सीटे जीती। ये आंकड़ा 1998 के चुनाव में बढ़कर 198 तक पहुंच गया। इस दौरान 1996 में पार्टी की केंद्र में सरकार भी बनी। लेकिन बहुमत के अभाव में वो सरकार महज 13 दिनों तक चल पाई थी।


पार्टी के पहले चरण की कामयाबी तब देखने को मिली जब लाल कृष्ण आडवाणी ने 1989 में राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन की सफल शुरुआत की थी। पार्टी की कामयाबी का दूसरा चरण तब देखने को मिला जब अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 से 2004 के बीच प्रधानमंत्री रहे। वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे।


तीसरे चरण की कामयाबी तब शुरू हुई जब 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी हिंदुत्व के नायक बनकर उभरे। पार्टी की कामयाबी का चौथा चरण तब शुरू हुआ जब उनके नेतृत्व में 2014 मे पार्टी अपने दम पर बहुमत जुटाने मे कामयाब रही।


भारतीय जनता पार्टी में एक ख़ासियत है, यह एक स्वतंत्र राजनीतिक दल भर नहीं है बल्कि यह अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) का राजनीतिक मोर्चा है। वैसे आरएसएस लगातार दावा करती रही है वो केवल सांस्कृतिक संगठन है और अराजनीतिक भी है।

 

The Reasons For Modi Being Stronger Than Ever
NDA MEETING
वैसे भारतीय जनता पार्टी का गठन आरएसएस के राजनीतिक मोर्चे के तौर पर 1980 में हुआ था। आरएसएस का उद्देश्य भारत में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलाव लाना है। इसके कई संगठन हैं और एक उदारवादी लोकतंत्र में ये एक बड़ी राजनीतिक ताकत भी है। लेकिन भारत दक्षिणपंथ की ओर क्यो बढ़ रहा है।


हालांकि ये चलन दुनिया भर में देखने को मिल रहा है। अमरीका, ब्रिटेन और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में दक्षिणपंथी ताकते बढ़ी है। ब्रेक्सिट इसका एक नायाब उदाहरण है और अमरीका में डोनल्ड ट्रंप की जीत भी इसी रुझान को दर्शाती है।


हालांकि वैसे देश में भारतीय जनता पार्टी का प्रभुत्व आश्चर्य भरा है जो आज़ादी के बाद ऐतिहासिक तौर पर वामपंथी रुझान के प्रभुत्व वाला रहा है. भारत के उदारवादी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर ख़तरा महसूस कर रहे हैं क्योंकि धार्मिक संगठन तेज़ी से अपनी ताक़त का प्रदर्शन कर रहे है। कइयो को इस बात का डर है कि हिंदुत्व राष्ट्रवादी मोदी सरकार के बचे हुए समय में शक्ति का प्रदर्शन कर सकते है। वैसे ऐतिहासिक तौर पर कांग्रेस का वामपंथी झुकाव साठ और सत्तर के दशक में शुरू हुआ था। उस वक्त उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्ट पार्टी हुआ करती थी।


प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेसी नेताओं ने समाजवादी विचार को अपनाया और भारतीय बाज़ार को नियंत्रण में रखा। लेकिन ये भी सच है कि ये कांग्रेस पार्टी ही है जिसने पीवी नरसिम्हा राव के शासन मे 1991 में देश में खुली अर्थव्यवस्था की शुरुआत की।


पहले कांग्रेस एक अम्ब्रेला पार्टी थी, मतलब छतरी वाली पार्टी जिसके नीचे कई धर्म और जातियों के लोग थे। पार्टी का मुख्य वोट बैंक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम हुआ करते थे। समय के साथ वामपंथ का विचार कई वजहों से नाकाम हो गया, लेकिन कांग्रेस पार्टी बची रही क्योंकि पार्टी धीरे-धीरे सेंटर की ओर बढ़ चुकी थी।


राष्ट्रीय स्तर पर, वामपंथी दलों की मौजूदगी नाममात्र की रह गई है। आज वामपंथी दलों की केवल दो राज्यों में सरकार है- त्रिपुरा और केरल। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी दोनों यूपीए मोर्चा और यूपीए मोर्चा सरकार के साथ रही है। भारतीय जनता पार्टी अब राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार कर रही है।


ऐसे में आने वाले दिनों में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और भारतीय जनता पार्टी के बीच ध्रुवीकरण बढ़ेगा। बीते सात दशक से लेफ़्ट और सेंटर की राजनीति करने वाली कांग्रेस ने अब दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी को जगह दे दी है।

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PM MODI
जिस पार्टी का आज़ादी के बाद 70 सालों में 58 साल तक देश पर शासन रहा है वो इन दिनों नेतृत्व के संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं मे हताशा है। 2014 के बाद से बिहार (2015) और पंजाब (2017) को छोड़ दें तो कांग्रेस को सभी राज्यों मे हार का सामना करना पड़ा है।


पार्टी के पास लगातार बढ़ रही भारतीय जनता पार्टी से मुक़ाबला करने के लिए संसाधन और रणनीति का भी अभाव है। वही दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी जैसा मजबूत और करिश्माई नेता भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व कर रहा है । इस बात में कोई शक नहीं है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 से 2004 के बीच 24 साझेदारों का नेतृत्व किया। लेकिन वाजपेयी की बीजेपी आज की मोदी वाली बीजेपी से अलग थी। मोदी वाली बीजेपी ज़्यदा मज़बूत है।


भारतीय जनता पार्टी की रणनीति यही है कि वो लोगों के बीच आकर्षक बने रहने के साथ अपने उद्देश्यों की मार्केटिंग भी करती रहे। मोदी ने एक नए तरह की सोशल इंजीनियरिग को अपनाया है और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को बदलते हुए उसमें जातीय राजनीति को अधिक शामिल किया है।


पार्टी अब अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और सामाजिक रूप से पिछड़ी दूसरी जातियों को ना केवल अपने साथ जोड़ रही है बल्कि उन्हें सम्मान भी दे रही है। 1996 और 2004 में भारतीय जनता पार्टी का मुक़ाबला करने वाले गैर बीजेपी दलों में कंफ़्यूजन की स्थिति देखने को मिल रही है कि वो बीजेपी को कैसे रोके।


उन्हें इस बात का भी डर है कि अगर वे ज़्यादा आक्रामक रुख अपनाएंगे तो इसका विपरीत असर भी हो सकता है और मतदाता बीजेपी के और नज़दीक जा सकते है। हालांकि इसके उलट और उतने ही दमदार तरीके से ये तर्क भी दिया जा सकता है कि बीजेपी की जीत में उसकी प्रोपेगैंडा रणनीति का अहम योगदान रहा है। इसके अलावा पार्टी के पास संसाधन है। कार्यकर्ता हैं और मीडिया भी उसके पक्ष मे है।


अगर यही राजनीतिक स्थिति बनी रही और विपक्ष कमजोर और रणनीति विहीन रहा तो मोदी का जादू बना रहेगा। बीजेपी कम से कम 2024 तक मजबूत बनी रहेगी क्योंकि 2019 में मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर दूसरा कार्यकाल मिल सकता है।
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