चीनी सामानों के बहिष्कार का शोर शराबा सोशल मीडिया में ज्यादा, सड़क पर दिख रहा कम
- शनिवार को भारतीय मजदूर संघ के नेतृत्व में देश के अलग-अलग स्थानों पर जलाई गई चीनी सामानों की होली
- सस्ती पूंजी और तकनीकी की बेहतरी के दम पर चीन ने हमारे बाजारों कब्जा जमाया
- विश्व की स्थितियों को देखते हुए उसकी जरूरतों के हिसाब से अपनी रणनीति बनानी होगी
विस्तार
लद्दाख में चीन के अड़ियल रवैये के बाद देश में चीनी सामानों पर देशवासियों का गुस्सा लगातार उतर रहा है। शनिवार को भी दिल्ली सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में चीनी सामानों की होली जलाई गई और लोगों से चीन निर्मित सामानों का बहिष्कार करने की अपील की।
लेकिन चीनी सामानों के विरोध का यह शोर सोशल मीडिया पर ज्यादा दिखाई पड़ रहा है, जमीन पर अभी भी इन प्रदर्शनों में लोगों की बड़ी संख्या नहीं देखी जा रही है।
चीनी उत्पादों की होली जलाने के मामले में भी विरोध प्रतीकात्मक ज्यादा दिख रहा है। यह चीन-भारत के बीच उपजे तनाव के कारण पैदा हुआ क्षणिक उन्माद है या इस विरोध के जरिये भारत कुछ तलाशने की कोशिश कर रहा है?
नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. एके भागी कहते हैं इस बात में कोई शक नहीं है कि चीनी सामानों का विरोध आसान नहीं है। सस्ती पूंजी और तकनीकी की बेहतरी के दम पर चीन ने हमारे बाजारों कब्जा जमाया।
इससे हमारे कामगरों के हाथ उखड़ गये। अब लोगों के पास विकल्प नहीं है और मजबूरी में चीनी उत्पाद खरीद रहे हैं। वे कहते हैं कि लोगों को उतनी ही बेहतर तकनीकी के साथ उतना ही सस्ता माल उपलब्ध कराए बिना चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का दावा सच साबित नहीं होगा। इसके लिए जमीनी तौर पर बड़ा बदलाव करना होगा।
हालांकि, उन्होंने कहा कि इस कठिनाई के बाद भी चीनी उत्पादों का विरोध किया जाना बेहद जरुरी है। यह मामला केवल चीन के विरोध तक सीमित नहीं है।
यह मामला हमारे कारीगरों, दस्तकारों, शिल्पियों को रोजगार देने का भी है। आज जिस रफ्तार से बेरोजगारी बढ़ रही है, उसका मुकाबला भारत तभी कर सकता है जब वह अपने उत्पादन लाइन को मजबूत बनाए।
इसके बिना केवल सर्विस सेक्टर के भरोसे हम इतनी बड़ी आबादी वाले देश में सबको रोजगार नहीं दे पाएंगे।
सोशल मीडिया युवाओं की सोच का प्रतिबिंब
सोशल मीडिया युवाओं की आवाज और विचार का बिलकुल सटीक प्रतिबिंब है। इस आवाज को महसूस किया जाना चाहिए। यह विचार उचित मंच पाने के बाद अवसर में भी तब्दील होता है।
ध्यान रहना चाहिए कि यही वर्ग चीजों की खरीद के मामले में बाजार का वाहक है। हाथ में आर्थिक ताकत होने के कारण यह सोच जमीन पर उतर सकती है। इसके लिए उचित विकल्प दिया जाना चाहिए।
प्रौद्योगिकी आधारित हो विकास मॉडल
दिल्ली विश्वविद्यालय के बिजनेस इकोनॉमिक्स विभाग के अध्यक्ष प्रो. वीके कौल ने कहा कि चीन की सैन्य ताकत के पीछे उसकी आर्थिक मजबूती है। अगर हमें भारत को मजबूत देखना है तो हमें अपने उपभोक्ताओं की अपनी ताकत को अपने लिए इस्तेमाल करना होगा।
अब भारत को प्रौद्योगिकी क्रांति का वाहक बनना पड़ेगा। हमें विश्व की स्थितियों को देखते हुए उसकी जरूरतों के हिसाब से अपनी रणनीति बनानी होगी।
'जनता आ रही साथ'
भारतीय मजदूर संघ के दिल्ली प्रांत के महासचिव अनीश मिश्रा ने कहा कि हम लोगों से लगातार अपील कर रहे हैं। शनिवार को अकेले दिल्ली में 40 से अधिक जगहों पर उनके कार्यकर्ताओं ने चीनी उत्पादों के बहिष्कार कार्यक्रम रखा और चीन की विस्तारवादी नीतियों का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि उनके कार्यक्रमों में जनता की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। चीनी उत्पादों की होली जलाने के कार्यक्रम में लोग अपने घरों से ही चीनी उत्पाद अपने साथ ला रहे हैं। जनता के सहयोग से ही इस तरह के आन्दोलन सफल होते हैं और उनका प्रयास जनता को साथ लाना ही है।
‘चीनी सामानों का विरोध राजनीतिक ड्रामा’
फेडरेशन ऑफ आल इंडिया व्यापार मंडल के राष्ट्रीय महामंत्री वीके बंसल ने कहा कि चीनी उत्पादों के बहिष्कार के नाम पर यह राजनीतिक ड्रामा चल रहा है। चीन से सीधे उपभोक्ता से खरीदे जाने वाले सामान की कीमत एक लाख करोड़ से अधिक नहीं है।
इसलिए केवल इन्हें रोककर हम चीन का कोई बड़ा विरोध नहीं कर पाएंगे। सबसे ज्यादा निर्भरता सोलर उत्पादों, दवाओं और कल-पुर्जे के क्षेत्र में है जहां आपके पास चीन के आलावा कोई विकल्प नहीं है।
ऐसे में इस तरह के ड्रामे के बजाय जमीनी बदलाव की बात की जानी चाहिए। तब तक व्यापारियों को अपना अब तक का खरीदा हुआ सामान बेचने की अनुमति मिलनी चाहिए जो पहले ही कोरोना में लॉकडाउन के कारण भारी नुकसान झेल चुके हैं।