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SC: मौलिक कर्तव्य से जुड़ी याचिका पर राज्यों के जवाब दाखिल न करने से सुप्रीम कोर्ट नाराज, पढ़ें अहम खबरें

Tue, 14 Feb 2023 10:40 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 14 Feb 2023 10:40 PM IST
सार

शीर्ष अदालत ने मौलिक कर्तव्यों को बाध्यकारी बनाने की मांग पर राज्य सरकारों की ओर से तय समय में जवाबी हलफनामा दाखिल न करने को लेकर नाराजगी जताई। जस्टिस एसके कौल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। पढ़ें अहम खबरें...

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Supreme Court voices displeasure over states not filing affidavit on time latest update news
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

विस्तार

मौलिक कर्तव्यों को बाध्यकारी बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई की। इस दौरान शीर्ष अदालत ने इस मामले में राज्य सरकारों की ओर से तय समय में जवाबी हलफनामा दाखिल न करने को लेकर नाराजगी जताई। जस्टिस एसके कौल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। 

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इस दौरान पीठ ने हलफनामा दाखिल न करने वाले राज्यों के संबंधित विभागीय सचिवों को अगली सुनवाई पर कोर्ट में वर्चुअल तरीके से पेश होने का आदेश दिया। 

आदेश जारी करने से पहले जस्टिस एसके कौल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ के सामने याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि कई राज्यों ने अब तक हलफनामा नहीं दिया है और जिन राज्यों ने दिया भी है उन्होंने कोर्ट की समयसीमा का पालन नहीं किया। इसपर पीठ ने कहा कि जिन राज्यों ने देर से हलफनामा दायर किया है उनके जवाब रिकॉर्ड पर लिए जाएंगे।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन के चुनावों की देखरेख करेंगे पूर्व न्यायाधीश एल नागेश्वर राव  
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव को हैदराबाद क्रिकेट संघ (एचसीए) के पदाधिकारियों के आगामी चुनावों की निगरानी के लिए नियुक्त किया। साथ ही जस्टिस संजय किशन कौल, मनोज मिश्रा और अरविंद कुमार की पीठ ने एचसीए को एक व्यक्ति वाले पैनल को सभी आवश्यक सहायता देने का भी निर्देश दिया। मामले में पीठ ने  कहा कि गतिरोध समाप्त होना चाहिए और एक निष्पक्ष चुनाव होना चाहिए।

पीठ ने यह भी कहा कि न्यायमूर्ति राव निष्पक्ष रूप से चुनाव की निगरानी के लिए सभी जरूरी सहायता ले सकते हैं। साथ ही उसका खर्च एचसीए द्वारा वहन किया जाएगा। इस दौरान पीठ ने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत सभी खेल संघों की निगरानी नहीं कर सकती है। साथ ही यदि न्यायमूर्ति राव को कुछ न्यायिक निर्देशों की आवश्यकता होती है, तो मामले को उस सीमित उद्देश्य के लिए पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सकता है। एसोसिएशन के कामकाज से जुड़े अन्य पहलुओं पर कोर्ट 2 मार्च 2023 को मामले की अगली सुनवाई करेगी।

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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट ने पक्ष सुने बिना जुर्माना लगाने की प्रथा की निंदा की
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संबंधित पक्ष से जवाब मांगे बिना जुर्माना लगाने के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को फटकार लगाई है। जस्टिस बी आर गवई और सी टी रविकुमार की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है।

गौरतलब है कि अदालत ने जिस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की उसमें आरोप लगाया गया था कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने एक पक्ष को सुने बिना उस पर भारी जुर्माना लगाया है। पीठ ने एक पीड़ित पक्ष की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार की दलीलों पर ध्यान देते हुए कहा कि 'न्यायाधिकरण कैसे काम कर रहे हैं, केवल समिति की रिपोर्ट के आधार पर पार्टियों को नोटिस दिए बिना आदेश पारित कर रहे हैं? प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूरी तरह से उल्लंघन है।'

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

उद्धव ठाकरे गुट ने SC से की अपील
 शिवसेना के उद्धव ठाकरे धड़े ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से संबंधित मामलों को सात न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा जाए। साथ ही अयोग्यता याचिकाओं से निपटने के लिए विधानसभा अध्यक्षों की शक्तियों पर 2016 के एक फैसले पर भी पुनर्विचार किया जाए। 

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ से कहा कि नबाम रेबिया मामले में निर्धारित कानून पर पुनर्विचार करने की अनिवार्य आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए 10वीं अनुसूची पर फिर से विचार करने का समय है।  उन्होंने प्रस्तुत किया कि 10वीं अनुसूची राजनीतिक दल-बदल के संवैधानिक अपराध को प्रतिबंधित करने और रोकने का प्रयास करती है, जिसे लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में पहचाना जाता है।

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