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Supreme Court: दालों के विकल्प पीली मटर का सस्ता आयात रोकने की मांग, कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब
Thu, 25 Sep 2025 10:06 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Thu, 25 Sep 2025 10:06 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें पीली मटर के आयात पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि पीली मटर को दालों का विकल्प माना जाता है और इसका आयात भारत के किसानों की आजीविका को नुकसान पहुंचा रहा है, खासकर उन किसानों को जो दालें उगाते हैं।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने किसान महापंचायत की ओर से दायर याचिका पर यह नोटिस जारी किया। साथ ही किसानों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहाकि यह जांच करने की जरूरत है कि क्या देश में दालों का पर्याप्त उत्पादन हो रहा है या नहीं।
बेंच ने कहा, हम नोटिस जारी करने के लिए तैयार हैं। लेकिन इसका परिणाम यह नहीं होना चाहिए कि आम उपभोक्ताओं को नुकसान हो। भूषण ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि पीली मटर का सस्ता आयात (करीब 35 रुपये प्रति किलोग्राम) उन किसानों को नुकसान पहुंचा रहा है, जो तूर, मूंग और उड़द जैसी दालें उगाते हैं। इन दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 85 रुपये प्रति किलोग्राम है।
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उन्होंने कहा कि कई विशेषज्ञ संस्थाएं पहले ही सलाह दे चुकी हैं कि पीली मटर का आयात बंद किया जाए, क्योंकि यह भारत के किसानों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को चाहिए कि वह दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे, न कि सस्ते में पीली मटर का आयात करे।
प्रशांत भूषण ने बताया कि कृषि मंत्रालय और नीति आयोग दोनों ने पीली मटर के आयात के खिलाफ राय दी है। इस पर बेंच ने भूषण से पूछा, आप पीली मटर का आयात बंद करवा देते हैं और बाजार में कमी हो जाती है तो क्या होगा? हमें यह स्थिति नहीं बनने देनी है। आपने कहा कि कुछ देशों में पीली मटर पशु चारे के रूप में इस्तेमाल होती है। क्या आपने इसके स्वास्थ्य पर असर की जांच की है? इस पर भूषण ने जवाब दिया कि पीली मटर का सेवन करने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और यह एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। उन्होंने यह भी कहा, किसानों की बड़ी संख्या में मौत हो रही है और वे आत्महत्या कर रहे हैं।
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जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने किसान महापंचायत की ओर से दायर याचिका पर यह नोटिस जारी किया। साथ ही किसानों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहाकि यह जांच करने की जरूरत है कि क्या देश में दालों का पर्याप्त उत्पादन हो रहा है या नहीं।
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बेंच ने कहा, हम नोटिस जारी करने के लिए तैयार हैं। लेकिन इसका परिणाम यह नहीं होना चाहिए कि आम उपभोक्ताओं को नुकसान हो। भूषण ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि पीली मटर का सस्ता आयात (करीब 35 रुपये प्रति किलोग्राम) उन किसानों को नुकसान पहुंचा रहा है, जो तूर, मूंग और उड़द जैसी दालें उगाते हैं। इन दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 85 रुपये प्रति किलोग्राम है।
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उन्होंने कहा कि कई विशेषज्ञ संस्थाएं पहले ही सलाह दे चुकी हैं कि पीली मटर का आयात बंद किया जाए, क्योंकि यह भारत के किसानों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को चाहिए कि वह दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे, न कि सस्ते में पीली मटर का आयात करे।
प्रशांत भूषण ने बताया कि कृषि मंत्रालय और नीति आयोग दोनों ने पीली मटर के आयात के खिलाफ राय दी है। इस पर बेंच ने भूषण से पूछा, आप पीली मटर का आयात बंद करवा देते हैं और बाजार में कमी हो जाती है तो क्या होगा? हमें यह स्थिति नहीं बनने देनी है। आपने कहा कि कुछ देशों में पीली मटर पशु चारे के रूप में इस्तेमाल होती है। क्या आपने इसके स्वास्थ्य पर असर की जांच की है? इस पर भूषण ने जवाब दिया कि पीली मटर का सेवन करने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और यह एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। उन्होंने यह भी कहा, किसानों की बड़ी संख्या में मौत हो रही है और वे आत्महत्या कर रहे हैं।
1984 सिख विरोधी दंगे: सज्जन कुमार की याचिका पर दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार की उस याचिका पर दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई करेगा, जिसमें उन्होंने 1984 सिख विरोधी दंगा मामले में अपनी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियां 20 अक्तूबर से शुरू होंगी और 27 अक्तूबर को फिर से कामकाज शुरू होगा।
जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। उन्होंने दोनों पक्षों के वकीलों से कहा कि वे इस केस में लगे आरोपों, गवाहों की गवाही, और ट्रायल कोर्ट व हाई कोर्ट के फैसलों की विस्तृत जानकारी पेश करें। बेंच ने कहा, जब हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटा, तो इसके पीछे उसकी क्या सोच रही? दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2010 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सज्जन कुमार को बरी किए जाने के फैसले को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सीबीआई की तरफ से वरिष्ठ वकील आर एस चीमा और सज्जन कुमार की तरफ से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन पेश हुए। सिर्फ सज्जन कुमार ही नहीं, बल्कि इस मामले में सजायाफ्ता बलवान खोखर और गिरधारी लाल की याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थीं।
यह मामला 1-2 नवंबर 1984 को दिल्ली कैंट के राज नगर पार्ट-1 इलाके में पांच सिखों की हत्या और राज नगर पार्ट-2 में एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़ा है। सिख विरोधी दंगे 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद भड़के थे। हाईकोर्ट के फैसले के बाद सज्जन कुमार ने 31 दिसंबर 2018 को दिल्ली की ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था और उम्रकैद की सजा भुगतनी शुरू की। उसी साल 17 दिसंबर को हाईकोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद सज्जन कुमार ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि वह कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार की उस याचिका पर दिवाली की छुट्टियों के बाद सुनवाई करेगा, जिसमें उन्होंने 1984 सिख विरोधी दंगा मामले में अपनी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियां 20 अक्तूबर से शुरू होंगी और 27 अक्तूबर को फिर से कामकाज शुरू होगा।
जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। उन्होंने दोनों पक्षों के वकीलों से कहा कि वे इस केस में लगे आरोपों, गवाहों की गवाही, और ट्रायल कोर्ट व हाई कोर्ट के फैसलों की विस्तृत जानकारी पेश करें। बेंच ने कहा, जब हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटा, तो इसके पीछे उसकी क्या सोच रही? दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2010 में ट्रायल कोर्ट द्वारा सज्जन कुमार को बरी किए जाने के फैसले को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सीबीआई की तरफ से वरिष्ठ वकील आर एस चीमा और सज्जन कुमार की तरफ से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन पेश हुए। सिर्फ सज्जन कुमार ही नहीं, बल्कि इस मामले में सजायाफ्ता बलवान खोखर और गिरधारी लाल की याचिकाएं भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थीं।
यह मामला 1-2 नवंबर 1984 को दिल्ली कैंट के राज नगर पार्ट-1 इलाके में पांच सिखों की हत्या और राज नगर पार्ट-2 में एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़ा है। सिख विरोधी दंगे 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद भड़के थे। हाईकोर्ट के फैसले के बाद सज्जन कुमार ने 31 दिसंबर 2018 को दिल्ली की ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था और उम्रकैद की सजा भुगतनी शुरू की। उसी साल 17 दिसंबर को हाईकोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद सज्जन कुमार ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने युवक को 80 वर्षीय पिता को संपत्ति सौंपने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने 80 वर्षीय बुजुर्ग को राहत देते हुए उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें बेटे को संपत्ति खाली करने के निर्देश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत भरण-पोषण न्यायाधिकरण को बुजुर्गों के भरण-पोषण के दायित्व के उल्लंघन के मामले में किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से बच्चे या रिश्तेदार को बेदखल करने का आदेश देने का अधिकार है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पिता की याचिका पर यह आदेश पारित किया। इसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के अप्रैल में पारित आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें न्यायाधिकरण के उस आदेश को खारिज कर दिया गया था, जिसमें बेटे को दो संपत्तियों का कब्जा पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था।
पीठ ने कहा कि एक कल्याणकारी कानून होने के नाते इसके प्रावधानों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए ताकि इसके लाभकारी उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा सके। न्यायाधिकरण को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से किसी बच्चे या रिश्तेदार को बेदखल करने का आदेश देने का पूरा अधिकार है, जब वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण के दायित्व का उल्लंघन होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 80 वर्षीय बुजुर्ग को राहत देते हुए उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें बेटे को संपत्ति खाली करने के निर्देश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत भरण-पोषण न्यायाधिकरण को बुजुर्गों के भरण-पोषण के दायित्व के उल्लंघन के मामले में किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से बच्चे या रिश्तेदार को बेदखल करने का आदेश देने का अधिकार है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने पिता की याचिका पर यह आदेश पारित किया। इसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के अप्रैल में पारित आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें न्यायाधिकरण के उस आदेश को खारिज कर दिया गया था, जिसमें बेटे को दो संपत्तियों का कब्जा पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था।
पीठ ने कहा कि एक कल्याणकारी कानून होने के नाते इसके प्रावधानों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए ताकि इसके लाभकारी उद्देश्य को आगे बढ़ाया जा सके। न्यायाधिकरण को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से किसी बच्चे या रिश्तेदार को बेदखल करने का आदेश देने का पूरा अधिकार है, जब वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण के दायित्व का उल्लंघन होता है।
2013 बम विस्फोट मामले में मौत की सजा पाए दोषी की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इंडियन मुजाहिदीन के एक कथित आतंकी की फांसी पर रोक लगा दी। उसे 2013 के दिलसुखनगर विस्फोटों के सिलसिले में मौत की सजा सुनाई गई थी। इन विस्फोटों में 18 लोग मारे गए थे और 131 घायल हुए थे। दोषी असदुल्ला अख्तर की याचिका पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने कहा, "अपीलकर्ता की मौत की सजा पर रोक रहेगी।" सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह अख्तर से संबंधित सभी परिवीक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट आठ सप्ताह के भीतर पेश करे। संबंधित जेल के अधीक्षक को आठ सप्ताह की अवधि के भीतर अपीलकर्ता द्वारा जेल में किए गए कार्य की प्रकृति और जेल में रहने के दौरान अपीलकर्ता के आचरण और व्यवहार के संबंध में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। पीठ ने जेल अधिकारी को अख्तर का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन सरकारी अस्पताल से कराने का निर्देश दिया तथा अपील की सुनवाई 12 सप्ताह बाद करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इंडियन मुजाहिदीन के एक कथित आतंकी की फांसी पर रोक लगा दी। उसे 2013 के दिलसुखनगर विस्फोटों के सिलसिले में मौत की सजा सुनाई गई थी। इन विस्फोटों में 18 लोग मारे गए थे और 131 घायल हुए थे। दोषी असदुल्ला अख्तर की याचिका पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने कहा, "अपीलकर्ता की मौत की सजा