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SC Updates: अगस्ता वेस्टलैंड केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, क्रिश्चियन की रिहाई याचिका दूसरी बेंच को सौंपी

Fri, 24 Apr 2026 12:10 PM IST
Riya Dubey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Riya Dubey Updated Fri, 24 Apr 2026 12:10 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने ने अगस्टावेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाला मामले में आरोपी क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की रिहाई याचिका दूसरी बेंच को भेज दी है। मिशेल ने जेल से रिहाई और प्रत्यर्पण संधि के कुछ प्रावधानों को चुनौती देते हुए राहत मांगी है। आइए, सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों को इस रिपोर्ट में जानेंगे। 

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Supreme Court Updates AgustaWestland case, Christians release petition referred to another bench
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 3,600 करोड़ रुपये के अगस्टावेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाला मामले में कथित बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की रिहाई याचिका दूसरी पीठ को भेज दी। अदालत ने कहा कि इस मामले से जुड़ी पिछली याचिकाओं की सुनवाई पहले जस्टिस विक्रम नाथ की अगुवाई वाली पीठ कर चुकी है, इसलिए मौजूदा याचिका भी उसी पीठ के समक्ष रखी जाए।
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मिशेल ने अपनी याचिका में भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 17 को चुनौती दी है। उनका कहना है कि प्रत्यर्पित व्यक्ति पर केवल उन्हीं आरोपों में मुकदमा चलाया जा सकता है, जिनके लिए प्रत्यर्पण हुआ था, न कि उससे जुड़े अन्य मामलों में। उन्होंने यह भी दावा किया कि 4 दिसंबर 2025 को जेल में सात साल पूरे हो चुके हैं, इसलिए उनकी आगे की हिरासत अवैध है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। मिशेल को दिसंबर 2018 में दुबई से भारत लाया गया था। उन्हें सीबीआई और ईडी मामलों में जमानत मिल चुकी है, लेकिन शर्तें पूरी न होने से वह अब भी जेल में हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने इंद्राणी मुखर्जी की विदेश जाने की नई याचिका ठुकराई, ट्रायल कोर्ट जाने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इंद्राणी मुखर्जी की विदेश यात्रा की अनुमति मांगने वाली नई याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि किसी भी राहत के लिए उन्हें ट्रायल कोर्ट का रुख करना होगा, जहां उनके खिलाफ मामला लंबित है।

न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने यह आदेश दिया। इंद्राणी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी पेश हुए और कहा कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने उनकी विदेश यात्रा याचिका गुण-दोष के आधार पर खारिज नहीं की थी, लेकिन इस बार मामले में तत्काल सुनवाई की जरूरत है। इस पर अदालत ने कहा कि पिछला आदेश सिर्फ उन्हें निचली अदालत जाने की स्वतंत्रता देने के लिए था, न कि सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के लिए। अदालत ने कहा कि यदि इंद्राणी ट्रायल कोर्ट में आवेदन देती हैं, तो उस पर चार सप्ताह के भीतर फैसला किया जाए।

गौरतलब है कि फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी विदेश यात्रा की मांग खारिज करते हुए कहा था कि उनके वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं है। शीना बोरा हत्याकांड में इंद्राणी पर अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या का आरोप है। इंद्राणी इन आरोपों से इनकार करती रही हैं। सभी आरोपी फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।

