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सुप्रीम कोर्ट में जनवरी 2019 में होगी रोहिंग्या शरणार्थियों पर आखिरी सुनवाई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 30 Nov 2018 11:00 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या शरणार्थियों पर जनवरी तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने आज रोहिंग्या पर सुनवई करते हुए मामले की आखिरी सुनवाई को जनवरी 2019 तक के लिए स्थगित कर दिया है।
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बता दें कि म्यांमार में सैन्य अत्याचार के बाद रोहिंग्या मुसलमानों ने बहुत तेजी से पलायन किया था। हजारों की संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश और भारत पहुंचे। रोहिंग्या मुस्लिमों ने भारत में शरण ली जिसका भारत सरकार ने विरोध किया और उन्हें भारत के लिए खतरा तक बताया। भारत ने देश में बसे 40,000 रोहिंग्या शरणार्थियों की 'घर वापसी' के प्रयास शुरू कर दिए हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि 'म्यांमार के नागरिकों' को उनके देश भेजा जाएगा।
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म्यांमार में उनके खिलाफ हिंसा के चलते बड़े पैमाने पर रोहिंग्याओं को भारत और बांग्लादेश के लिए पलायन करना पड़ा था। 25 अगस्त, 2017 को म्यांमार के रखाइन प्रांत में हिंसा से रोहिंग्याओं के पलायन की शुरुआत हुई थी। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन 6.5 लाख रोहिंग्या म्यांमार से पलायन कर गए थे।
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कौन हैं रोहिंग्या और क्यों किया था म्यांमार से पलायन
म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की करीब 10 लाख की आबादी को जनगणना में शामिल नहीं किया गया था। रिपोर्ट में इस 10 लाख की आबादी को मूल रूप से इस्लाम धर्म को मानने वाला बताया गया है। जनगणना में शामिल नहीं की गई आबादी को रोहिंग्या मुसलमान माना जाता है। इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। हालांकि वे पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहे हैं।
रखाइन स्टेट में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था।
रोहिंग्या एक मुस्लिम समुदाय है जो सुन्नी इस्लाम को मानता है और रखाइन राज्य में कई वर्षों से रहता आ रहा है। रखाइन म्यांमार के सबसे गरीब राज्यों में से एक है। पिछले साल म्यांमार सैन्य कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में रोहिंग्याओं ने वहां से पलायन किया था। रोहिंग्या पर काम कर रहे कुछ लोगों का मानना है कि रोहिंग्या की उत्पत्ति 15वीं सदी में हुई थी।
Supreme Court today adjourned the Rohingya case for final disposal in January 2019. pic.twitter.com/p5g08qKbr5
— ANI (@ANI) November 30, 2018