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उच्चतम न्यायालय का फैसला- जनप्रतिनिधि चुने जाने वाले वकील अदालतों में कर सकते हैं प्रैक्टिस
न्यूज डेस्क,अमर उजाला
Updated Tue, 25 Sep 2018 12:04 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें पेशे से वकील जनप्रतिनिधियों के देशभर की अदालतों में प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून अदालतों में उनके प्रैक्टिस करने पर कोई पाबंदी नहीं लगाता है।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम जनप्रतिनिधियों के वकीलों के तौर पर प्रैक्टिस करने पर रोक नहीं लगाते हैं। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि वकील के सांसद या विधायक बनने पर उनके प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया जनप्रतिनिधियों के वकीलों के तौर पर प्रैक्टिस करने पर रोक नहीं लगाता है।
शीर्ष अदालत भाजपा नेता एवं वकील अश्वनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें पेशे से वकील जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायकों और पार्षदों) के कार्यकाल के दौरान अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
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अदालत ने इस जनहित याचिका पर नौ जुलाई को आदेश सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने केंद्र के उस जवाब पर गौर किया जिसमें कहा गया था कि सांसद या विधायक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। वह सरकार का पूर्णकालिक कर्मचारी नहीं होता इसलिए याचिका विचारयोग्य नहीं है।
उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नाफड़े ने अदालत को बताया कि जन प्रतिनिधि राजकोष से वेतन पाते हैं और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने वेतनभोगी कर्मचारी के अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगा रखी है। इसपर पीठ ने कहा कि रोजगार अपने आप में ही मालिक-नौकर का संबंध बताता है और भारत की सरकार संसद के सदस्य की मालिक नहीं होती।
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प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम जनप्रतिनिधियों के वकीलों के तौर पर प्रैक्टिस करने पर रोक नहीं लगाते हैं। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा कि वकील के सांसद या विधायक बनने पर उनके प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया जनप्रतिनिधियों के वकीलों के तौर पर प्रैक्टिस करने पर रोक नहीं लगाता है।
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शीर्ष अदालत भाजपा नेता एवं वकील अश्वनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें पेशे से वकील जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायकों और पार्षदों) के कार्यकाल के दौरान अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
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अदालत ने इस जनहित याचिका पर नौ जुलाई को आदेश सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने केंद्र के उस जवाब पर गौर किया जिसमें कहा गया था कि सांसद या विधायक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। वह सरकार का पूर्णकालिक कर्मचारी नहीं होता इसलिए याचिका विचारयोग्य नहीं है।
उपाध्याय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नाफड़े ने अदालत को बताया कि जन प्रतिनिधि राजकोष से वेतन पाते हैं और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने वेतनभोगी कर्मचारी के अदालत में प्रैक्टिस करने पर रोक लगा रखी है। इसपर पीठ ने कहा कि रोजगार अपने आप में ही मालिक-नौकर का संबंध बताता है और भारत की सरकार संसद के सदस्य की मालिक नहीं होती।
याचिका में कहा गया था कि कोई भी जन सेवक वकील के तौर पर प्रैक्टिस नहीं कर सकता है जबकि कई जन प्रतिनिधि विभिन्न अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे हैं और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।