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त्वरित सुनवाई महत्वपूर्ण सांविधानिक अधिकार पर एनडीपीएस कानून में जमानत का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि त्वरित सुनवाई का अधिकार एक महत्वपूर्ण सांविधानिक अधिकार है, लेकिन इसे एनडीपीएस जैसे विशेष कानूनों में जमानत देने के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, खासकर जब मामला व्यावसायिक मात्रा में मादक पदार्थ की बरामदगी से जुड़ा हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह टिप्पणी पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से दो आरोपियों को दी गई जमानत को रद्द करते हुए की। यह मामला व्यावसायिक मात्रा में हेरोइन बरामद होने से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन एनडीपीएस कानून की धारा 37 के तहत निर्धारित शर्तों के भीतर ही इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे केवल देरी के आधार पर लागू कर विशेष कानून की शर्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 और एनडीपीएस कानून की धारा 37 को एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि संतुलन के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय धारा 37 की दो अनिवार्य शर्तों पर संतोष दर्ज नहीं किया, जो एक त्रुटि है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि हाईकोर्ट के आदेश में रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया। आरोपी ने स्वयं माना था कि उसके खिलाफ एक अन्य मामला भी दर्ज है, जबकि हाईकोर्ट ने उसे किसी अन्य मामले में शामिल न होने के आधार पर राहत दी। अदालत ने कहा कि यह तथ्यात्मक विरोधाभास आदेश को कमजोर बनाता है। साथ ही, हाईकोर्ट ने यह भी नहीं बताया कि यह दूसरी जमानत याचिका थी और पहले की याचिका वापस ले ली गई थी। ऐसे मामलों में अदालत को पहले की याचिका के परिणाम और बदली परिस्थितियों का उल्लेख करना जरूरी होता है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और आरोपियों को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
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न्यायिक अधिकारियों के घेराव में एनआईए को चार्जशीट दायर करने की सुप्रीम अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक अप्रैल को न्यायिक अधिकारियों के घेराव मामले की जांच पूरी होने पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को बंगाल की अदालत में आरोपपत्र दाखिल करने की अनुमति दे दी। इस घटना में एसआईआर ड्यूटी पर लगे सात न्यायिक अधिकारियों को भीड़ ने बंधक बनाया था।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ को एनआईए की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने बताया कि जांच एजेंसी ने अब तक की गई जांच का ब्योरा देते हुए एक नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है। पीठ ने कहा, एनआईए सक्षम कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल करने के लिए स्वतंत्र होगी। राजू के यह कहने के बाद कि जांचकर्ता जांच में व्यस्त हैं, पीठ ने एनआईए को फिलहाल मामले में कोई और स्थिति रिपोर्ट दाखिल न करने की अनुमति भी दी।

पीठ ने इससे पहले 13 अप्रैल को यह स्पष्ट कर दिया था कि प. बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में लगे न्यायिक अधिकारियों को प्रदान की गई सुरक्षा विधानसभा चुनाव के समापन तक बनी रहेगी और पूर्व अनुमति के बिना इसे वापस नहीं लिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एक पत्र का स्वतः संज्ञान लिया था, जिसमें 1 अप्रैल की रात की भयावह घटना का वर्णन था। इसमें तीन महिलाओं समेत 7 न्यायिक अधिकारियों और एक बच्चे को भीड़ ने नौ घंटे से अधिक समय तक बिना भोजन और पानी के बंधक बनाकर रखा था।  

35 साल बाद भी एक भी गवाही नहीं, कार्यवाही पर सुप्रीम रोक
यह देखते हुए कि 35 साल बीत जाने के बावजूद अब तक एक भी अभियोजन गवाह का बयान दर्ज नहीं किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रकरण न्याय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इतनी लंबी देरी अपने आप में ही मामले को समाप्त करने का आधार बन सकती है। हालांकि, अंतिम फैसला लेने से पहले अदालत ने राज्य सरकार का पक्ष सुनना जरूरी बताया है। पीठ ने उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया। सुनवाई 29 अप्रैल को होगी। यह याचिका पुलिस अधिकारी कैलाश चंद्र कापड़ी ने दायर की है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें आपराधिक कार्यवाही खत्म करने से इन्कार किया गया था।

कोर्ट को बताया गया कि मामले में पांच आरोपी थे। दो की मौत हो चुकी है, जबकि दो आरोपियों को बरी कर दिया गया, क्योंकि अभियोजन पक्ष कोई गवाह पेश नहीं कर सका। कापड़ी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा), 323 (मारपीट) व 504 (अपमान) के तहत आरोप हैं।  रेलवे अधिनियम की धारा 120 भी लागू है। यह मामला 1989 में प्रयागराज  में दर्ज हुआ था। 
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