SC: अदालत ने कहा- भगवान जगन्नाथ का एनीमेशन बच्चों को और आकर्षित करेगा; एक अन्य याचिका में पैलेट गन बैन की अपील
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एनीमेशन फिल्म महाप्रभु जगन्नाथ पर जताई गई आपत्तियों पर संदेह व्यक्त करते हुए पूछा कि क्या भगवान जगन्नाथ को एनीमेशन प्रारूप में चित्रित करने से श्रद्धालुओं की आस्था किसी भी तरह कम होगी। साथ ही कहा कि ऐसा नहीं होगा, बल्कि एनीमेशन बच्चों को और भी ज्यादा आकर्षित करेगा और उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ेगा। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि वह ओडिशा सरकार के आवेदनों पर 29 जुलाई को सुनवाई करेगी। इनमें पिछले आदेश में संशोधन की मांग की गई है, जिसके तहत जगन्नाथ रथ यात्रा के समापन के बाद फिल्म को रिलीज करने की अनुमति दी गई थी। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की ओर से पेश वकील जनरल पीतांबर आचार्य ने तर्क दिया कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ को एक कार्टून चरित्र के रूप में दर्शाया गया है। पीठ इस तर्क से आश्वस्त नजर नहीं आई और उसने सवाल किया कि क्या इस तरह के चित्रण से श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत या कम हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा नीट पेपर लीक छात्र आंदोलन पर बर्बरता मामला
भारत में मेडिकल की पढ़ाई के लिए एडमिशन लेने से पहले राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाने वाली प्रतियोगी परीक्षा- NEET के पेपर लीक का मुद्दा लगातार सुर्खियों में है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है।नीट पेपर लीक के विरोध में हुए 'संसद चलो' मार्च के दौरान पैलेट गन से घायल हुए लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। एक पूर्व IPS अधिकारी और दो अन्य व्यक्तियों ने सोमवार को यह याचिका दाखिल की। इसमें नागरिक सभाओं को तितर-बितर करने के लिए पैलेट गन के उपयोग पर प्रतिबंध या उन्हें सेवामुक्त करने की मांग की गई है।
पैलेट गन पर प्रतिबंध की अपील
याचिका यशोवर्धन आजाद, प्रशांत कुमार और शेख इरशाद मंसूरी ने अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर के माध्यम से दायर की। प्रशांत कुमार (25) ने बताया कि 20 जुलाई, 2026 को वह 'संसद चलो' मार्च में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी थे। उन्हें रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) कर्मियों की गोलीबारी से पैलेट की चोटें आईं, जबकि उनकी ओर से कोई उकसावा नहीं था। शेख इरशाद मंसूरी (26) ने कहा कि वह दिल्ली के कनॉट प्लेस में थे और उन्हें भी RAF की गोलीबारी से पैलेट की चोटें लगीं। याचिका में कहा गया कि दिल्ली पुलिस ने भीड़ प्रबंधन के लिए CRPF की RAF की सहायता ली। पुलिस और RAF कर्मियों ने आंसू गैस के गोले दागे, लाठीचार्ज किया और प्रदर्शनकारियों को कनॉट प्लेस की ओर धकेला। कोई पानी के तोपों का उपयोग नहीं हुआ, न ही बल प्रयोग की घोषणा की गई। प्रदर्शनकारियों के भागने के दौरान RAF कर्मियों ने अचानक पंप एक्शन गन से गोलीबारी की, जिससे याचिकाकर्ताओं को चोटें आईं।
पैलेट गन के उपयोग पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सभा की स्वतंत्रता का अधिकार सांविधानिक मौलिक अधिकार है। इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(3) के तहत उचित प्रतिबंधों से ही सीमित किया जा सकता है। प्रतिबंधों को आवश्यकता और आनुपातिकता के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में निर्धारित हैं। उनका तर्क है कि प्रोजेक्टाइल एक्शन गन शांतिपूर्ण सभाओं के लिए अनुपयुक्त हैं।
मुआवजे और उपचार की मांग
याचिका में कहा गया कि पैलेट की अप्रत्याशित प्रक्षेपवक्र उन्हें नागरिक सभाओं के लिए खतरनाक उपकरण बनाती है। पैलेट का तंत्र उन्हें भीड़ नियंत्रण के लिए वैध विकल्प होने से अयोग्य ठहराता है। यह 'आवश्यक बल की न्यूनतम मात्रा' के भीतर नहीं आ सकता है। याचिकाकर्ताओं ने पैलेट गन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उन्होंने 20 जुलाई को दिल्ली में पैलेट की चोटों के सभी पीड़ितों के लिए मुआवजे और पूर्ण चिकित्सा उपचार की भी मांग की।
सुप्रीम कोर्ट के गेट पर क्या लगाना है हम देख लेंगे : सीजेआई सूर्यकांत
सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने से इन्कार कर दिया, जिसमें शीर्ष अदालत के गेट पर अशोक चक्र (राष्ट्रीय चिह्न) लगाने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों पर अदालत खुद फैसला करेगी। सीजेआई ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता बदरावाड़ा वेणुगोपाल से कहा कि सुप्रीम कोर्ट के गेट पर क्या लगाना है, हम देख लेंगे। आप दुनिया में इतनी समस्याएं हैं उनका ध्यान रखिए। वेणुगोपाल को बाबा खतरनाक के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने मांग की थी कि कोर्ट परिसर की सांविधानिक पहचान के तहत वहां राष्ट्रीय प्रतीक लगाया जाए। वेणुगोपाल ने इससे पहले संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर कर इस मुद्दे पर निर्देश देने की मांग की थी। 23 मार्च को, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका का निपटारा करते हुए कहा था कि इस मामले की अनिवार्य रूप से प्रशासनिक स्तर पर जांच की आवश्यकता है, और कोर्ट के महासचिव को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष एक उपयुक्त नोट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
केरल से माकपा के राज्यसभा सदस्य एए रहीम ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जंतर-मंतर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से फेशियल रिकग्निशन (चेहरे की पहचान) की तकनीक और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपायों के इस्तेमाल को चुनौती दी गई है। रहीम ने अनुरोध किया कि शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभाओं में बिना किसी भेदभाव के बायोमेट्रिक निगरानी के इस्तेमाल को असंवैधानिक घोषित किया जाए और संसद की ओर से ऐसे उपायों को विशेष रूप से अधिकृत और नियंत्रित करने वाला कानून बनाए जाने तक इस पर रोक लगाई जाए।
1,000 करोड़ का पर्यावरण राहत कोष कठघरे में, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा हिसाब
पर्यावरणीय और औद्योगिक हादसों के पीड़ितों को तत्काल आर्थिक मदद देने के लिए बनाया गया करीब 1,000 करोड़ रुपये का पर्यावरण राहत कोष सवालों के घेरे में आ गया है। वर्ष 2021 तक इसमें 1,000.69 करोड़ रुपये जमा हो चुके थे, लेकिन यह पैसा कहां और कितना खर्च हुआ तथा पीड़ितों तक कितनी राहत पहुंची, इसका स्पष्ट ब्योरा सामने नहीं आने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से पूरा हिसाब मांगा है।
केंद्र और सीपीसीबी से विस्तृत हलफनामा तलब
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने 21 जुलाई को केंद्र और सीपीसीबी को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा है कि कोष में वर्तमान में कितनी रकम है, अब तक कितनी राशि खर्च की गई और इसके इस्तेमाल के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है। सुनवाई के दौरान केंद्र ने अदालत को बताया कि वर्ष 2021 तक पर्यावरण राहत कोष में करीब 1,000.69 करोड़ रुपये जमा थे। इसके बाद कोष में कितनी रकम जमा हुई और वर्तमान में कुल राशि कितनी है, इसका स्पष्ट आंकड़ा अदालत के सामने नहीं रखा जा सका। इसी के साथ कोष के वास्तविक इस्तेमाल को लेकर भी स्थिति साफ नहीं हो सकी।
पीड़ितों को राहत देने का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं
पर्यावरण राहत कोष लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 के तहत बनाया गया है। इसका उद्देश्य खतरनाक पदार्थों से जुड़े औद्योगिक या पर्यावरणीय हादसों के शिकार लोगों को जल्द आर्थिक राहत उपलब्ध कराना है। कोष के संचालन के लिए वर्ष 2008 में पर्यावरण राहत कोष योजना बनाई गई थी।इसके बावजूद अदालत के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इस योजना के तहत जरूरतमंदों और हादसा पीड़ितों को वास्तव में कितनी रकम वितरित की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर सवाल उठाते हुए जानना चाहा है कि सीपीसीबी के पास मौजूद कोष का उसके मूल उद्देश्य के लिए कितना इस्तेमाल हुआ।
पीड़ितों के लिए पैसा, फिर वर्षों से पड़ा क्यों?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमा इतनी बड़ी रकम के इस्तेमाल की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।अदालत की चिंता यह है कि जिस धन को पर्यावरणीय और औद्योगिक दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए जुटाया गया, वह लंबे समय तक निष्क्रिय क्यों पड़ा रहा।
अब बताना होगा,कितना आया, कितना खर्च हुआ
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र और सीपीसीबी को अब कोष की मौजूदा राशि, उसके उपयोग और राहत वितरण का दस्तावेजी हिसाब देना होगा। इससे यह भी साफ होगा कि करीब एक हजार करोड़ रुपए के इस कोष से वास्तविक लाभार्थियों तक कितनी मदद पहुंची। मामला केवल सरकारी धन के हिसाब-किताब का नहीं है, बल्कि उन हादसा पीड़ितों के हक का भी है जिनकी तत्काल सहायता के लिए यह कोष बनाया गया था।