{"_id":"6329f420f7cfc329af670cb5","slug":"supreme-court-will-investigate-the-practice-of-boycotting-religion-implemented-in-dawoodi-bohra-community","type":"story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: दाउदी बोहरा समुदाय में लागू धर्म-बहिष्कार प्रथा की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: दाउदी बोहरा समुदाय में लागू धर्म-बहिष्कार प्रथा की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट
Tue, 20 Sep 2022 10:40 PM IST
Amit Mandal
एजेंसी, नई दिल्ली।
एजेंसी, नई दिल्ली।
Published by: Amit Mandal
Updated Tue, 20 Sep 2022 10:40 PM IST
सार
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि मामला धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है इसलिए इसे उस पीठ को भेजा जाना चाहिए जो सबरीमाला केस सुनेगी।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा है कि वह दाउदी बोहरा समुदाय में लागू बहिष्कार प्रथा के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करेगा। इसके लिए 11 अक्तूबर की तारीख तय की गई है। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने तय किया कि वह इस बात की जांच करेगी कि महाराष्ट्र सामाजिक बहिष्कार संरक्षण कानून, 2016 के अस्तित्व में आने के बाद, क्या दाउदी बोहरा समुदाय की इस प्रथा को ‘संरक्षित प्रथा’ के रूप में जारी रखा जा सकता है।
विज्ञापन
मामले में उठे सवाल 2016 का कानून लागू होने के बाद विवादास्पद हुए
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि मामला धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है इसलिए इसे उस पीठ को भेजा जाना चाहिए जो सबरीमाला केस सुनेगी। एक पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील फली नरीमन ने कहा कि मामले में उठे सवाल 2016 का कानून लागू होने के बाद विवादास्पद हो गए हैं। इस कानून ने बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्यूनिकेशन एक्ट 1949 का स्थान लिया है। नरीमन ने कहा, 2016 का कानून सभी पीड़ितों को सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ राहत देता है। किसी धार्मिक संस्था द्वारा सामाजिक बहिष्कार किए जाने की स्थिति में नजदीकी मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यदि किसी समुदाय का कोई सदस्य बहिष्कृत किया जाता है तो कृपया शिकायत दर्ज कराएं। बहिष्कार अब कानूनी रूप से संभव नहीं है।
विज्ञापन
हालांकि कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा कि सामाजिक बहिष्कार पर एक आम कानून बोहरा समुदाय के सदस्यों को बहिष्कार से नहीं बचाता। उन्होंने कहा, 2016 का कानून महाराष्ट्र तक सीमित है जबकि बोहरा समुदाय की प्रथा महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। संविधान पीठ सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाउदी बोहरा कम्यूनिटी द्वारा 1986 में दायर मामले पर सुनवाई कर रही है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 1962 के पांच सदस्यीय पीठ के फैसले को चुनौती दी गई है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट का 1962 का फैसला दाउदी बोहरा समुदाय के प्रमुख सैयदना ताहेर सैफुद्दीन की याचिका पर आया था जिसमें उन्होंने बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्यूनिकेशन एक्ट 1949 को यह कहते हुए चुनौती दी थी कि कानून संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। सैफुद्दीन का पक्ष था कि उक्त कानून एक समुदाय के प्रमुख के रूप में अपने धर्म के पालन के उनके अधिकार में बाधक है। समुदाय प्रमुख के रूप में उनके पास समुदाय के गुमराह सदस्यों को अनुशासित करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में बहिष्कार की प्रथा को वैध करार देते हुए 1949 के कानून को असांविधानिक करार दिया था।