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Supreme Court: 'देश मुश्किल दौर में है, आप काल्पनिक विचार लेकर आए हैं', रोहिंग्या निर्वासन पर 'सुप्रीम' फटकार
Fri, 16 May 2025 08:56 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: बशु जैन
Updated Fri, 16 May 2025 08:56 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्याओं के निर्वासन को लेकर दायर याचिका में कहा गया था कि महिलाओं और बच्चों समेत 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के लिए अंडमान सागर में छोड़ दिया गया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि जब देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है तो आप काल्पनिक विचार लेकर आए हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को रोहिंग्याओं के निर्वासन को लेकर याचिका दायर करने वालों को फटकार लगाई। याचिका में कहा गया था कि महिलाओं और बच्चों समेत 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के लिए अंडमान सागर में छोड़ दिया गया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि जब देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है तो आप काल्पनिक विचार लेकर आए हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने याचिकाकर्ता मोहम्मद इस्माइल और अन्य की ओर से कोर्ट में दाखिल की गई सामग्री की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाया। साथ ही रोहिंग्याओं के आगे निर्वासन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस से कहा कि जब देश कठिन समय से गुजर रहा है, तो आप इस तरह के काल्पनिक विचार लेकर आते हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत सामग्री सोशल मीडिया से ली गई नजर आती है और रोहिंग्याओं को यातना देने तथा उन्हें समुद्र में फेंककर निर्वासित करने के आरोपों को मात्र आरोप बताया गया है। न्यायमूर्ति कांत ने पूछा कि आरोपों को प्रमाणित करने वाली सामग्री कहां है?
पीठ ने कहा कि निर्वासित लोगों और दिल्ली में रहने वाले याचिकाकर्ता के बीच कथित फोन कॉल की बातचीत की रिकॉर्डिंग सत्यापित नहीं की गई है। न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि क्या किसी ने इन फोन कॉलों की पुष्टि की है कि वे म्यांमार से आए थे? इससे पहले हमने एक मामले की सुनवाई की थी, जिसमें झारखंड के जामताड़ा से अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के फोन नंबरों से कॉल किए गए थे।
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ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट जज बेला त्रिवेदी हुईं सेवानिवृत्त, सीजेआई बोले- इनकी निष्पक्षता और दृढ़ता काबिलेतारीफ
वकील गोंजाल्विस ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसने भी इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है, तो पीठ ने कहा कि बाहर बैठे लोग हमारे प्राधिकारों और संप्रभुता को निर्देशित नहीं कर सकते। पीठ ने गोंजाल्विस से कहा कि वह याचिका की प्रतिलिपि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को सौंप दें ताकि इसे सरकार के संबंधित अधिकारियों को भेजा जा सके और मामले की सुनवाई 31 जुलाई को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष निर्धारित कर दी।
पीठ ने कहा कि बयानों के समर्थन में कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं है। जब तक आरोपों को प्रथम दृष्टया कुछ सामग्री से समर्थन नहीं मिलता, तब तक हमारे लिए एक बड़ी पीठ द्वारा पारित आदेश पर विचार करना कठिन है। शीर्ष अदालत ने याचिका में की गई बातों को बेहतरीन भाषा का प्रयोग करते हुए खूबसूरती से गढ़ी गई कहानी करार दिया और कहा कि वह तीन न्यायाधीशों की पीठ के साथ बैठकर संयुक्त राष्ट्र निकाय की रिपोर्ट पर टिप्पणी करेगी।
कोर्ट ने गोंजाल्विस से आगे पूछा कि हर दिन आप एक नई कहानी लेकर आते हैं। इस कहानी का आधार क्या है? आपके आरोपों को पुष्ट करने के लिए सामग्री कहां है?
