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Supreme Court Updates: लैंगिक संवेदीकरण समिति का हुआ पुनर्गठन, जस्टिस बीवी नागरत्ना बनीं अध्यक्ष
Tue, 16 Jun 2026 05:03 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 16 Jun 2026 05:03 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी 'लैंगिक संवेदीकरण और आंतरिक शिकायत समिति' का पुनर्गठन किया है। 12 सदस्यों वाली इस नई समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना करेंगी। इस पैनल में जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी सहित कई प्रमुख कानूनविदों को शामिल किया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश की सर्वोच्च अदालत से एक बड़ी और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी 'लैंगिक संवेदीकरण और आंतरिक शिकायत समिति' (जीएसआईसीसी) का पुनर्गठन कर दिया है। महिलाओं की सुरक्षा और कार्यस्थल पर लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिहाज से इस समिति को बेहद अहम माना जाता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के निर्देश पर इस उच्च स्तरीय समिति को नया स्वरूप दिया गया है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना को कमान
इस नवगठित 12 सदस्यीय समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना को सौंपी गई है। उन्हें इस बेहद महत्वपूर्ण पैनल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। कार्यालय आदेश के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के लैंगिक संवेदीकरण और यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) विनियम, 2013 के तहत मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस समिति का पुनर्गठन किया है।
कई दिग्गजों के नाम शामिल
इस नई समिति में न्यायपालिका और कानून के क्षेत्र से जुड़े कई बड़े नामों को शामिल किया गया है। समिति के अन्य सदस्यों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह और रजिस्ट्रार कावेरी शामिल हैं। इनके अलावा देश की जानी-मानी वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यू को भी इस पैनल का हिस्सा बनाया गया है। यह विविधता समिति को और अधिक प्रभावी बनाएगी।
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वकीलों और सलाहकारों को जगह
पैनल में वकालत और कानूनी पेशा जगत के अन्य प्रतिनिधियों को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है। समिति के अन्य सम्मानित सदस्यों में अधिवक्ता नीना गुप्ता, सौम्यजीत पाणि, साक्षी बंगा, प्रभा स्वामी और माहेरविश रीन शामिल हैं। इनके अलावा, सुप्रीम कोर्ट बार क्लर्क्स एसोसिएशन की प्रतिनिधि सुषमा रावत और 'विविधता कंसल्टिंग' की संस्थापक स्नेह शर्मा को भी इस 12 सदस्यीय विशेष पैनल में जगह दी गई है।
यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: लोकायुक्त की जांच शाखा पर RTI से छूट खत्म, मध्य प्रदेश सरकार को झटका
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जस्टिस बीवी नागरत्ना को कमान
इस नवगठित 12 सदस्यीय समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना को सौंपी गई है। उन्हें इस बेहद महत्वपूर्ण पैनल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। कार्यालय आदेश के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के लैंगिक संवेदीकरण और यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) विनियम, 2013 के तहत मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस समिति का पुनर्गठन किया है।
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कई दिग्गजों के नाम शामिल
इस नई समिति में न्यायपालिका और कानून के क्षेत्र से जुड़े कई बड़े नामों को शामिल किया गया है। समिति के अन्य सदस्यों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह और रजिस्ट्रार कावेरी शामिल हैं। इनके अलावा देश की जानी-मानी वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी और वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यू को भी इस पैनल का हिस्सा बनाया गया है। यह विविधता समिति को और अधिक प्रभावी बनाएगी।
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वकीलों और सलाहकारों को जगह
पैनल में वकालत और कानूनी पेशा जगत के अन्य प्रतिनिधियों को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है। समिति के अन्य सम्मानित सदस्यों में अधिवक्ता नीना गुप्ता, सौम्यजीत पाणि, साक्षी बंगा, प्रभा स्वामी और माहेरविश रीन शामिल हैं। इनके अलावा, सुप्रीम कोर्ट बार क्लर्क्स एसोसिएशन की प्रतिनिधि सुषमा रावत और 'विविधता कंसल्टिंग' की संस्थापक स्नेह शर्मा को भी इस 12 सदस्यीय विशेष पैनल में जगह दी गई है।
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सुप्रीम कोर्ट का एयरपोर्ट्स के पास शहरी निर्माण पर नियम बनाने से इनकार, अहमदाबाद विमान हादसे का दिया गया था हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने देश के हवाई अड्डों के आसपास बेकाबू होते निर्माण कार्यों पर लगाम लगाने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया है। इस जनहित याचिका में पिछले साल अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया विमान हादसे का विशेष रूप से हवाला दिया गया था, जिसमें विमान में सवार यात्रियों और जमीन पर मौजूद लोगों समेत कुल 260 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अधिवक्ता लक्ष्मीकांत मातादीन शुक्ला के माध्यम से शकील शेख की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से नीतिगत मामला है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियमों का निर्धारण करना सरकार का काम है, इसलिए न्यायपालिका इस विषय में सीधे दखल नहीं दे सकती।
