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Supreme Court: '32 हफ्ते का गर्भ खत्म नहीं कर सकती महिला', शीर्ष अदालत का हाईकोर्ट के फैसले में दखल से इनकार

Wed, 31 Jan 2024 04:59 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Wed, 31 Jan 2024 04:59 PM IST
सार

Supreme Court: शीर्ष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 23 जनवरी के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने चार जनवरी के फैसले को वापस ले लिया था, जिसमें महिला को अपने 29 माह पुराने गर्भ को गिराने की अनुमति दी गई थी। 

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Supreme Court Updates: Top Court refuses to allow woman to terminate over 32-week pregnancy
न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को एक महिला को 32 हफ्ते से ज्यादा समय के गर्भ को गिराने की अनुमति देने से इनकार किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने भी इस बात को माना है कि इसे अब खत्म नहीं किया जा सकता है। छब्बीस वर्षीय महिला के पति की पिछले साल अक्तूबर में मौत हो गई थी। 

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उच्च न्यायालय के फैसले में दखल देने किया इनकार
न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने मामले पर सुनवाई की। पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 23 जनवरी के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने चार जनवरी के फैसले को वापस ले लिया था, जिसमें महिला को अपने 29 माह पुराने गर्भ को गिराने की अनुमति दी गई थी। 

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महिला के वकील ने दी ये दलील
पीठ ने कहा, 'गर्भ को 32 महीने पूरे हो चुके हैं, इसे अब कैसे खत्म किया जा सकता है? मेडिकल बोर्ड ने भी कहा है कि इसे खत्म नहीं किया जा सकता है। आप चाहें तो इसे गोद लेने के लिए दे सकते हैं।' महिला की ओर से वकील अमित मिश्रा पेश हुए। उन्होंने कहा कि अगर वह बच्चे को जन्म देती हैं तो यह उनकी (महिला) इच्छा के खिलाफ होगा। उन्हें पूरी जिंदगी सदमे में गुजारनी होगी। 

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने हरेक बिंदु पर किया विचार
पीठ ने आगे कहा, उच्च न्यायालय ने हरेक बिंदु पर विचार किया है। इसमें मेडिकल बोर्ड का विचार भी शामिल है।अदालत ने कहा, हम मेडिकल बोर्ड की राय से आगे नहीं जा सकते। बोर्ड ने राय दी है कि इसमें कोई असमान्यता नहीं है और यह एक सामान्य भ्रूण है। पीठ ने कहा, बोर्ड की ओर से यह भी राय दी गई है कि अगर याचिकाकर्ता (महिला) गर्भावस्था जारी रखती हैं, तो उन्हें भी कोई खतरा नहीं है। 

शीर्ष अदालत ने खारिज की याचिका
इसके बाद वकील अमित मिश्रा ने दलील दी कि महिला विधवा है और उसे जीवनभर इस सदमे को सहना होगा। अदालत को उसके हित पर विचार करना चाहिए। इसके बाद न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी ने पूछा, तो क्या हमें सिर्फ उसके हित पर विचार करना चाहिए? इसके बाद पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

महाराष्ट्र: छह पुलिस कर्मियों पर 12 लाख का जुर्माना
उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र के छह पुलिस कर्मियों पर 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। उन पर तीन लोगों को अवैध रूप से हिरासत में रखने का आरोप लगा था। पुलिस कर्मियों पर बिना किसी न्यायिक आदेश के उनके किराए के परिसर को ध्वस्त में भूमिका निभाने का भी आरोप था। 

पूरा मामला क्या है?
मामले के तथ्यों के मुताबिक, जलगांव के इन छह पुलिस कर्मियों ने नौ मार्च, 2022 को विजय कुमार विश्वनाथ धवाले, विनोद दोधु चौधरी सहित तीन किरायेदारों को थाने बुलाया और उन्हें चौबीस घंटे तक हिरासत में रखा। न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मंगलवार को मामले पर सुनवाई की। इसके बाद अपने फैसले में कहा, हिरासत में लिए गए व्यक्ति के परिसर को पूर्व मालिक के रिश्तेदारों ने ध्वस्त किया और किरायेदारों को कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कने के लिए मजबूर किया। जिसमें परिसर खाली करने की सहमति दी गई थी।

दस-दस लाख रुपये देकर सुलझाया था मामला
पीठ ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि संपत्ति के बाद के खरीददारों ने बेदखल किए गए किरायेदारों को दस-दस लाख रुपये का भुगतान किया। जिससे किरायेदारों और तेरह आरोपियों के बीच विवाद सुलझा लिया गया। जिसमें पूर्व मालिक और छह पुलिसकर्मी शामिल थे। 

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