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Supreme court: याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा-गरीबों को आरक्षण संविधान के साथ धोखाधड़ी

Wed, 14 Sep 2022 05:25 AM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Wed, 14 Sep 2022 05:25 AM IST
सार

चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने एनजीओ जनहित अभियान और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर बहस शुरू की।

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The petitioner said in the Supreme Court - reservation to the poor is a fraud with the constitution
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media

विस्तार

सवर्ण गरीबों को आरक्षण के मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में इस वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान संविधान के साथ धोखाधड़ी है। यह देश को जाति के आधार पर विभाजित करता है और यह संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है।
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चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस एस रवींद्र भट, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने एनजीओ जनहित अभियान और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर बहस शुरू की। इन याचिकाओं में 2019 में अधिनियमित 103वें संविधान संशोधन की वैधता को चुनौती दी गई है। इसके जरिये सरकारी नौकरियों और दाखिले में गरीबों (ईडब्ल्यूएस) को 10 फीसदी आरक्षण दिया गया है। कुछ याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे लीगल स्कॉलर जी मोहन गोपाल ने दावा किया कि यह संशोधन सामाजिक न्याय की सांविधानिक दृष्टि पर हमला है। ईडब्ल्यूएस कोटा ने वंचित समूहों के प्रतिनिधित्व के साधन के रूप में आरक्षण की अवधारणा को उलट दिया। 
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जज की टिप्पणी को भी फैसला मान लेता है सोशल मीडिया

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी केवल विचार-विमर्श के लिए एक रास्ता खोलना है। इसे न्यायालय के निर्णय के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि सोशल मीडिया यूजर अक्सर दोनों के बीच के अंतर को समझने में विफल होते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, सोशल मीडिया सोचता है कि हर बार जब हम न्यायालय में बहस के दौरान कुछ कहते हैं तो वह निर्णय होता है। यह केवल संवाद की एक खुली प्रक्रिया है ताकि आप हमें बता सकें कि हम सही हैं या गलत। जस्टिस चंद्रचूड़ एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। 

वर्गीकरण के लिए एक उचित आधार का हिस्सा
पीठ में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस एस रविंद्र भट, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि सरकार ने आर्थिक मानदंडों के आधार पर नीतियां बनाईं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी नीतियों का लाभ लक्षित लोगों तक पहुंचे। आर्थिक मानदंड एक जायज आधार है और वर्गीकरण के लिए एक उचित आधार का हिस्सा है। यह गैरकानूनी नहीं है।

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