Supreme Court: बाल तस्करी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 13 लोगों की जमानत रद्द की; रैकेट पर की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में 70 वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है। इस सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट स्थगित और अस्वीकृत उम्मीदवारों के मामलों पर फिर से सुनवाई करे। आइए पढ़ते हैं सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...।
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट को आदेश दिया कि वह वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने वाले आवेदनों पर नए सिरे से विचार करे। इसमें उन उम्मीदवारों के आवेदन शामिल किए जाएं, तो अस्वीकृत और स्थगित कर दिए गए थे। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय स्थगित और अस्वीकृत उम्मीदवारों के मामलों पर दिल्ली हाईकोर्ट वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम नियम 2024 के अनुसार विचार करे। मामला यह है कि एक सदस्य द्वारा दिए गए अंकों पर विचार नहीं किया गया।
पीठ ने कहा कि रजिस्ट्रार जनरल 2024 नियम के नियम 3 के अनुसार स्थायी समिति के पुनर्गठन के लिए कदम उठाएंगे। स्थगित और अस्वीकृत आवेदकों के आवेदन फिर से स्थायी समिति के समक्ष रखे जाएंगे, जिन पर नियम 2024 के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
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सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 302 आवेदकों में से 70 को नवंबर 2024 में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया है, जबकि 67 उम्मीदवारों के आवेदन स्थगित कर दिए गए हैं और बाकी को खारिज कर दिया गया है। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय से वरिष्ठ पदनाम प्रदान करने की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करने के लिए कहा।
याचिका में नवंबर 2024 में 70 वकीलों को वरिष्ठ पदनाम देने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है। उच्च न्यायालय ने 12 महिलाओं सहित 70 वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता नामित किया है। स्थायी समिति ने उम्मीदवारों का मूल्यांकन किया। इसके बाद वरिष्ठ पदनाम प्रदान किये गए।
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300 से अधिक वकीलों ने वरिष्ठ उपाधि के लिए आवेदन किया था। इससे पहले शीर्ष अदालत ने 20 फरवरी को कहा था कि वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता नामित करने के मामले में गंभीर आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है और इस मुद्दे को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को भेज दिया ताकि वे तय कर सकें कि इस मामले की सुनवाई बड़ी पीठ को करनी चाहिए या नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट ने गज्जला उदय कुमार रेड्डी नाम के एक आरोपी को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस दो याचिकाओं पर जारी हुआ है। एक याचिका सीबीआई की ओर से है, दूसरी याचिका सुनीता नरेड्डी की ओर से, जो विवेकानंद रेड्डी की बेटी हैं। इन दोनों याचिकाओं में गज्जला उदय कुमार रेड्डी की जमानत रद्द करने की मांग की गई है। पूर्व कांग्रेस सांसद वाईएस विवेकानंद रेड्डी की मार्च 2019 में आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में उनके घर में हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच CBI कर रही है। जांच में यह मामला एक बड़ी साज़िश के रूप में सामने आया जिसमें कई लोग शामिल बताए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट इस समय यह तय कर रहा है कि जिन आरोपियों को हाई कोर्ट से ज़मानत मिली है, क्या वह कानूनन सही थी या नहीं। सुनीता और सीबीआई दोनों का कहना है कि यह ज़मानत केस की निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित कर सकती है।
देश में अंतर-राज्यीय बाल तस्करी रैकेट पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 13 आरोपियों की जमानत रद्द कर दी और कहा कि 'न्याय के लिए सामूहिक पुकार, शांति और सद्भाव की उसकी इच्छा' को महत्वहीन नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा, 'हम राज्य सरकार को निर्देश देते हैं कि वह सुनिश्चित करे कि तस्करी किए गए बच्चों को बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार स्कूलों में दाखिला मिले और उनकी शिक्षा के लिए सहायता प्रदान करना जारी रखा जाए।' शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत में तस्करी ने विभिन्न रूप ले लिए हैं - प्रत्येक राज्य में प्रचलित है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि हालांकि स्वतंत्रता एक व्यक्ति के जीवन में एक बहुत ही मूल्यवान मूल्य है, लेकिन इसे नियंत्रित और प्रतिबंधित किया गया है और समाज में कोई भी तत्व इस तरह से कार्य नहीं कर सकता है जिससे दूसरों के जीवन और स्वतंत्रता को खतरा हो। जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने अंतर-राज्यीय मानव तस्करी मामले में 13 आरोपियों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए उन्हें समाज के लिए बड़ा खतरा बताया।
