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अमर उजाला बैठक में बोलीं तस्लीमा नसरीन- 'रिवाजों की जंग और काई तो हटानी ही होगी'
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Fri, 19 Jan 2018 09:42 AM IST
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tasleema nasreen
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मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन और नासिरा शर्मा का मानना है कि जो भी अतार्किक, गैर-बौद्धिक और जड़ है, उसमें बदलाव बेहद जरूरी है, अन्यथा समाज रुक जाएगा। ऐसी चीजें जंग और काई की तरह हैं, जो अंतत: सड़ांध पैदा करती हैं। तस्लीमा नसरीन ने इसमें जोड़ा, आलोचना से परे छोड़कर किसी भी बदलाव की उम्मीद ही असंभव है। वहीं, नासिरा शर्मा ने कहा कि जिन्हें बदलना है, उन्हीं का बौद्धिक विमर्श खड़ा करकेउन्हीं केतर्कों से उन्हें खारिज करना होगा।
दोनों मशहूर लेखिकाएं अमर उजाला बैठक की चौथी कड़ी में बृहस्पतिवार को आयोजित जुगलबंदी में शामिल हुईं। इस मौके पर धर्म, स्त्री-पुरुषों की गैर बराबरी और मानवीय स्वतंत्रता पर खुलकर बात हुई। तस्लीमा ने कहा कि मैं वह लिखती हूं, जो मुझे सही व सच लगता है। लेकिन, जो आजादी, मानवाधिकार और लोकतंत्र के खिलाफ हैं, उन्हें ही मुश्किल होती है। दरअसल मेरी लड़ाई किसी मजहब केखिलाफ है ही नहीं। यह लड़ाई स्वतंत्रता बनाम परतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता बनाम धर्मांधता, मानवीयता बनाम अमानवीयता की लड़ाई है। सभी सभ्यताएं और धर्म, आलोचनाओं की राह से गुजरने केबाद ही प्रकाशमान होते हैं। आलोचना और विश्लेषण से बचाकर किसी का भी पुनर्जागरण नहीं होता।
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दोनों मशहूर लेखिकाएं अमर उजाला बैठक की चौथी कड़ी में बृहस्पतिवार को आयोजित जुगलबंदी में शामिल हुईं। इस मौके पर धर्म, स्त्री-पुरुषों की गैर बराबरी और मानवीय स्वतंत्रता पर खुलकर बात हुई। तस्लीमा ने कहा कि मैं वह लिखती हूं, जो मुझे सही व सच लगता है। लेकिन, जो आजादी, मानवाधिकार और लोकतंत्र के खिलाफ हैं, उन्हें ही मुश्किल होती है। दरअसल मेरी लड़ाई किसी मजहब केखिलाफ है ही नहीं। यह लड़ाई स्वतंत्रता बनाम परतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता बनाम धर्मांधता, मानवीयता बनाम अमानवीयता की लड़ाई है। सभी सभ्यताएं और धर्म, आलोचनाओं की राह से गुजरने केबाद ही प्रकाशमान होते हैं। आलोचना और विश्लेषण से बचाकर किसी का भी पुनर्जागरण नहीं होता।
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उन्हीं के तर्कों से उन्हें हराना होगा: नासिरा शर्मा
tasleema nasreen and nasira sharma
नासिरा शर्मा ने कहा कि मजहब में बहस, संवाद या तर्क नहीं होंगे, तो वह सड़ा पानी ही होगा। शरीयत में भी बदलाव को परिभाषित किया है। दरअसल, किसी भी मजहब या रिवाज में बदलाव केलिए उसे पढ़ना बहुत जरूरी है। उन्हीं के तर्कों से उन्हें हराना होगा। तीन तलाक ऐसा गलत रिवाज बन गया, जो शरीयत में है ही नहीं। इसके कारण, मुल्ला-मौलवियों ने नस्लें खराब कर कर दीं। शाह बानो मामले में औरतें इसलिए हारीं क्योंकि उन्होंने शरीयत को पढ़ा नहीं था। इस बार, शरीयत के तर्कों से ही औरतें आगे आईं और जीत हासिल की है। मनमाने अर्थ पेश करने वाले मौलवियों ने अपनी रोजी-रोटी केलिए समाज को सच्चाई जानने ही नहीं दी। जब हम धर्म के वास्तविक तथ्यों को सामने लाएंगे, तभी उनका मनमाना अर्थ देने वाले पराजित हो सकेंगे।
तस्लीमा ने कहा कि समानता की बात करने वाले कथित धर्मनिरपेक्षतावादी हर कट्टरपंथ की मुखालफत का दावा करते हैं, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथ का सवाल आते ही मुंह पर पट्टी बांध लेते हैं। नासिरा शर्मा ने कहा कि शिक्षा अंतत: औरत को सबल बनाएगी और वही परिवर्तन का हथियार बनेगी। उन्होंने कहा, अभिव्यक्ति केखतरे देश में भी हैं। लेकिन, भारतीय जमीन में इतनी ताकत है कि वह हर संकट से पार पा लेती है।
तस्लीमा ने कहा कि समानता की बात करने वाले कथित धर्मनिरपेक्षतावादी हर कट्टरपंथ की मुखालफत का दावा करते हैं, लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथ का सवाल आते ही मुंह पर पट्टी बांध लेते हैं। नासिरा शर्मा ने कहा कि शिक्षा अंतत: औरत को सबल बनाएगी और वही परिवर्तन का हथियार बनेगी। उन्होंने कहा, अभिव्यक्ति केखतरे देश में भी हैं। लेकिन, भारतीय जमीन में इतनी ताकत है कि वह हर संकट से पार पा लेती है।