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Supreme Court: मुल्लापेरियार बांध विवाद पर पर्यवेक्षी समिति राज्य के मुद्दे सुलझाए; पढ़ें अदालत की बड़ी खबरें
Thu, 20 Feb 2025 07:14 AM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 20 Feb 2025 07:14 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने मुल्लापेरियार बांध की सुरक्षा की निगरानी कर रहे नवगठित पैनल से तमिलनाडु सरकार के उठाए गए मरम्मत और रखरखाव के मुद्दों की जांच करने और रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि केंद्र की ओर से 3 जनवरी को पुनर्गठित समिति के अध्यक्ष एक सप्ताह में तमिलनाडु और केरल के अधिकारियों की बैठक बुलाएंगे और तमिलनाडु के उठाए गए मुद्दों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास करेंगे। पीठ ने कहा कि यदि पेड़ों की कटाई, बांध की मरम्मत, पहुंच मार्ग के निर्माण के लिए मंजूरी सहित अन्य मुद्दों का सौहार्दपूर्ण ढंग से समाधान नहीं किया गया तो सुप्रीम कोर्ट इस पर निर्णय लेगा। पीठ ने कहा, हमें ऐसा लगता है कि 3 जनवरी 2025 को एक नई पर्यवेक्षी समिति और उसके अध्यक्ष की नियुक्ति कर दी गई है। इसे तमिलनाडु की ओर से की गई प्रार्थनाओं पर गौर करना चाहिए और ऐसे समाधान खोजने चाहिए जो दोनों पक्षों के स्वीकार किए जाएं। हालांकि, किसी भी विवाद के संबंध में किसी भी विवाद की स्थिति में समिति को निर्देश दिया जाता है कि वह इस अदालत में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे ताकि छूटे हुए मुद्दों पर निर्णय लिया जा सके। शीर्ष अदालत ने चार हफ्ते के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। पीठ ने यह भी कहा कि कुछ मुद्दे बहुत बचकाने हैं और इन्हें दोनों राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता है।
क्या अदालतें कर सकती हैं मध्यस्थता फैसलों में संशोधन? शीर्ष अदालत में सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या अदालतें मध्यस्थता और सुलह पर 1996 के कानून के प्रावधानों के तहत मध्यस्थता फैसलों में संशोधन कर सकती हैं। सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस संजय कुमार, जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एजी मसीह की संविधान पीठ ने तीन दिनों तक चली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अरविंद दातार, डेरियस खंबाटा, शेखर नापाहड़े और रितिन राय समेत कई वरिष्ठ वकीलों के पक्ष को सुना। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 13 फरवरी को केंद्र की ओर से दलीलें शुरू करते हुए पीठ से आग्रह किया कि राष्ट्र की उभरती हुई मध्यस्थता आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए फैसलों में संशोधन का मुद्दा विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए। हालांकि, वकील दातार ने कहा कि अदालतें, जो कुछ आधारों पर मध्यस्थता फैसलों को रद्द कर सकती हैं, उन्हें संशोधित भी कर सकती हैं। वकील शेखर नपहाड़े ने दातार से सहमति जताते हुए कहा कि अदालतों के पास मध्यस्थता फैसलों को संशोधित करने का अधिकार होना चाहिए। 23 जनवरी को सीजेेआई की तीन सदस्यीय पीठ ने इस विवादास्पद मुद्दे को एक बड़ी पीठ को सौंपा था।
क्रिप्टो करंसी घोटाला: छह महीने में 35 लाख रुपये जमा करने की शर्त पर आरोपी को सुप्रीम जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में क्रिप्टो करंसी घोटाले के एक आरोपी को जमानत दे दी। शीर्ष अदालत ने आरोपी को छह महीने के भीतर 35 लाख रुपये जमानत राशि जमा करने की शर्त पर राहत दी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा, मामले की सुनवाई में लंबा समय लगेगा। याचिकाकर्ता पर आर्थिक अपराध का आरोप है जिसमें करीब 2,000 निवेशकों ने अपना पैसा गंवाया। हमें पूरा विश्वास है कि अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए, बशर्ते कि ट्रायल कोर्ट कुछ नियम और शर्तें लगाए। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के वकील के अनुसार घोटाला कुल 4 करोड़ रुपये का था और उसके मुवक्किल को 35 लाख रुपये मिले। पीठ ने आरोपी की जमानत में छह महीने के भीतर 35 लाख रुपये की जमानत राशि जमा करने की शर्त लगाई। पीठ ने मामले की प्रकृति को देखते हुए ऐसी शर्त लगाने के लिए खुद को मजबूर बताया। साथ ही कहा, हम मानते हैं कि जब हाईकोर्ट ऐसी शर्तें लगाते हैं तो हम उनकी निंदा करते हैं। हालांकि अदालत ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित छह महीने के भीतर राशि जमा नहीं की जाती है, तो जमानत स्वत: रद्द हो जाएगी।