पीठ ने कहा, यह स्पष्ट है कि हालांकि स्वतंत्रता एक व्यक्ति के जीवन में एक बहुत ही मूल्यवान मूल्य है, लेकिन इसे नियंत्रित और प्रतिबंधित किया गया है और समाज में कोई भी तत्व इस तरह से कार्य नहीं कर सकता है जिससे दूसरों के जीवन या स्वतंत्रता को खतरा हो, क्योंकि विवेकशील सामूहिकता किसी असामाजिक या सामूहिक विरोधी कार्य का समर्थन नहीं करती है। शीर्ष अदालत ने गंभीर अपराधों में आरोपी व्यक्तियों को जमानत देने और जमानत रद्द करने के अपने कानूनी सिद्धांतों का हवाला दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट को कमजोर दृष्टि वाली महिला को सिविल जज नियुक्त करने का निर्देश दिया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए हाईकोर्ट से कहा कि या तो आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य श्रेणी की रेखा शर्मा को नियुक्त करे या अतिरिक्त सीट बनाए।
याचिकाकर्ता रेखा शर्मा की ओर से पेश वकील तल्हा अब्दुल रहमान ने कहा कि राजस्थान की न्यायपालिका में बेंचमार्क दिव्यांगता (पीडब्ल्यूबीडीएस) वाले उम्मीदवारों के लिए नौ पद और अंधता व कम दृष्टि वाले उम्मीदवारों के लिए दो पद आरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि रेखा शर्मा ने 119 अंक प्राप्त किए हैं, जो अंधता और कमजोर दृष्टि वाले उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम योग्यता अंक से ज्यादा है। लेकिन उन्हें न्यायिक अधिकारी के तौर पर नियुक्ति देने से इन्कार कर दिया गया। वकील ने कहा कि इन नौ रिक्तियों के लिए विशेष आरक्षित श्रेणी में केवल दो लोगों का चयन किया गया। इसलिए रेखा शर्मा को नियुक्त किया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने बेंचमार्क दिव्यांगता वाले आरक्षित पद पर अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार को नियुक्ति दे दी। उसे उस श्रेणी के लिए आरक्षित सीट से नियुक्ति दी जा सकती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक विकारों से पीड़ित बेघर लोगों की देखभाल के लिए समुचित नीति बनाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर मंगलवार को केंद्र से जवाब मांगा। इस याचिका में कहा गया है कि मनोसामाजिक अक्षमता वाले बेघर लोगों को अक्सर उपेक्षा, सामाजिक अलगाव और शारीरिक और यौन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष पेश याचिका में अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने ऐसे लोगों के साथ मानवीय और प्रभावी व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए कानून प्रवर्तन (पुलिस विभाग) और चिकित्सा स्वास्थ्य विभागों सहित प्रमुख हितधारकों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं को तैयार करने और लागू करने का निर्देश देने का अनुरोध किया। याचिका में बताया गया कि मनोसामाजिक अक्षमता से तात्पर्य उन चुनौतियों से है जिनका सामना मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त लोग भेदभाव, समर्थन की कमी आदि के कारण करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह इस पर 30 अप्रैल को दलीलें सुनेगा कि क्या हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई करना भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह मामला जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस अभय एस ओका की विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। पीठ ने कहा, हमें कम से कम दो घंटे की जरूरत होगी...हम इसे किसी बुधवार को सुनेंगे। यदि इस पर दलीलें बुधवार दोपहर तक खत्म नहीं होती हैं तो हम बृहस्पतिवार को भी सुनवाई जारी रखेंगे। इसके साथ ही सुनवाई 30 अप्रैल को तय कर दी। शीर्ष अदालत हाईकोर्ट के एक अतिरिक्त न्यायाधीश के खिलाफ दायर दो शिकायतों पर लोकपाल के 27 जनवरी के आदेश के संबंध में स्वत: संज्ञान लेकर यह सुनवाई कर रहा है। शिकायतों में कहा गया है कि न्यायाधीश ने राज्य के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश और उसी हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को प्रभावित किया, जिन्हें एक निजी कंपनी की तरफ से शिकायतकर्ता के खिलाफ दायर मुकदमे की सुनवाई करनी थी।
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