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नेल्ली नरसंहार: असम में 1983 में हुई हिंसा पर तिवारी आयोग की रिपोर्ट, AASU-AGSP दोषी; 2000+ लोगों की गई थी जान
Wed, 26 Nov 2025 12:14 AM IST
शिवम गर्ग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी
Published by: शिवम गर्ग
Updated Wed, 26 Nov 2025 12:14 AM IST
सार
पूर्व आईएएस अधिकारी त्रिभुवन प्रसाद तिवारी जिसने तिवारी आयोग की अध्यक्षता की थी, उन्होंने बताया 1983 के पहले चार महीनों की परिस्थितियों की जांच की थी। उसी समय असम में विधानसभा चुनाव हो रहे थे और राज्य विदेशी नागरिकों के विरोध में बड़े आंदोलन से गुजर रहा था।
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हिमंत बिस्व सरमा, सीएम, असम
- फोटो : ANI
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विस्तार
असम की सबसे भयावह त्रासदियों में शामिल 1983 की हिंसा और कुख्यात नेल्ली नरसंहार पर बनी तिवारी आयोग की रिपोर्ट को लगभग चार दशक बाद मंगलवार को विधानसभा में सार्वजनिक किया गया। इस रिपोर्ट में उस दौर की हिंसा को गैर-सांप्रदायिक बताया गया है और पूरे आंदोलन की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और असम गणा संग्राम परिषद (AGSP) पर डाली गई है।
पूर्व आईएएस अधिकारी त्रिभुवन प्रसाद तिवारी जिसने तिवारी आयोग की अध्यक्षता की थी, उन्होंने बताया 1983 के पहले चार महीनों की परिस्थितियों की जांच की थी। उसी समय असम में विधानसभा चुनाव हो रहे थे और राज्य विदेशी नागरिकों के विरोध में बड़े आंदोलन से गुजर रहा था। इसी पृष्ठभूमि में 8,000 से अधिक हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं, लगभग 2.26 लाख लोग बेघर हुए और 2.48 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा।
हिंसा को ‘गैर-सांप्रदायिक’ बताया
रिपोर्ट में कहा गया कि 1983 की हिंसा को किसी साम्प्रदायिक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें “सभी समुदायों ने समान रूप से दर्द झेला।” हालांकि आयोग ने माना कि असम के मूल निवासियों में अपनी जनसंख्या को लेकर भय “काल्पनिक नहीं” था।
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AASU और AGSP को जिम्मेदार ठहराया
आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि AASU और AGSP ने आंदोलन शुरू किया और उसी के परिणाम स्वरूप हिंसा फैलती चली गई। आयोग के अनुसार, बंद, विरोध और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियां पहले से संगठित और योजनाबद्ध थीं, लेकिन बाद में हालात आंदोलनों के नेताओं के नियंत्रण से बाहर हो गए।
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चुनाव के समय रिपोर्ट का जारी होना बना सवाल
असम में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में इस रिपोर्ट का फिर से सार्वजनिक होना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष के नेता देबव्रत साइकिया ने कहा कि चार दशक पुराने जख्मों को फिर से कुरेदने की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या चुनाव से पहले माहौल गरमाने की कोशिश हो रही है?