याचिका में आरोप लगाया कि आठ मई को पिछली सुनवाई के बाद कई रोहिंग्याओं को अंडमान ले जाकर निर्वासित कर दिया गया और उन्हें समुद्र में छोड़ दिया गया। अब उन्हें युद्ध क्षेत्र में डाल दिया गया है, जहां मारे जाने का खतरा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्हें उनमें से एक का फोन आया है, जिसे रिकार्ड कर लिया गया है।
ये भी पढ़ें: वक्फ कानून के खिलाफ नई याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा- हर कोई अखबार में नाम चाहता है
इससे पहले आठ मई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि देश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थी भारतीय कानून के तहत विदेशी पाए गए तो उन्हें निर्वासित किया जाएगा। इसके बाद अदालत ने अपने आदेश का हवाला दिया और टिप्पणी की कि शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) द्वारा जारी किए गए पहचान पत्र, कानून के तहत उनके लिए कोई मददगार नहीं हो सकते हैं। शीर्ष अदालत को बताया गया था कि महिलाओं और बच्चों सहित यूएनएचसीआर कार्डधारी कुछ शरणार्थियों को पुलिस अधिकारियों ने देर रात गिरफ्तार कर लिया और 15 मई को सुनवाई के बावजूद निर्वासित कर दिया।
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पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस से कहा कि जब देश कठिन समय से गुजर रहा है, तो आप इस तरह के काल्पनिक विचार लेकर आते हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत सामग्री सोशल मीडिया से ली गई नजर आती है और रोहिंग्याओं को यातना देने तथा उन्हें समुद्र में फेंककर निर्वासित करने के आरोपों को मात्र आरोप बताया गया है। न्यायमूर्ति कांत ने पूछा कि आरोपों को प्रमाणित करने वाली सामग्री कहां है?
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पीठ ने कहा कि निर्वासित लोगों और दिल्ली में रहने वाले याचिकाकर्ता के बीच कथित फोन कॉल की बातचीत की रिकॉर्डिंग सत्यापित नहीं की गई है। न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि क्या किसी ने इन फोन कॉलों की पुष्टि की है कि वे म्यांमार से आए थे? इससे पहले हमने एक मामले की सुनवाई की थी, जिसमें झारखंड के जामताड़ा से अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के फोन नंबरों से कॉल किए गए थे।
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वकील गोंजाल्विस ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसने भी इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है, तो पीठ ने कहा कि बाहर बैठे लोग हमारे प्राधिकारों और संप्रभुता को निर्देशित नहीं कर सकते। पीठ ने गोंजाल्विस से कहा कि वह याचिका की प्रतिलिपि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को सौंप दें ताकि इसे सरकार के संबंधित अधिकारियों को भेजा जा सके और मामले की सुनवाई 31 जुलाई को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष निर्धारित कर दी।
पीठ ने कहा कि बयानों के समर्थन में कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं है। जब तक आरोपों को प्रथम दृष्टया कुछ सामग्री से समर्थन नहीं मिलता, तब तक हमारे लिए एक बड़ी पीठ द्वारा पारित आदेश पर विचार करना कठिन है। शीर्ष अदालत ने याचिका में की गई बातों को बेहतरीन भाषा का प्रयोग करते हुए खूबसूरती से गढ़ी गई कहानी करार दिया और कहा कि वह तीन न्यायाधीशों की पीठ के साथ बैठकर संयुक्त राष्ट्र निकाय की रिपोर्ट पर टिप्पणी करेगी।
कोर्ट ने गोंजाल्विस से आगे पूछा कि हर दिन आप एक नई कहानी लेकर आते हैं। इस कहानी का आधार क्या है? आपके आरोपों को पुष्ट करने के लिए सामग्री कहां है?
याचिका में आरोप लगाया कि आठ मई को पिछली सुनवाई के बाद कई रोहिंग्याओं को अंडमान ले जाकर निर्वासित कर दिया गया और उन्हें समुद्र में छोड़ दिया गया। अब उन्हें युद्ध क्षेत्र में डाल दिया गया है, जहां मारे जाने का खतरा है। याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्हें उनमें से एक का फोन आया है, जिसे रिकार्ड कर लिया गया है।
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इससे पहले आठ मई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि देश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थी भारतीय कानून के तहत विदेशी पाए गए तो उन्हें निर्वासित किया जाएगा। इसके बाद अदालत ने अपने आदेश का हवाला दिया और टिप्पणी की कि शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) द्वारा जारी किए गए पहचान पत्र, कानून के तहत उनके लिए कोई मददगार नहीं हो सकते हैं। शीर्ष अदालत को बताया गया था कि महिलाओं और बच्चों सहित यूएनएचसीआर कार्डधारी कुछ शरणार्थियों को पुलिस अधिकारियों ने देर रात गिरफ्तार कर लिया और 15 मई को सुनवाई के बावजूद निर्वासित कर दिया।
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