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SC: '70 फीसदी एमबीबीएस इंटर्न्स को नहीं मिल रहा स्टाइपेंड', सुप्रीम कोर्ट ने एनएमसी से मांगा जवाब
Fri, 15 Sep 2023 11:17 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 15 Sep 2023 11:17 PM IST
सार
वकील ने बताया कि 70 प्रतिशत कॉलेज, मेडिकल छात्रों को वजीफा का भुगतान नहीं कर रहे हैं। जिस पर पीठ ने एनएमसी के वकील गौरव शर्मा को इस बयान पर हलफनामे के जरिए जवाब दाखिल करने के लिए कहा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने देश के 70 फीसदी मेडिकल कॉलेज के एमबीबीएस इंटर्न्स को स्टाइपेंड नहीं दिए जाने की शिकायत पर शुक्रवार को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने एनएमसी को एक सारणीबद्ध चार्ट दाखिल करने को कहा है। साथ ही यह बताने का भी निर्देश दिया कि क्या मेडिकल इंटर्न के लिए स्टाइपेंड को लेकर किए गए दावे सही हैं। साथ ही कोर्ट ने पूछा है कि इंटर्नशिप स्टाइपेंड के भुगतान के मानदंडों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एनएमसी क्या कदम उठा रही है?
मेडिकल इंटर्न ने दाखिल की याचिका
शीर्ष अदालत में एक मेडिकल इंटर्न ने दिल्ली स्थित आर्मी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसीएमएस) से स्टाइपेंड भुगतान की मांग वाली याचिका दाखिल की है। जिस पर एसीएमएस के वकील आर बालासुब्रमण्यम ने कहा कि कॉलेज सशस्त्र कर्मियों के बच्चों की सेवा के इरादे से सेना कल्याण शिक्षा सोसायटी (एडब्ल्यूईएस) की ओर से बिना किसी लाभ के आधार पर चलाए जाते हैं। वरिष्ठ वकील ने बताया कि संस्था को कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है। पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि एसीएमएस दो इंटर्न डॉक्टरों को स्टाइपेंड नहीं देता है। इस बिंदु पर एक वकील ने बताया कि 70 प्रतिशत कॉलेज, मेडिकल छात्रों को वजीफा का भुगतान नहीं कर रहे हैं। जिस पर पीठ ने एनएमसी के वकील गौरव शर्मा को इस बयान पर हलफनामे के जरिए जवाब दाखिल करने के लिए कहा।
वित्तीय बाधाएं वजीफे से मना करने का कारण नहीं हो सकतीं
पीठ ने कहा कि वित्तीय बाधाएं छात्रों को स्टाइपेंड देने से मना करने का कारण नहीं हो सकती हैं। सीजेआई ने कहा, 'क्या आप कह सकते हैं कि हम सफाई कर्मचारियों को भुगतान नहीं करेंगे क्योंकि हम गैर-लाभकारी हैं? यह आपके लिए लाभ है लेकिन यह उनके लिए आजीविका है। क्या आप कह सकते हैं कि हम शिक्षकों को भुगतान नहीं करेंगे? बिना वजीफे के हम युवा डॉक्टरों से काम कैसे ले सकते हैं? हर किसी को माता-पिता की तरफ से सहायता नहीं मिलती।'
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मेडिकल इंटर्न को हर महीने 25000 स्टाइपेंड अदा करने का निर्देश
बालासुब्रमण्यम ने कहा, संस्था का अस्तित्व भी एक एक सवाल है। उन्होंने पीठ को सूचित किया कि दिल्ली के राज्य शुल्क नियामक आयोग ने गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से संबद्ध इस मेडिकल कॉलेज की फीस 4,32,000 से घटाकर 3,20,000 रुपये कर दी है। इस बिंदु पर पीठ ने अन्य सरकारी कॉलेजों में भुगतान की जाने वाले स्टाइपेंड दरों की तुलना की और याचिकाकर्ताओं से पूछा कि वे कितनी उम्मीद कर रहे हैं। याचिकाकर्ता की वकील ने जवाब दिया कि 25,000 रुपये। जिसके बाद पीठ ने एसीएमएस को अक्तूबर से मेडिकल इंटर्न को बतौर स्टाइपेंड 25 हजार रुपये प्रति महीने का भुगतान शुरू करने का निर्देश दिया। फिलहाल कॉलेज में करीब 100 इंटर्न हैं। पीठ ने अपने आदेश में कहा, ’इंटर्नशिप की अवधि के दौरान इंटर्न को स्टाइपेंड का भुगतान करना आवश्यक है। एनएमसी के अपनाए गए नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।
एसीएमएस को दिल्ली शुल्क नियामक के पास जाने की छूट दी
सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि कॉलेज सेना के बच्चों के कल्याण के उपाय के रूप में चलाया जा रहा है और यह पूरी तरह से व्यावसायिक नहीं है। लिहाजा कोर्ट ने कॉलेज को अदालत के निर्देशों से संभावित वित्तीय प्रभाव के विवरण के साथ दिल्ली में शुल्क नियामक समिति से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी। अदालत ने आदेश दिया कि इस तरह के बयान के आधार पर, समिति यह निर्णय लेगी कि अतिरिक्त भुगतान को पूरा करने के लिए शुल्क में वृद्धि आवश्यक है या नहीं। कोर्ट ने यह रियायत इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए दी कि कॉलेज में फीस में काफी सब्सिडी दी जाती है।
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मेडिकल इंटर्न ने दाखिल की याचिका
शीर्ष अदालत में एक मेडिकल इंटर्न ने दिल्ली स्थित आर्मी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसीएमएस) से स्टाइपेंड भुगतान की मांग वाली याचिका दाखिल की है। जिस पर एसीएमएस के वकील आर बालासुब्रमण्यम ने कहा कि कॉलेज सशस्त्र कर्मियों के बच्चों की सेवा के इरादे से सेना कल्याण शिक्षा सोसायटी (एडब्ल्यूईएस) की ओर से बिना किसी लाभ के आधार पर चलाए जाते हैं। वरिष्ठ वकील ने बताया कि संस्था को कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है। पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि एसीएमएस दो इंटर्न डॉक्टरों को स्टाइपेंड नहीं देता है। इस बिंदु पर एक वकील ने बताया कि 70 प्रतिशत कॉलेज, मेडिकल छात्रों को वजीफा का भुगतान नहीं कर रहे हैं। जिस पर पीठ ने एनएमसी के वकील गौरव शर्मा को इस बयान पर हलफनामे के जरिए जवाब दाखिल करने के लिए कहा।
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वित्तीय बाधाएं वजीफे से मना करने का कारण नहीं हो सकतीं
पीठ ने कहा कि वित्तीय बाधाएं छात्रों को स्टाइपेंड देने से मना करने का कारण नहीं हो सकती हैं। सीजेआई ने कहा, 'क्या आप कह सकते हैं कि हम सफाई कर्मचारियों को भुगतान नहीं करेंगे क्योंकि हम गैर-लाभकारी हैं? यह आपके लिए लाभ है लेकिन यह उनके लिए आजीविका है। क्या आप कह सकते हैं कि हम शिक्षकों को भुगतान नहीं करेंगे? बिना वजीफे के हम युवा डॉक्टरों से काम कैसे ले सकते हैं? हर किसी को माता-पिता की तरफ से सहायता नहीं मिलती।'
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मेडिकल इंटर्न को हर महीने 25000 स्टाइपेंड अदा करने का निर्देश
बालासुब्रमण्यम ने कहा, संस्था का अस्तित्व भी एक एक सवाल है। उन्होंने पीठ को सूचित किया कि दिल्ली के राज्य शुल्क नियामक आयोग ने गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से संबद्ध इस मेडिकल कॉलेज की फीस 4,32,000 से घटाकर 3,20,000 रुपये कर दी है। इस बिंदु पर पीठ ने अन्य सरकारी कॉलेजों में भुगतान की जाने वाले स्टाइपेंड दरों की तुलना की और याचिकाकर्ताओं से पूछा कि वे कितनी उम्मीद कर रहे हैं। याचिकाकर्ता की वकील ने जवाब दिया कि 25,000 रुपये। जिसके बाद पीठ ने एसीएमएस को अक्तूबर से मेडिकल इंटर्न को बतौर स्टाइपेंड 25 हजार रुपये प्रति महीने का भुगतान शुरू करने का निर्देश दिया। फिलहाल कॉलेज में करीब 100 इंटर्न हैं। पीठ ने अपने आदेश में कहा, ’इंटर्नशिप की अवधि के दौरान इंटर्न को स्टाइपेंड का भुगतान करना आवश्यक है। एनएमसी के अपनाए गए नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।
एसीएमएस को दिल्ली शुल्क नियामक के पास जाने की छूट दी
सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि कॉलेज सेना के बच्चों के कल्याण के उपाय के रूप में चलाया जा रहा है और यह पूरी तरह से व्यावसायिक नहीं है। लिहाजा कोर्ट ने कॉलेज को अदालत के निर्देशों से संभावित वित्तीय प्रभाव के विवरण के साथ दिल्ली में शुल्क नियामक समिति से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी। अदालत ने आदेश दिया कि इस तरह के बयान के आधार पर, समिति यह निर्णय लेगी कि अतिरिक्त भुगतान को पूरा करने के लिए शुल्क में वृद्धि आवश्यक है या नहीं। कोर्ट ने यह रियायत इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए दी कि कॉलेज में फीस में काफी सब्सिडी दी जाती है।