बेकाबू निर्माण से हवाई पट्टियों पर बढ़ा जोखिम
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शुक्ला ने कोर्ट में दलील दी कि आज पूरे देश के हवाई अड्डों के भीतर और आसपास बुनियादी ढांचे से जुड़े गंभीर खतरे पैदा हो गए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हवाई अड्डों के आसपास तेजी से बढ़ रहे शहरी ढांचे को नियंत्रित करने के लिए हमारे पास कोई सख्त नियमावली या पुख्ता नियम मौजूद नहीं हैं।
वकील ने पिछले साल 12 जून को हुए एयर इंडिया की उड़ान AI171 के क्रैश होने की घटना का जिक्र किया। उन्होंने अदालत को बताया कि उस भयावह हादसे में कुल 260 लोगों की जान चली गई थी। विमान जिस जगह क्रैश होकर गिरा, वह बीजे मेडिकल कॉलेज का परिसर था, जहां मौजूद 19 डॉक्टरों और छात्रों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। याचिका में केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को हवाई अड्डों के आसपास निर्माण नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने के निर्देश देने की मांग की गई थी।
नीतिगत मामला बताकर सुप्रीम कोर्ट ने झाड़ा पल्ला
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील से सीधे कहा कि चूंकि यह मामला पूरी तरह से नीति निर्माण से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट इस याचिका पर आगे सुनवाई करने का इच्छुक नहीं है। उन्होंने वकील से पूछा कि क्या वे इस याचिका को वापस लेना चाहेंगे? अदालत के कड़े रुख और रुख की गंभीरता को भांपते हुए अधिवक्ता शुक्ला याचिका वापस लेने पर सहमत हो गए। इसके तुरंत बाद, देश की शीर्ष अदालत ने याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज करते हुए मामले को बंद कर दिया।
क्या था पिछले साल का वो दर्दनाक हादसा?
उल्लेखनीय है कि 12 जून 2025 को एयर इंडिया का बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर विमान (पंजीकरण VT-ANB) अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से लंदन के लिए उड़ान भरने के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में विमान में सवार 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई थी। उड़ान भरने के शुरुआती चरण में हुए इस हादसे में चालक दल के सभी 12 सदस्यों की जान चली गई थी, जबकि सिर्फ एक यात्री चमत्कारिक रूप से सुरक्षित बचा था।
विमान टेकऑफ के कुछ ही पलों बाद मेघानीनगर स्थित बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर पर जा गिरा था। मरने वाले यात्रियों में भारत, ब्रिटेन, पुर्तगाल और कनाडा के नागरिक शामिल थे। विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, उड़ान भरने के तुरंत बाद महज एक सेकंड के भीतर विमान के दोनों इंजनों में ईंधन की आपूर्ति रुक गई थी। ब्यूरो इस मामले की विस्तृत अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अधिवक्ता लक्ष्मीकांत मातादीन शुक्ला के माध्यम से शकील शेख की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से नीतिगत मामला है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नियमों का निर्धारण करना सरकार का काम है, इसलिए न्यायपालिका इस विषय में सीधे दखल नहीं दे सकती।
बेकाबू निर्माण से हवाई पट्टियों पर बढ़ा जोखिम
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शुक्ला ने कोर्ट में दलील दी कि आज पूरे देश के हवाई अड्डों के भीतर और आसपास बुनियादी ढांचे से जुड़े गंभीर खतरे पैदा हो गए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हवाई अड्डों के आसपास तेजी से बढ़ रहे शहरी ढांचे को नियंत्रित करने के लिए हमारे पास कोई सख्त नियमावली या पुख्ता नियम मौजूद नहीं हैं।
वकील ने पिछले साल 12 जून को हुए एयर इंडिया की उड़ान AI171 के क्रैश होने की घटना का जिक्र किया। उन्होंने अदालत को बताया कि उस भयावह हादसे में कुल 260 लोगों की जान चली गई थी। विमान जिस जगह क्रैश होकर गिरा, वह बीजे मेडिकल कॉलेज का परिसर था, जहां मौजूद 19 डॉक्टरों और छात्रों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। याचिका में केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को हवाई अड्डों के आसपास निर्माण नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने के निर्देश देने की मांग की गई थी।
नीतिगत मामला बताकर सुप्रीम कोर्ट ने झाड़ा पल्ला
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील से सीधे कहा कि चूंकि यह मामला पूरी तरह से नीति निर्माण से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट इस याचिका पर आगे सुनवाई करने का इच्छुक नहीं है। उन्होंने वकील से पूछा कि क्या वे इस याचिका को वापस लेना चाहेंगे? अदालत के कड़े रुख और रुख की गंभीरता को भांपते हुए अधिवक्ता शुक्ला याचिका वापस लेने पर सहमत हो गए। इसके तुरंत बाद, देश की शीर्ष अदालत ने याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज करते हुए मामले को बंद कर दिया।
क्या था पिछले साल का वो दर्दनाक हादसा?
