फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Supreme Court Updates NIA court to dispose of case within 6 months dismisses plea to ban non-biodegradable

SC Updates: सुप्रीम कोर्ट- NIA कोर्ट 6 माह में केस निपटाएं; नॉन-बायोडिग्रेडेबल वकील बैंड प्रतिबंध याचिका खारिज

Wed, 19 Nov 2025 07:42 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Wed, 19 Nov 2025 07:42 AM IST
विज्ञापन
Supreme Court Updates NIA court to dispose of case within 6 months dismisses plea to ban non-biodegradable
सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार आवश्यक न्यायिक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराएगी। साथ ही सुनिश्चित करेगी कि एनआईए अदालतें दिन रात काम कर राष्ट्र विरोधी अपराध करने वालों के खिलाफ मुकदमे छह महीने में खत्म करें। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दुर्दांत अपराधियों के मुकदमे शीघ्र खत्म किए जाने की वकालत करते हुए कहा कि यदि मुकदमा छह महीने में पूरा हो जाता है, तो आरोपी को लंबी सुनवाई के आधार पर जमानत नहीं मिल पाएगी। पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी से कहा, आप बस आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार करें और मुकदमा शीघ्र पूरा हो, ताकि राष्ट्र के विरुद्ध अपराध करने वालों या जघन्य अपराधों में शामिल लोगों को जमानत न मिले। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि अदालतें छह महीने में मुकदमा पूरा करने के लिए दिन-रात काम करें। एएसजी ने दलील दी कि केंद्रीय गृह सचिव इस मामले से अवगत हैं और विशेष एनआईए अदालतों और विशेष कानूनों के लिए समर्पित अन्य अदालतों की स्थापना के मुद्दे पर विभिन्न राज्य सरकारों के साथ बैठक की गई है।

विज्ञापन

तो क्या अब हमें रूमालों के इस्तेमाल पर भी नजर रखनी चाहिए: शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की सभी अदालतों में वकीलों के लिए नॉन बायोडिग्रेडेबल वकील बैंड पर प्रतिबंध की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। सीजेआई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि तो क्या अब हमें रूमालों के इस्तेमाल पर भी नजर रखनी चाहिए? वकील बैंड को वकील टाई की जगह पहनते हैं। याचिकाकर्ता साक्षी विजय एक वकील की पत्नी है। उन्होंने इस्तेमाल किए गए वकील बैंड के संग्रह, पृथक्करण, निपटान और रीसाइक्लिंग के लिए एक समान और पर्यावरण के अनुकूल प्रणाली की मांग की। साक्षी ने कहा, दिवाली की सफाई के दौरान मुझे कई बेकार पड़े वकीलों के बैंड मिले। ये नॉन बायोडिग्रेडेबल सामग्री से बने थे।

साक्षी ने पीठ को बताया कि ऐसे कपड़े के बैंडों के लगातार इस्तेमाल से पर्यावरणीय अपशिष्ट बढ़ता है और इसके लिए नियमन की आवश्यकता है। उन्होंने पीठ से आग्रह किया कि वह हस्तक्षेप करे और पर्यावरणीय आधार पर इन कपड़े के सामानों को नियंत्रित करे। साक्षी विजय जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। इस पर सीजेआई ने कहा, आखिर हमारा काम क्या-क्या है। ब्यूरो

विज्ञापन
विज्ञापन

16 राज्य बार काउंसिलों में चुनावों की निगरानी के लिए पैनल गठित
सुप्रीम कोर्ट ने 16 राज्य बार काउंसिलों के चुनावों की निगरानी के लिए एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त पर्यवेक्षी समिति का गठन किया। अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने राज्य बार काउंसिलों के चुनाव कई चरणों में कराने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि प्रत्येक बार निकाय में 31 मार्च, 2026 तक एक नया निर्वाचित निकाय होना चाहिए। पीठ ने कहा कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति की अध्यक्षता शीर्ष न्यायालय के सेवानिवृत्त जज करेंगे। इसमें हाईकोर्ट के एक पूर्व चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल होंगे, जो बार निकाय चुनाव लड़ते हैं।

यूपी और तेलंगाना में 31 जनवरी को मतदान : पीठ ने उत्तर प्रदेश और तेलंगाना जैसी कुछ राज्य बार काउंसिलों के नाम लिए, जहां 31 जनवरी को मतदान होगा। इसी तरह, आंध्र प्रदेश, दिल्ली और त्रिपुरा जैसी अन्य बार काउंसिलों में फरवरी में दूसरे चरण में चुनाव होंगे। तीसरे और चौथे चरण के मतदान के लिए अन्य बार काउंसिलों के नाम भी घोषित किए गए।

विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायिक सेवा में प्रमोटी जजों को कोटा देने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उच्च न्यायिक सेवा में प्रमोटी जजों के लिए अलग कोटा देने की मांग को खारिज कर दिया। संविधान पीठ ने कहा कि न्यायिक सेवा में असंतुलित प्रतिनिधित्व जैसी कोई समान समस्या देशभर में नहीं पाई जाती है, इसलिए कृत्रिम वर्गीकरण बनाकर किसी समूह को विशेष लाभ नहीं दिया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की जगह इस मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ का नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने किया। पीठ ने कहा कि चयन ग्रेड और सुपर टाइम स्केल में पदस्थापन पूरी तरह मेरिट-कम-सीनियरिटी पर आधारित है और इसे निचली न्यायपालिका में कार्यकाल या प्रदर्शन से जोड़ना न्यायिक प्रशासन के लिए उपयुक्त नहीं होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल “असंतोष” या “कैरियर ठहराव” किसी नए कोटे का आधार नहीं बन सकता।

