SC Updates: कश्मीर फंडिंग मामले में 'सुप्रीम' फैसला, कारोबारी नवल किशोर की जमानत याचिका पर सुनवाई को सहमति
सुप्रीम कोर्ट ने यूएई में रहने वाले कारोबारी नवल किशोर कपूर की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी है। कपूर पर कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए फंडिंग का आरोप है। ऐसे में अब अदालत ने एनआईए से जवाब मांगा है।
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यूएई में रहने वाले कारोबारी नवल किशोर कपूर की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई। कपूर पर कश्मीर घाटी में अशांति फैलाने के लिए फंडिंग करने का आरोप है और उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज है। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को नोटिस जारी कर उसका जवाब मांगा है।
कपूर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल पिछले सात साल से ज्यादा समय से जेल में हैं और उन पर लगाए गए आतंक फंडिंग के आरोपों के ठोस सबूत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अभियोजन के मुताबिक कपूर ने कुछ पैसा जाहूर अहमद शाह वताली को दिया था, लेकिन वह पैसा बैंकों का कर्ज चुकाने में इस्तेमाल हुआ, न कि किसी आतंकी गतिविधि में।
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दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती
बता दें कि नवल किशोर कपूर ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि पहली नजर में यह साबित होता है कि कपूर ने विदेश से पैसा भारत लाने में मदद की, जिसका इस्तेमाल अलगाववादी और आतंकी गतिविधियों के लिए किया गया।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि यूएपीए के तहत जमानत के नियम काफी सख्त हैं और यदि आरोप पहली नजर में सही लगते हैं तो जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी थी कि लंबी सुनवाई के आधार पर जमानत दी जाए, यह कहते हुए कि ट्रायल तेजी से चल रहा है।
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जुलाई 2018 में किया गया था गिरफ्तारी
एनआईए के अनुसार, वर्ष 2017 में दर्ज मामले की जांच में पता चला कि अलगाववादी नेताओं ने हिंसा फैलाने और लोगों को उकसाने की साजिश रची थी। इस साजिश में विदेशों से हवाला नेटवर्क के जरिए पैसा लाया गया। इस मामले में लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद समेत कई लोगों के नाम सामने आए हैं। कपूर को जुलाई 2018 में गिरफ्तार किया गया था और जनवरी 2019 में चार्जशीट दाखिल की गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे की सुनवाई करेगा।
वक्फ न्यायाधिकरणों पर सुप्रीम कोर्ट
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वक्फ न्यायाधिकरणों का अधिकार क्षेत्र केवल उन संपत्तियों पर है जो औकाफ की सूची में अधिसूचित हैं या वक्फ अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं और दीवनी अदालतों को वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 85 के तहत स्वतः ही अधिकार क्षेत्र से वंचित नहीं किया जा सकता है।
अधिनियम की धारा 85 दीवानी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेशों या न्यायाधिकरण के समक्ष प्रारंभ की जा सकने वाली कार्यवाही के संबंध में किसी भी मुकदमे या कार्यवाही पर विचार करने से रोकती है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने वक्फ अधिनियम के तहत अपंजीकृत संपत्ति से संबंधित तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक फैसले को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि इसलिए, 1995 के अधिनियम की धारा 85 के तहत भी दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र का कोई पूर्ण और सर्वव्यापी निष्कासन नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति को वक्फ मानने का अधिकार न्यायाधिकरण के पास तभी होता है जब वह संपत्ति अधिनियम के तहत निर्दिष्ट वक्फ की सूची में शामिल हो।