उल्लेखनीय है कि 12 जून 2025 को एयर इंडिया का बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर विमान (पंजीकरण VT-ANB) अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से लंदन के लिए उड़ान भरने के तुरंत बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में विमान में सवार 241 लोगों और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई थी। उड़ान भरने के शुरुआती चरण में हुए इस हादसे में चालक दल के सभी 12 सदस्यों की जान चली गई थी, जबकि सिर्फ एक यात्री चमत्कारिक रूप से सुरक्षित बचा था।
विमान टेकऑफ के कुछ ही पलों बाद मेघानीनगर स्थित बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल परिसर पर जा गिरा था। मरने वाले यात्रियों में भारत, ब्रिटेन, पुर्तगाल और कनाडा के नागरिक शामिल थे। विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, उड़ान भरने के तुरंत बाद महज एक सेकंड के भीतर विमान के दोनों इंजनों में ईंधन की आपूर्ति रुक गई थी। ब्यूरो इस मामले की विस्तृत अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है।
शीर्ष अदालत का आदेश-त्रिपुरा में एक ही चरण में कराए जाएं ग्राम समितियों के चुनाव
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को त्रिपुरा राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह राज्य के जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद के तहत आने वाली सभी ग्राम समितियों के चुनाव 27 सितंबर को एक ही चरण में कराए। सुप्रीम कोर्ट टिपरा मोथा पार्टी के संस्थापक प्रद्योत देब बर्मन की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें प्राधिकारियों पर चुनाव न कराने का आरोप लगाया गया था। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ का यह निर्देश तब आया, जब त्रिपुरा राज्य निर्वाचन आयोग का पक्ष रखने के लिए उपस्थित हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पूरा चुनाव एक ही चरण में कराने का सुझाव दिया। राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अटॉर्नी जनरल की दलील से सहमति जताई। पीठ ने कहा, हम निर्वाचन आयोग के रुख से पूरी तरह से सहमत हैं। अगर यह एक ही चरण में पूरा हो जाए, तो बेहतर होगा। शीर्ष कोर्ट ने आदेश में कहा, प्रस्तावित तारीखों में केवल एक महीने का अंतर है, इसलिए हम निर्देश देते हैं कि ग्राम समितियों के चुनाव हलफनामे में प्रस्तावित चुनाव कार्यक्रम के अनुसार कराए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को त्रिपुरा राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह राज्य के जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद के तहत आने वाली सभी ग्राम समितियों के चुनाव 27 सितंबर को एक ही चरण में कराए। सुप्रीम कोर्ट टिपरा मोथा पार्टी के संस्थापक प्रद्योत देब बर्मन की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें प्राधिकारियों पर चुनाव न कराने का आरोप लगाया गया था। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ का यह निर्देश तब आया, जब त्रिपुरा राज्य निर्वाचन आयोग का पक्ष रखने के लिए उपस्थित हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पूरा चुनाव एक ही चरण में कराने का सुझाव दिया। राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अटॉर्नी जनरल की दलील से सहमति जताई। पीठ ने कहा, हम निर्वाचन आयोग के रुख से पूरी तरह से सहमत हैं। अगर यह एक ही चरण में पूरा हो जाए, तो बेहतर होगा। शीर्ष कोर्ट ने आदेश में कहा, प्रस्तावित तारीखों में केवल एक महीने का अंतर है, इसलिए हम निर्देश देते हैं कि ग्राम समितियों के चुनाव हलफनामे में प्रस्तावित चुनाव कार्यक्रम के अनुसार कराए जाएं।
आधार पहचान तक ही रहे सीमित... होगी सुप्रीम सुनवाई, केंद्र व राज्यों को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड के दुरुपयोग से जुड़ी एक याचिका पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि आधार का इस्तेमाल सिर्फ पहचान सत्यापन के लिए किया जाए, न कि नागरिकता, निवास, अधिवास (डोमिसाइल) या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस वी मोहन की पीठ ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इसे इसी तरह के लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया। याचिका में केंद्र, राज्यों और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि आधार को सिर्फ पहचान पत्र माना जाए। इसमें यह भी कहा गया है कि नए मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार करना आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) और संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है। याचिका के अनुसार, आधार अधिनियम की धारा 9 और यूआईडीएआई की 22 अगस्त 2023 की अधिसूचना स्पष्ट करती है कि आधार नागरिकता, पता या जन्मतिथि का प्रमाण नहीं है। इसके बावजूद इसका उपयोग स्कूलों में प्रवेश, संपत्ति खरीद, जन्म प्रमाणपत्र, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसी प्रक्रियाओं में किया जा रहा है। याचिका में दावा किया गया है कि मतदाता पंजीकरण की मौजूदा सत्यापन व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और इससे बिना उचित दस्तावेज वाले लोगों के मतदाता सूची में शामिल होने की आशंका बनी रहती है। चुनावी सत्यापन प्रक्रिया की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज, फोरेंसिक विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने की भी मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड के दुरुपयोग से जुड़ी एक याचिका पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि आधार का इस्तेमाल सिर्फ पहचान सत्यापन के लिए किया जाए, न कि नागरिकता, निवास, अधिवास (डोमिसाइल) या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस वी मोहन की पीठ ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इसे इसी तरह के लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया। याचिका में केंद्र, राज्यों और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की गई है कि आधार को सिर्फ पहचान पत्र माना जाए। इसमें यह भी कहा गया है कि नए मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार करना आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) और संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है। याचिका के अनुसार, आधार अधिनियम की धारा 9 और यूआईडीएआई की 22 अगस्त 2023 की अधिसूचना स्पष्ट करती है कि आधार नागरिकता, पता या जन्मतिथि का प्रमाण नहीं है। इसके बावजूद इसका उपयोग स्कूलों में प्रवेश, संपत्ति खरीद, जन्म प्रमाणपत्र, राशन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसी प्रक्रियाओं में किया जा रहा है। याचिका में दावा किया गया है कि मतदाता पंजीकरण की मौजूदा सत्यापन व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और इससे बिना उचित दस्तावेज वाले लोगों के मतदाता सूची में शामिल होने की आशंका बनी रहती है। चुनावी सत्यापन प्रक्रिया की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज, फोरेंसिक विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने की भी मांग की गई है।
हत्या के आरोप में वित्तीय सहायता पर रोक वैध लेकिन अनुकंपा नियुक्ति पर नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सिविल सेवा (अनुकंपा वित्तीय सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019 के नियम 23(1) की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के मामले में उसका कोई पात्र पारिवारिक सदस्य हत्या या हत्या में सहायता करने के आरोप का सामना कर रहा है तो उसे मिलने वाली अनुकंपा वित्तीय सहायता को आपराधिक कार्यवाही पूरी होने तक रोका जा सकता है। हालांकि यह प्रावधान अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हरियाणा निवासी अतुल चौहान की अपील स्वीकार करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने नियम 23(1) को आधार बनाकर अतुल चौहान की अनुकंपा नियुक्ति की मांग को खारिज कर दिया था। दरअसल, अतुल के पिता गजेंद्र सिंह चौहान हरियाणा में सरकारी शिक्षक थे। 2021 में उनकी संदिग्ध मृत्यु हो गई थी। बाद में उनकी पत्नी पुष्पा देवी पर पति की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा और उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने 2024 में उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, लेकिन इस फैसले के खिलाफ अपील अभी भी लंबित है। राज्य सरकार ने लंबित आपराधिक कार्यवाही का हवाला देते हुए अतुल के अनुकंपा नियुक्ति के दावे को रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम 23(1) की भाषा स्पष्ट है और यह केवल अनुकंपा वित्तीय सहायता से संबंधित है। नियम में कहीं भी अनुकंपा नियुक्ति का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस प्रावधान को नियुक्ति के मामलों पर लागू करना कानून की गलत व्याख्या होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सिविल सेवा (अनुकंपा वित्तीय सहायता या नियुक्ति) नियम, 2019 के नियम 23(1) की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के मामले में उसका कोई पात्र पारिवारिक सदस्य हत्या या हत्या में सहायता करने के आरोप का सामना कर रहा है तो उसे मिलने वाली अनुकंपा वित्तीय सहायता को आपराधिक कार्यवाही पूरी होने तक रोका जा सकता है। हालांकि यह प्रावधान अनुकंपा नियुक्ति पर लागू नहीं होगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हरियाणा निवासी अतुल चौहान की अपील स्वीकार करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने नियम 23(1) को आधार बनाकर अतुल चौहान की अनुकंपा नियुक्ति की मांग को खारिज कर दिया था। दरअसल, अतुल के पिता गजेंद्र सिंह चौहान हरियाणा में सरकारी शिक्षक थे। 2021 में उनकी संदिग्ध मृत्यु हो गई थी। बाद में उनकी पत्नी पुष्पा देवी पर पति की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा और उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने 2024 में उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, लेकिन इस फैसले के खिलाफ अपील अभी भी लंबित है। राज्य सरकार ने लंबित आपराधिक कार्यवाही का हवाला देते हुए अतुल के अनुकंपा नियुक्ति के दावे को रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम 23(1) की भाषा स्पष्ट है और यह केवल अनुकंपा वित्तीय सहायता से संबंधित है। नियम में कहीं भी अनुकंपा नियुक्ति का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस प्रावधान को नियुक्ति के मामलों पर लागू करना कानून की गलत व्याख्या होगी।
गरीबी में जीवन बसर कर रहे दृष्टिबाधित व्यक्ति, मां की भलाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के सुबरनपुर जिले में बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे रहे जन्म से दृष्टिबाधित जापा भुए और उनकी 80 वर्षीय मां राधिका भुए के मामले में स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को उनके लिए सभी सामाजिक सुरक्षा लाभ और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत की मुख्य चिंता जापा भुए और उनकी वृद्ध मां का सम्मानजनक जीवन और आजीविका सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने ओडिशा सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है कि दोनों को कौन-कौन सी सरकारी योजनाओं का लाभ दिया गया है और आगे क्या सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि राधिका भुए को एक आवास इकाई आवंटित की गई है तथा जापा भुए के भाइयों को भी आवास उपलब्ध कराया गया है। यह भी बताया गया कि राधिका भुए को 3500 रुपये प्रतिमाह वृद्धावस्था पेंशन और जापा भुए को 3500 रुपये दिव्यांग पेंशन मिल रही है। साथ ही दोनों को सरकारी योजना के तहत मुफ्त चावल भी दिया जा रहा है। हालांकि कोर्ट ने इन दावों के सत्यापन का निर्देश दिया। पीठ ने राज्य सरकार को अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी के माध्यम से हलफनामा दाखिल कर यह बताने के लिए कहा है कि राधिका भुए और जापा भुए को सभी पात्र सामाजिक सुरक्षा लाभ मिल रहे हैं या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के सुबरनपुर जिले में बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे रहे जन्म से दृष्टिबाधित जापा भुए और उनकी 80 वर्षीय मां राधिका भुए के मामले में स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को उनके लिए सभी सामाजिक सुरक्षा लाभ और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत की मुख्य चिंता जापा भुए और उनकी वृद्ध मां का सम्मानजनक जीवन और आजीविका सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने ओडिशा सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है कि दोनों को कौन-कौन सी सरकारी योजनाओं का लाभ दिया गया है और आगे क्या सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि राधिका भुए को एक आवास इकाई आवंटित की गई है तथा जापा भुए के भाइयों को भी आवास उपलब्ध कराया गया है। यह भी बताया गया कि राधिका भुए को 3500 रुपये प्रतिमाह वृद्धावस्था पेंशन और जापा भुए को 3500 रुपये दिव्यांग पेंशन मिल रही है। साथ ही दोनों को सरकारी योजना के तहत मुफ्त चावल भी दिया जा रहा है। हालांकि कोर्ट ने इन दावों के सत्यापन का निर्देश दिया। पीठ ने राज्य सरकार को अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी के माध्यम से हलफनामा दाखिल कर यह बताने के लिए कहा है कि राधिका भुए और जापा भुए को सभी पात्र सामाजिक सुरक्षा लाभ मिल रहे हैं या नहीं।