पीठ ने देशभर के जिला न्यायाधीशों की वरिष्ठता तय करने के लिए नया चार-बिंदु वार्षिक रोस्टर भी जारी किया, जिसके अनुसार दो नियमित प्रमोटी (RP), एक सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा से चयनित अधिकारी और एक डायरेक्ट रिक्रूट के क्रम में पद भरे जाएंगे। अदालत ने कहा कि अगर किसी वर्ष की भर्ती प्रक्रिया देरी से पूरी होती है, तो उस साल के रोस्टर के अनुसार ही वरिष्ठता दी जाएगी, बशर्ते कि अगले वर्ष की भर्ती में किसी भी श्रेणी से नियुक्तियां शुरू न हुई हों। यह मुद्दा 1989 की ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन की याचिका से उठा था, जिसके बाद 7 अक्तूबर को कैरियर प्रगति से जुड़े प्रश्नों को संविधान पीठ के पास भेजा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केंद्रीकृत निगरानी से ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ सफल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की सफलता का प्रमुख कारण केंद्रीकृत निगरानी प्रणाली है। पीठ ने यह टिप्पणी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें बताया गया कि राजस्थान और गुजरात में इनके तेजी से घटते संख्या का मुख्य कारण बिजली की ओवरहेड लाइनों से टकराव है। ASG ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि ‘प्रोजेक्ट GIB’ के तहत वर्तमान में 68 चूजे कैद में संरक्षित हैं। पीठ ने जानकारी ली कि GIB संरक्षण के लिए टाइगर अथॉरिटी जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। अदालत ने पिछले वर्ष गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि इन पक्षियों को तत्काल सुरक्षा की जरूरत है। समिति ने दोनों राज्यों में प्राथमिक और संभावित आवास क्षेत्रों में बिजली लाइनों को भूमिगत करने की सिफारिश की थी। अदालत ने पक्षकारों से एक सप्ताह में लिखित जवाब दाखिल करने को कहा।

न्यायपालिका की आलोचना बुरी नहीं, पर बेबुनियाद आरोप नहीं होने चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन इसमें किसी तरह के स्वीपिंग एलीगेशंस नहीं होने चाहिए। यह टिप्पणी उस मामले में की गई जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप शर्मा ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जजों पर गंभीर आरोप लगाए थे। अदालत ने बताया कि शर्मा ने हाईकोर्ट में बिना शर्त माफी दी, जिसे स्वीकार कर उन्हें अवमानना से मुक्त कर दिया गया। पीठ ने यह भी दर्ज किया कि हाईकोर्ट ने प्रदीप शर्मा को पेड़ लगाने का निर्देश दिया था, और उनकी माफी को “उदारता” से स्वीकार किया। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि चूंकि उन्होंने भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का आश्वासन दिया है, इसलिए मामला समाप्त किया जाता है। अदालत ने साफ किया कि आलोचना जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए और संस्थाओं पर बेबुनियाद आरोप न्याय प्रणाली को प्रभावित करते हैं।

महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनाव: नामांकन प्रक्रिया टालने पर विचार करें, सुप्रीम कोर्ट का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को सुझाव दिया कि स्थानीय निकाय चुनावों की नामांकन प्रक्रिया तब तक टालने पर विचार किया जाए, जब तक ओबीसी आरक्षण से जुड़े 27% कोटे का मुद्दा तय नहीं हो जाता। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसके बाद अदालत ने मामले को 25 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नामांकन जारी रहने से चुनाव प्रक्रिया अपरिवर्तनीय हो जाएगी। अदालत ने 17 नवंबर के अपने आदेश की याद दिलाई, जिसमें कहा गया था कि राज्य 50% से अधिक आरक्षण नहीं दे सकता और यदि सीमा पार हुई तो चुनाव रोके जा सकते हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव केवल 2022 से पहले की स्थिति के अनुसार ही कराए जा सकते हैं, क्योंकि कई स्थानीय निकायों में आरक्षण 70% तक पहुंच गया है।

आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले को दिल्ली या कोलकाता हाईकोर्ट भेजने पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को संकेत दिया कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के मामले को दिल्ली हाईकोर्ट या कोलकाता हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जा सकता है। यह वही मामला है जिसका शीर्ष अदालत ने 2024 में स्वत: संज्ञान लिया था। जस्टिस एम एम सुंदरश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई टुकड़ों में नहीं हो सकती, जबकि इससे जुड़े कई प्रकरण पहले से ही कोलकाता हाईकोर्ट में लंबित हैं। अदालत ने एसोसिएशन ऑफ जूनियर एंड सीनियर डॉक्टर्स की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नुंदी से कहा कि वे हाईकोर्ट में लंबित मामलों का विस्तृत ब्योरा तालिका के रूप में कोर्ट को सौंपें।

सुनवाई के दौरान नुंदी ने तर्क दिया कि विरोध कर रहे डॉक्टरों को पुलिस लगातार पूछताछ के लिए बुला रही है, जिससे उत्पीड़न की स्थिति बन रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से डॉक्टरों को सुरक्षा देने के निर्देश जारी करने की मांग की। इस पर पीठ ने कहा कि वह डॉक्टरों को समग्र संरक्षण देने का आदेश नहीं दे सकती, क्योंकि पुलिस को पूछताछ का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि कोलकाता में चल रहे विरोध प्रदर्शनों की निगरानी वहीं की हाईकोर्ट बेहतर तरीके से कर सकती है और दिल्ली में बैठकर सुप्रीम कोर्ट के लिए यह संभव नहीं है। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई शीतकालीन अवकाश के बाद तय की है। उल्लेखनीय है कि 9 अगस्त 2024 को अस्पताल के सेमिनार कक्ष में पीड़िता का शव मिला था और अगले दिन पुलिस ने एक नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवक, संजय रॉय को गिरफ्तार किया था।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed