जज विवाद: दो वर्ष पहले ही पड़ चुकी थी न्यायपालिका में ‘भूचाल’ की नींव
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न्यायपालिका में शुक्रवार को जो ‘भूचाल’ आया इसकी नींव दो वर्ष पहले ही पड़ चुकी थी। पिछले कुछ महीनों के दौरान ऐसी घटनाओं में आई तेजी ने आखिरकार धमाके का रूप ले लिया। इसके बाद जो हुआ वह न्यायिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। चारो वरिष्ठ जजों में पिछले कई मामलों को लेकर असंतोष तो था लेकिन बीएस लोया मामले ने इनके सब्र का बांध तोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं।
यानी किस मामले को किस पीठ में सुना जाना चाहिए, चीफ जस्टिस प्रशासनिक तौर पर यह निर्णय लेते हैं। पिछले कुछ समय में जज रिश्वखोरी मामला, एमओपी मामला, राकेश अस्थाना, ईडी अधिकारी राजेश्वर सिंह सहित कई बड़े मामलों में चीफ जस्टिस द्वारा पीठ के चयन और मामले एक पीठ से उठाकर दूसरी पीठ को भेजने के बाद मतभेद बढ़े थे। इन चारों जजों के पास एक-दो मामलों को छोड़कर कोई हाई-प्रोफाइल मामला नहीं हैं।
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इन मामलों ने बढ़ाया मतभेद
जज रिश्वतखोरी मामले में वरिष्ठ जजों का नजरअंदाज करते हुए मामले को जूनियर जज के पास भेज दिया गया था। वहीं राकेश अस्थाना को सीबीआई का अतिरिक्त निदेशक बनाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ सेहटाकर दूसरी पीठ के पास भेज दी गई।
वही पिछले हफ्ते टूजी मामले में चीफ जस्टिस ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी राजेश्वर सिंह के मामले को न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ से अपने पास ले लिया। इसके अलावा एमओपी (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसिजर) लाने में हो रही देरी को लेकर दायर याचिका पर भी दो सदस्यीय पीठ ने परीक्षण का निर्णय लिया था लेकिन चीफ जस्टिस ने याचिका को अपने पास ले लिया था।
संविधान पीठ पर भी असंतोष
संविधान पीठ में वरिष्ठ जजों को शामिल न किए जाने को लेकर भी असंतोष की बात सामने आ रही है। आमतौर पर ऐसा होता है कि जिस पीठ द्वारा मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाता है तो छोटी पीठ के सदस्यों को उसमें जगह दी जाती है। लेकिन पिछले समय में गठित संविधान पीठ में ऐसा देखने को नहीं मिला और न ही इन चारों वरिष्ठतम जजों को उसका हिस्सा बनाया गया।
यह जरूर है कि संविधान के अनुच्छेद-124 के तहत सुप्रीम कोर्ट के सभी जज बराबर है और किसी जज के चयन पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन पिछले दिनों में गठित संविधान पीठ में कुछ चुनिंदा जजों को ही जगह दी गई। जस्टिस चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ काफी पहले से आधार से संबंधित कुछ मामलों पर सुनवाई कर रही थी और इसी पीठ ने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा था।
लेकिन आधार को लेकर गठित पीठ में जस्टिस चेलमेश्वर का नाम ही नहीं है। माना जा रहा है कि जस्टिस बीएच लोया की हत्या के मामले की जांच से संबंधित याचिका को कोर्ट नंबर-10 (न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ) को भेजने के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के निर्णय ने आग में घी का काम किया। क्योंकि इस तरह अहम राजनीति मामले में 12 वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर दिया गया।
अधिकतर मामले चीफ जस्टिस के पास
आमतौर पर नई जनहित याचिकाओं पर इन दिनों या तो चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई करती है या कुछ चुनिंदा पीठ। कानून के जानकारों का यह भी कहना है कि आखिरकार अधिकतर मामले चीफ जस्टिस केपास ही क्यों हैं। चाहे वह अयोध्या मामला हो या रामसेतु चाहे केरल लव जिहाद मामला हो या बीसीसीआई। सहारा, जेपी, यूनिटेक आदि मामले भी चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के पास ही है।
पहले भी रहे मतभेद
पिछले चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने भी बिरला-सहारा मामले में वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के पास भेज दिया था। जस्टिस खेहर ने कालिको पुल की पत्नी के पत्र को याचिका में तब्दील कर कोर्ट नंबर-13 के पास भेज दिया था। उस वक्त भी कोर्ट नंबर-दो से 12 को नजअंदाज कर दिया गया। इससे पहले चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर के वक्त भी वकीलों में इस बात को लेकर असंतोष था कि आखिरकार हर नई जनहित याचिकाओं पर चीफ जस्टिस ही क्यों सुनवाई करते हैं।