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Swadeshi: सबसे बड़ी समस्याओं का जवाब है स्वदेशी, वैश्विक चुनौती से घरेलू संकट तक सुलझाने में होगा मददगार

Tue, 23 Sep 2025 04:16 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 23 Sep 2025 04:16 PM IST
सार

पीएम मोदी ने जनता से अपील की है कि, हर दुकानदार अपनी दुकानों के सामने यह बोर्ड लगाए कि वे स्वदेशी बेचते हैं और इसमें गर्व महसूस करते हैं। पीएम की यह अपील अमेरिका के टैरिफ वॉर और एच वन बी वीजा पर भारी शुल्क लगाने के बाद और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है।

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Swadeshi is the answer to most problems, it will help in solving everything from global challenges
पीएम मोदी। - फोटो : Youtube/DDNews

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मंच से लोगों को स्वदेशी अपनाने पर जोर दे रहे हैं। उनकी अपील है कि हर दुकानदार अपनी दुकानों के सामने यह बोर्ड लगाए कि वे स्वदेशी बेचते हैं और इसमें गर्व महसूस करते हैं। पीएम की यह अपील अमेरिका के टैरिफ वॉर और एच वन बी वीजा पर भारी शुल्क लगाने के बाद और ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। इसके पहले चीन ने भी रेयर अर्थ मेटल को एक रणनीतिक वस्तु की तरह उपयोग किया था और भारत जैसे अनेक देशों के सामने संकट पैदा कर दिया था। इसके बाद से ही यह अपील की जाने लगी कि भारत जैसे देश को महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होना चाहिए। लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि आज के ग्लोबलाइजेशन के दौर में पूरी तरह स्वदेशी होने की बात करना कितना प्रासंगिक है? स्वदेशी अपनाना किस हद तक संभव है और इसके क्या परिणाम सामने आ सकते हैं?      

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कोर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नहीं हो रहा निवेश
भारत का व्यापार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत तेजी के साथ बढ़ रहा है। युवा नए-नए स्टार्टअप लगाकर अपना रोजगार खड़ा कर रहे हैं और इनमें से कुछ सफल भी हो रहे हैं। लेकिन ध्यान से देखने पर समझ आता है कि हमारे युवाओं के ज्यादातर व्यवसाय सर्विस प्रोवाइडर कैटेगरी में हैं। जैसे कोई ऐप या सॉफ्टवेयर विकसित कर खाना, कपड़ा या अन्य सामान पहुंचाने का काम कर रहा है तो कोई घूमने या कोई अन्य सेवा को प्रदान कर रहा है। ये व्यवसाय बुरे नहीं हैं, लेकिन समझने की आवश्यकता है कि ये केवल सर्विस सेक्टर है। यह कोर मैन्युफैक्चरिंग नहीं है।  
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इसी तरह भारत ने मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी चीजों को बनाने में अच्छी प्रगति दिखाई है। लेकिन इनमें से अधिकतम चीजों की केवल असेंबलिंग हो रही है। इनमें लगने वाली सभी मशीनों, कल-पुर्जों का चीन जैसे देशों से आयात किया जा रहा है और भारत के नोएडा-गुरुग्राम या बंगलौर जैसे शहरों में इनकी असेंबलिंग कर इन पर भारत में बने होने का ठप्पा लगाया जा रहा है। लेकिन यह भी कोर मैन्युफैक्चरिंग नहीं है। जब भी ये देश चाहें, हमें कोर मशीनों, कलपुर्जों का निर्यात बंद कर इन वस्तुओं के उत्पादन में हमें शून्य स्तर पर ला सकते हैं। 
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हेल्थ सेक्टर में भी यही हालात
भारत स्वास्थ्य सेक्टर में दवाइयों, मेडिसिनल कपड़ों, मशीनों के उत्पादन में एक वैश्विक शक्ति बना है। लेकिन मोबाइल-लैपटॉप सेक्टर की तरह इस सेक्टर में उपयोग होने वाली अधिकतम वस्तुएं, रसायन और मशीनों का चीन से आयात किया जा रहा है। यदि कल चीन इन रसायनों का निर्यात रोक दे तो भारत में अनेक दवाइयों के निर्माण में भारी परेशानी पैदा हो जाएगी। भारत सौर ऊर्जा का बड़ा खिलाड़ी बनने की राह पर है। लेकिन इस सेक्टर में भी लगभग वही स्थिति है। यानी यदि चीन आज सौर ऊर्जा के पैनल और बैटरियां निर्यात करना बंद कर दे तो हमारे सामने वही स्थिति पैदा हो जाएगी जैसे कि अमेरिकी  टैरिफ लगाने के बाद हमारे एमएसएमई सेक्टर के उद्योगों के सामने हुई है।    

सेमीकंडक्टर सेक्टर में सराहनीय काम
सेमीकंडक्टर इस समय का ऐसा सबसे महत्त्वपूर्ण कच्चा माल है जिसके बिना घरों के सामान्य उपकरण से लेकर अंतरिक्ष में चलने वाले वायुयान-सैटेलाइट तक ठप पड़ सकते हैं। केंद्र सरकार ने इसकी आवश्यकता को महसूस करते हुए इसमें भारी पैसा और तकनीक निवेश किया। इसका परिणाम हुआ है कि इसी साल के अंत तक यानी दो से तीन महीनों के अंदर पूर्ण रूप से स्वदेशी सेमीकंडक्टरों का निर्माण होने लगेगा। यह इस सेक्टर में भारत की बड़ी उपलब्धि साबित होगी। 

भारत को इसी तरह मोबाइल, लैपटॉप, सौर ऊर्जा पैनल, बैटरी, हेल्थ सेक्टर के उपकरण, रसायनों के उत्पादन, बड़ी वस्तुओं के निर्माण की मशीनें और रक्षा क्षेत्र में उपयोग में आने वाली मशीनों के निर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी। केंद्र सरकार इन सेक्टरों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए दीर्घकालिक योजनाएं बना रही है।     

कोर मैन्युफैक्चरिंग में निवेश न आने का कारण
कोर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अधिक निवेश न होने के स्पष्ट कारण हैं। इन सेक्टरों में शुरुआती दौर में अधिक पूंजी निवेश होता है। कच्चे माल से लेकर मशीनों और श्रम बल पर पैसा खर्च करना पड़ता है। इसके बाद इससे आमदनी भी धीरे-धीरे बढ़ती है। जबकि सॉफ्टवेयर आधारित सेवाओं में थोड़ी लागत से तुरंत रिटर्न आने की संभावना पहले दिन से ही बनी जाती है। यही कारण है कि युवा कोर मैन्युफैक्चरिंग की बजाय सेवा क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता देते हैं। 

पीएम की अपील का सही अर्थ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का सही अर्थ यह है कि भारत के युवा कोर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश करें। जैसे बड़ी मशीनों का निर्माण करें, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी के कलपुर्जे बनाने की मशीनें स्थापित करें। जिस तरह कपड़े के उत्पादन में कपास पैदा करने से लेकर कपड़ों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्वालिटी का बनाने तक का पूरा कामकाज भारत में होता है, इसी तरह मोबाइल और लैपटॉप सहित हर वस्तु के निर्माण में लगने वाली सभी चीजों का उत्पादन भारत में हो। केवल ऐसा होने पर ही कोई देश हमें इसके निर्यात को रोककर ब्लैकमेल करने की स्थिति में नहीं रहेगा।  

'स्वदेशी को सही संदर्भ में समझने की आवश्यकता'
केसीसी ग्रुप के संस्थापक और एमएसएमई विशेषज्ञ शरद कोहली ने अमर उजाला से कहा कि आज के ग्लोबलाइजेशन के दौर में संपूर्ण रूप में स्वदेशी होना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। हर देश अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुसार किसी क्षेत्र का महारथी है तो किसी अन्य देश को किसी दूसरे क्षेत्र में महारत हासिल है। और आज के दौर में हर देश को सभी चीजों की उतनी ही आवश्यकता है। ऐसे में उनका मानना है कि पूरी तरह अपने व्यापार पर निर्भर होने की बात कल्पना से अधिक कुछ नहीं है। 

शरद कोहली ने कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी की अपील करते हैं तो इसको सही अर्थ में समझने की आवश्यकता है। उनका यह आशय नहीं है कि व्यापारी किसी दूसरे देश से व्यापार या संपर्क न करें। लेकिन पीएम का व्यापक अर्थ यह है कि आप हर क्षेत्र में न्यूनतम रूप से इतने सक्षम रहें कि कोई आपको ब्लैकमेल न कर सके। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में चीन ने रेयर अर्थ मेटल को और अमेरिका ने टैरिफ या एच वन बी वीजा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। पीएम की अपील है कि हम हर सेक्टर में इतने सक्षम होने चाहिए कि कोई हमें इसके कारण कमजोर स्थिति में न डाल सके।


'करोड़ों लोगों को रोजगार देने का माध्यम है स्वदेशी'
साउथ एशियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सर्वेश पाठक ने अमर उजाला से कहा कि भारत देश की आबादी 140 करोड़ से ऊपर हो गई है। हमारे यहां हर साल करोड़ों बच्चे 18 वर्ष की आयु या शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में निकल रहे हैं। लेकिन सरकारी क्षेत्र या निजी क्षेत्र अब नई नौकरियों को देने की अपनी अधिकतम क्षमता पर पहुंच चुके हैं। इन क्षेत्रों में नए अवसरों की कमी के कारण बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेने के बाद भी युवा लोगों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि इन करोड़ों युवाओं को स्वदेशी उत्पादन क्षेत्र में काम करने का मंत्र देकर नौकरियों का संकट समाप्त किया जा सकता है। इससे न केवल भारत में उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि आने वाली आबादी को नौकरियों का संकट भी नहीं होगा। 

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