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क्या अदालतें कर सकती हैं मध्यस्थता फैसलों में संशोधन? शीर्ष अदालत में सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या अदालतें मध्यस्थता और सुलह पर 1996 के कानून के प्रावधानों के तहत मध्यस्थता फैसलों में संशोधन कर सकती हैं। सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस संजय कुमार, जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एजी मसीह की संविधान पीठ ने तीन दिनों तक चली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अरविंद दातार, डेरियस खंबाटा, शेखर नापाहड़े और रितिन राय समेत कई वरिष्ठ वकीलों के पक्ष को सुना। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 13 फरवरी को केंद्र की ओर से दलीलें शुरू करते हुए पीठ से आग्रह किया कि राष्ट्र की उभरती हुई मध्यस्थता आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए फैसलों में संशोधन का मुद्दा विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए। हालांकि, वकील दातार ने कहा कि अदालतें, जो कुछ आधारों पर मध्यस्थता फैसलों को रद्द कर सकती हैं, उन्हें संशोधित भी कर सकती हैं। वकील शेखर नपहाड़े ने दातार से सहमति जताते हुए कहा कि अदालतों के पास मध्यस्थता फैसलों को संशोधित करने का अधिकार होना चाहिए। 23 जनवरी को सीजेेआई की तीन सदस्यीय पीठ ने इस विवादास्पद मुद्दे को एक बड़ी पीठ को सौंपा था।
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क्रिप्टो करंसी घोटाला: छह महीने में 35 लाख रुपये जमा करने की शर्त पर आरोपी को सुप्रीम जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में क्रिप्टो करंसी घोटाले के एक आरोपी को जमानत दे दी। शीर्ष अदालत ने आरोपी को छह महीने के भीतर 35 लाख रुपये जमानत राशि जमा करने की शर्त पर राहत दी है। जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा, मामले की सुनवाई में लंबा समय लगेगा। याचिकाकर्ता पर आर्थिक अपराध का आरोप है जिसमें करीब 2,000 निवेशकों ने अपना पैसा गंवाया। हमें पूरा विश्वास है कि अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए, बशर्ते कि ट्रायल कोर्ट कुछ नियम और शर्तें लगाए। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के वकील के अनुसार घोटाला कुल 4 करोड़ रुपये का था और उसके मुवक्किल को 35 लाख रुपये मिले। पीठ ने आरोपी की जमानत में छह महीने के भीतर 35 लाख रुपये की जमानत राशि जमा करने की शर्त लगाई। पीठ ने मामले की प्रकृति को देखते हुए ऐसी शर्त लगाने के लिए खुद को मजबूर बताया। साथ ही कहा, हम मानते हैं कि जब हाईकोर्ट ऐसी शर्तें लगाते हैं तो हम उनकी निंदा करते हैं। हालांकि अदालत ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित छह महीने के भीतर राशि जमा नहीं की जाती है, तो जमानत स्वत: रद्द हो जाएगी।
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सुनवाई में देरी...दो नक्सली समर्थकों को दी जमानत
जघन्य अपराधों में लंबी सुनवाई पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को दो नक्सली समर्थकों को जमानत दे दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि अनिश्चित काल तक कारावास संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। शीर्ष कोर्ट की दो अलग-अलग पीठों ने गैर कानूनी रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार कथित दो नक्सली समर्थकों को सुनवाई में देरी को आधार मानते हुए राहत दे दी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि केंद्र को माओवादियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, ताकि सुनवाई में तेजी लाई जा सके। पीठ ने इस बात पर नाराजगी जताई कि निंग खाम शंगतम की गिरफ्तारी के छह साल बाद भी 98 में से केवल 59 गवाहों से ही पूछताछ की गई है।
जघन्य अपराधों में लंबी सुनवाई पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को दो नक्सली समर्थकों को जमानत दे दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि अनिश्चित काल तक कारावास संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। शीर्ष कोर्ट की दो अलग-अलग पीठों ने गैर कानूनी रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार कथित दो नक्सली समर्थकों को सुनवाई में देरी को आधार मानते हुए राहत दे दी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि केंद्र को माओवादियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, ताकि सुनवाई में तेजी लाई जा सके। पीठ ने इस बात पर नाराजगी जताई कि निंग खाम शंगतम की गिरफ्तारी के छह साल बाद भी 98 में से केवल 59 गवाहों से ही पूछताछ की गई है।