पर रोक रहेगी।" सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह अख्तर से संबंधित सभी परिवीक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट आठ सप्ताह के भीतर पेश करे। संबंधित जेल के अधीक्षक को आठ सप्ताह की अवधि के भीतर अपीलकर्ता द्वारा जेल में किए गए कार्य की प्रकृति और जेल में रहने के दौरान अपीलकर्ता के आचरण और व्यवहार के संबंध में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। पीठ ने जेल अधिकारी को अख्तर का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन सरकारी अस्पताल से कराने का निर्देश दिया तथा अपील की सुनवाई 12 सप्ताह बाद करने को कहा।
वस्तु अपने राज्य की हो या कहीं और बनी हो, भेदभाव नहीं कर सकते" सुप्रीम कोर्ट
(राजीव सिन्हा)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य अपने क्षेत्र में निर्मित वस्तुओं और बिक्री के लिए अन्य राज्यों से लाए गए सामानों के बीच भेदभाव नहीं कर सकते। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने राजस्थान सरकार की 2007 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया जिसमें स्थानीय एस्बेस्टस शीट निर्माताओं को वैट में छूट दी गई थी जबकि राजस्थान के बाहर से आयातित शीट पर पूर्ण वैट लगाया गया था।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस अधिसूचना को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक माना क्योंकि इसने अंतर-राज्यीय व्यापार के विरुद्ध राजकोषीय बाधा उत्पन्न की। पीठ ने कहा, अनुच्छेद 301 द्वारा गारंटीकृत भारत के पूरे क्षेत्र में मुक्त व्यापार, वाणिज्य और अंतर्संबंध के हित में कर बाधाएं या राजकोषीय बाधाएं नहीं हो सकतीं। इस प्रकार, कराधान के हथियार का उपयोग आयातित वस्तुओं और स्थानीय रूप से निर्मित वस्तुओं के बीच भेदभाव करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा, कर का बोझ समान रूप से पड़ता है या नहीं, यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका निर्धारण हर मामले में तब किया जाएगा जब प्रश्न उठेगा।
बाहरी निर्माताओं ने राजस्थान सरकार की अधिसूचना को बताया भेदभावपूर्ण : 9 मार्च, 2007 की राजस्थान सरकार की अधिसूचना में राज्य के भीतर निर्मित एस्बेस्टस सीमेंट शीट और ईंटों की बिक्री को वैट से छूट दी गई थी, बशर्ते उनमें भार के हिसाब से 25 फीसदी या उससे अधिक फ्लाई ऐश हो। राजस्थान के बाहर स्थित निर्माताओं ने सरकार की अधिसूचना को यह तर्क देते हुए चुनौती दी कि उनके समान उत्पाद राजस्थान में बेचे जाने पर पूर्ण वैट के अधीन थे।
(राजीव सिन्हा)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य अपने क्षेत्र में निर्मित वस्तुओं और बिक्री के लिए अन्य राज्यों से लाए गए सामानों के बीच भेदभाव नहीं कर सकते। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने राजस्थान सरकार की 2007 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया जिसमें स्थानीय एस्बेस्टस शीट निर्माताओं को वैट में छूट दी गई थी जबकि राजस्थान के बाहर से आयातित शीट पर पूर्ण वैट लगाया गया था।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस अधिसूचना को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक माना क्योंकि इसने अंतर-राज्यीय व्यापार के विरुद्ध राजकोषीय बाधा उत्पन्न की। पीठ ने कहा, अनुच्छेद 301 द्वारा गारंटीकृत भारत के पूरे क्षेत्र में मुक्त व्यापार, वाणिज्य और अंतर्संबंध के हित में कर बाधाएं या राजकोषीय बाधाएं नहीं हो सकतीं। इस प्रकार, कराधान के हथियार का उपयोग आयातित वस्तुओं और स्थानीय रूप से निर्मित वस्तुओं के बीच भेदभाव करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा, कर का बोझ समान रूप से पड़ता है या नहीं, यह एक तथ्यात्मक प्रश्न है जिसका निर्धारण हर मामले में तब किया जाएगा जब प्रश्न उठेगा।
बाहरी निर्माताओं ने राजस्थान सरकार की अधिसूचना को बताया भेदभावपूर्ण : 9 मार्च, 2007 की राजस्थान सरकार की अधिसूचना में राज्य के भीतर निर्मित एस्बेस्टस सीमेंट शीट और ईंटों की बिक्री को वैट से छूट दी गई थी, बशर्ते उनमें भार के हिसाब से 25 फीसदी या उससे अधिक फ्लाई ऐश हो। राजस्थान के बाहर स्थित निर्माताओं ने सरकार की अधिसूचना को यह तर्क देते हुए चुनौती दी कि उनके समान उत्पाद राजस्थान में बेचे जाने पर पूर्ण वैट के अधीन थे।