मुजफ्फरपुर बालिका गृह मामला: सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक
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मुजफ्फरपुर शेल्टर होम यौन उत्पीडन मामले की जांच केलिए सीबीआई के विशेष निदेशक को नई टीम का गठन करने के पटना हाईकोर्ट केआदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें पुरानी टीम को बदलने का कोई कारण नहीं दिखता क्योंकि वह टीम करीब 45 दिनों से जांच कर रही है और जांच टीम पर किसी तरह का आरोप भी नहीं है।
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मुजफ्फरपुर शेल्टर होम यौन उत्पीडन मामले की जांच केलिए सीबीआई के विशेष निदेशक को नई टीम का गठन करने के पटना हाईकोर्ट केआदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें पुरानी टीम को बदलने का कोई कारण नहीं दिखता क्योंकि वह टीम करीब 45 दिनों से जांच कर रही है और जांच टीम पर किसी तरह का आरोप भी नहीं है।
सनद रहे कि गत 29 अगस्त को पटना हाईकोर्ट ने सीबीआई के विशेष निदेशक को इस मामले की जांच के लिए नई टीम गठित करने का आदेश दिया था। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने इस चरण पर सीबीआई टीम में बदलाव करना जांच के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। पीठ ने कहा कि इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता।
नई टीम की कोई दरकार नहीं है वह भी यह देखते हुए कि उस टीम केखिलाफ किसी तरह का आरोप नहीं है। हाईकोर्ट को फिलहाल इस मामले की सुनवाई न करने का आग्रह करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर परीक्षण करने का निर्णय लिया है। पीठ गुरुवार को इस पर विस्तृत सुनवाई करेगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट यह भी तय करेगा कि उसे इस मामले की निगरानी करनी चाहिए या नहीं?
इससे पहले सुनवाई केदौरान सीबीआई की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि हमें पटना हाईकोर्ट के आदेश से बहुत परेशानी हो रही है। उन्होंने कहा कि सीबीआई निदेशक द्वारा बनाई गई टीम इस पूरे मामले की जांच कर रही है।
पिछले 45 दिनों से यह टीम जांच कर रही है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह फैसला विशेष निदेशक द्वारा नई जांच टीम बनाने का आदेश सही नहीं है। साथ ही सीबीआई पर अवमानना का खतरा भी मंडरा रहा है। वहीं सीबीआई केविशेष अभियोजन अधिकारी ने सीलबंद लिफाफे में जांच रिपोर्ट पीठ को सौंपी।
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उन्होंने यह भी कहा कि ये पचास लोग दूसरे पचास लोगों को बताएंगे और फिर वे दूसरे पचास लोगों को और यह सिलसिला चलता रहेगा। यानी पूरी तरह से पीड़िता की पहचान सार्वजनिक हो जाएगी। साथ ही उन्होंने कहा कि पीड़िता को किसी खास बोर्ड का टॉपर बताया जा हा है। टॉपर तो एक ही होता है न कि 10। रेवाड़ी एक छोटी जगह है, ऐसे में पीड़िता की पहचान आराम से की जाती है।
पीठ ने कहा कि आखिर मीडिया ऐसा कैसे कर सकती है। उन्होंने सवाल किया कि आखिर इस पर कैसे लगाम लगाया जा सकता है। आखिर इस तरह की खबरें प्रकाशित या प्रसारित करने वालों केखिलाफ क्यों नहीं कार्रवाई होनी चाहिए। पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से भी पूछा कि आखिर ऐसे मामलों को क्या किया जाना चाहिए? अटॉर्नी जनरल भी पीठ की बात से सहमत दिखे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा जाना चाहिए। हालांकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में किसी तरह का आदेश पारित नहीं किया।