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अंग्रेजों के पियादों पर मेहरबानी करने के लिए शुरू हुआ था रेलवे में 'खलासी' पद, खत्म होने में लगे 73 साल

Fri, 07 Aug 2020 06:29 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 07 Aug 2020 06:29 PM IST
सार

रेलवे के दिल्ली मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि टेलीफोन अटेंडेंट-कम-डाक खलासी के पद पर भर्ती की परंपरा आजादी मिलने से भी कई दशक पहले से चली आ रही है। हालांकि रेलवे में यह नियम है कि कोई अधिकारी अपने निजी संबंध या खून के रिश्ते वाले व्यक्ति को इस पद पर नौकरी नहीं देगा, लेकिन इसका तोड़ भी निकाल लिया गया...
 

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The post of 'Khalasi' system in the railways started in British Era, it took 73 years to end
भारतीय रेलवे - फोटो : PTI (File)

विस्तार

देश में करीब 13 लाख से ज्यादा कर्मियों की संख्या वाले रेल विभाग में 73 साल बाद अंग्रेजों द्वारा सृजित किया गया टेलीफोन अटेंडेंट-कम-डाक खलासी (टीएडीके) का पद अब खत्म होने जा रहा है। दरअसल अंग्रेजों ने अपने पियादों पर मेहरबानी करने के लिए इस पद की व्यवस्था की थी। पियादों के बच्चों को टीएडीके के पद पर रख लिया जाता था।

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पहले इसके लिए कोई विज्ञापन भी नहीं निकलता था। खलासी की नियुक्ति पूरी तरह पिछले दरवाजे से होती थी। आजादी से पहले अंग्रेज अफसर के पियादों को फायदा पहुंचाने के लिए खलासी लगते थे, तो उसके बाद रेलवे के भारतीय अफसरों ने अपने रिश्तेदारों या जाति वालों को खलासी बनाकर रेलवे में एंट्री देनी शुरू कर दी।
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खलासी के पद से अधिकांश रेलवे कर्मी इसलिए परेशान थे, क्योंकि ये लोग किसी अधिकारी के आवास या कार्यालय में नियुक्त होते थे। खलासी के वेतन, भत्ते या किसी इनका कोई दूसरा विभागीय काम कभी नहीं रूकता। इनकी फाइलें ग्रीन कॉरिडोर से आगे बढ़ती हैं। अगर कोई कर्मचारी फाइल पर नियमानुसार नकारात्मक टिप्पणी कर देता तो समझो उसकी खैर नहीं।
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रेलवे के दिल्ली मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि टेलीफोन अटेंडेंट-कम-डाक खलासी के पद पर भर्ती की परंपरा आजादी मिलने से भी कई दशक पहले से चली आ रही है। हालांकि रेलवे में यह नियम है कि कोई अधिकारी अपने निजी संबंध या खून के रिश्ते वाले व्यक्ति को इस पद पर नौकरी नहीं देगा, लेकिन इसका तोड़ भी निकाल लिया गया।


एक अधिकारी ने अपने समकक्ष दूसरे अधिकारी से कहा कि वह अपने यहां उसका रिश्तेदार भर्ती कर ले। इसी तरह दूसरा अधिकारी भी कहने लगा कि उसे एक मेरा आदमी भी भर्ती करना होगा। चूंकि दोनों अलग-अलग जगह पर तैनात हैं, इसलिए इसमें कोई विभागीय दिक्कत भी नहीं आएगी।


अधिकारी का दावा है कि शुरू में खलासी की भर्ती का यही तरीका निकाला गया। इसमें जाति और क्षेत्रवाद का जबरदस्त बोलबाला रहा। कई रेल मंत्री ऐसे भी आए, जिन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को इस पद पर नियुक्त करा दिया। भर्ती होने के तीन साल बाद पक्का नियुक्ति पत्र मिल जाता है। इसके लिए रेल महाप्रबंधक की मंजूरी लेनी पड़ती है जो आसानी से मिल जाती है।

कोई दिक्कत आ जाए तो उसका तोड़ भी निकल आता है। जैसे खलासी भर्ती करने के लिए वर्क चार्ज पोस्ट का सहारा लिया जाता है। इसके विरूद्ध फंड का इंतजाम कर खलासी भर्ती कर लिया जाता है।

बैक डोर एंट्री से आने वाले सभी खलासी नियमित होते रहे

अधिकारी के मुताबिक, रेलवे की बैक डोर एंट्री से आने वाले खलासी तीन साल बाद पक्के हो जाते हैं। इसमें उन्हें कोई दिक्कत नहीं आती, क्योंकि उनके सिर पर किसी न किसी बड़े अधिकारी का हाथ रहता है। अंग्रेज भी खलासी का इस्तेमाल अपने घर के कार्यों के लिए करते थे और उसके बाद भारतीय अधिकारी भी उसी राह पर आगे बढ़ते रहे।

खलासी का इस्तेमाल अधिकारियों की कोठियों पर ही ज्यादा होता रहा है। इन्हें 25 से 30 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है। सहायक कार्मिक अधिकारी इन्हें नियुक्त कर सकता है।

रेलवे में खलासी से सब डरते थे...

टेलीफोन अटेंडेंट-कम-डाक खलासी से सब डरते थे। कोई भी कर्मी यह नहीं चाहता था कि खलासी के किसी काम की फाइल उसके पास आए। इसकी वजह यह थी कि खलासी के पीछे उसके अफसर का हाथ रहता था। जैसे कोई खलासी जीएम के यहां काम करता है और उसका अपना कोई काम अटक गया। उसकी फाइल जब किसी टेबल पर पहुंचती तो संबंधित बाबू भारी दबाव में आ जाता था।

उसे अपने सारे काम छोड़कर वह फाइल आगे बढ़ानी पड़ती थी। अगर इसमें थोड़ी सी देरी हो जाती तो समझो कर्मी की नौकरी पर बन आती थी। चाहे फाइल में कोई गलती ही क्यों न हो, लेकिन कर्मी को वह फाइल हर सूरत में आगे देनी पड़ती थी। सब कर्मी जानते थे कि अगर खलासी का काम रूक गया तो समझो बॉस के आदेश की अवहेलना हो गई।



जब ऐसा कुछ होता है तो कर्मी सजा भुगतने के लिए भी तैयार रहता है। अब रेलवे में खलासियों की भर्ती नहीं होगी। रेलवे बोर्ड ने खलासी की नियुक्ति पर रोक लगा दी है। अब टेलीफोन अटेंडेंट-कम-डाक खलासी (टीएडीके) की भर्तियों के मामले की समीक्षा की जा रही है। पहली जुलाई से अब तक टीएडीके की जो भी भर्तियां मंजूर हुई हैं, उनकी भी समीक्षा की जा सकती है।

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