भूमि मुद्दों पर भी की गई सिफारिशें
रिपोर्ट में प्रवासी आबादी की भूमि कब्ज़े को सबसे बड़ा तनाव का कारण बताया गया और कश्मीर की तर्ज़ पर भूमि सुरक्षा क़ानून लागू करने की सिफारिश की गई। इसके अलावा आयोग ने गैर-असमिया लोगों को भूमि हस्तांतरण पर उचित प्रतिबंध की भी सलाह दी और NRC या राज्य में न्यूनतम निवास अवधि को ‘असमिया’ की परिभाषा का आधार बनाने का सुझाव दिया।
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आयोग ने प्रशासनिक चूक पर भी सवाल उठाए
तिवारी आयोग ने यह भी जांचा कि प्रशासन ने हिंसा रोकने के लिए क्या कदम उठाए और क्या कहीं कोई कमी रह गई। हालांकि आयोग ने कहा कि आंदोलन की तीव्रता अनुमान से काफी ज्यादा थी, फिर भी सिस्टम ने परिस्थितियों के अनुरूप काम किया।
अंतिम रिपोर्ट 1984 में जमा हुई थी
यह संपूर्ण जांच जुलाई 1983 में शुरू हुई थी और अंतिम रिपोर्ट मई 1984 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के पास जमा हुई थी। 1987 में AGP सरकार ने इसे विधानसभा में रखा, लेकिन पर्याप्त प्रतियां उपलब्ध न होने के कारण रिपोर्ट उस समय विधायकों के बीच वितरित नहीं की जा सकी।
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पूर्व आईएएस अधिकारी त्रिभुवन प्रसाद तिवारी जिसने तिवारी आयोग की अध्यक्षता की थी, उन्होंने बताया 1983 के पहले चार महीनों की परिस्थितियों की जांच की थी। उसी समय असम में विधानसभा चुनाव हो रहे थे और राज्य विदेशी नागरिकों के विरोध में बड़े आंदोलन से गुजर रहा था। इसी पृष्ठभूमि में 8,000 से अधिक हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं, लगभग 2.26 लाख लोग बेघर हुए और 2.48 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा।
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हिंसा को ‘गैर-सांप्रदायिक’ बताया
रिपोर्ट में कहा गया कि 1983 की हिंसा को किसी साम्प्रदायिक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें “सभी समुदायों ने समान रूप से दर्द झेला।” हालांकि आयोग ने माना कि असम के मूल निवासियों में अपनी जनसंख्या को लेकर भय “काल्पनिक नहीं” था।
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AASU और AGSP को जिम्मेदार ठहराया
आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि AASU और AGSP ने आंदोलन शुरू किया और उसी के परिणाम स्वरूप हिंसा फैलती चली गई। आयोग के अनुसार, बंद, विरोध और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियां पहले से संगठित और योजनाबद्ध थीं, लेकिन बाद में हालात आंदोलनों के नेताओं के नियंत्रण से बाहर हो गए।
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चुनाव के समय रिपोर्ट का जारी होना बना सवाल
असम में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में इस रिपोर्ट का फिर से सार्वजनिक होना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष के नेता देबव्रत साइकिया ने कहा कि चार दशक पुराने जख्मों को फिर से कुरेदने की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या चुनाव से पहले माहौल गरमाने की कोशिश हो रही है?
भूमि मुद्दों पर भी की गई सिफारिशें
रिपोर्ट में प्रवासी आबादी की भूमि कब्ज़े को सबसे बड़ा तनाव का कारण बताया गया और कश्मीर की तर्ज़ पर भूमि सुरक्षा क़ानून लागू करने की सिफारिश की गई। इसके अलावा आयोग ने गैर-असमिया लोगों को भूमि हस्तांतरण पर उचित प्रतिबंध की भी सलाह दी और NRC या राज्य में न्यूनतम निवास अवधि को ‘असमिया’ की परिभाषा का आधार बनाने का सुझाव दिया।
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आयोग ने प्रशासनिक चूक पर भी सवाल उठाए
तिवारी आयोग ने यह भी जांचा कि प्रशासन ने हिंसा रोकने के लिए क्या कदम उठाए और क्या कहीं कोई कमी रह गई। हालांकि आयोग ने कहा कि आंदोलन की तीव्रता अनुमान से काफी ज्यादा थी, फिर भी सिस्टम ने परिस्थितियों के अनुरूप काम किया।
अंतिम रिपोर्ट 1984 में जमा हुई थी
यह संपूर्ण जांच जुलाई 1983 में शुरू हुई थी और अंतिम रिपोर्ट मई 1984 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के पास जमा हुई थी। 1987 में AGP सरकार ने इसे विधानसभा में रखा, लेकिन पर्याप्त प्रतियां उपलब्ध न होने के कारण रिपोर्ट उस समय विधायकों के बीच वितरित नहीं की जा सकी।
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