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आर्थिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा केंद्र से जवाब

Fri, 08 Feb 2019 12:54 PM IST
Shani Mishra भाषा, नई दिल्ली
भाषा, नई दिल्ली Published by: Shani Mishra Updated Fri, 08 Feb 2019 12:54 PM IST
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Supreme court seeks reply from central govt in 10 percent reservation to ews
supreme court

सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के केन्द्र के निर्णय को चुनौती देने वाली एक नई याचिका पर केन्द्र से शुक्रवार को जवाब मांगा है।

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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरियों और दाखिले में आरक्षण देने के केन्द्र के फैसले पर कोई रोक नहीं लगाई जाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट इससे पहले इसी प्रकार की याचिकाओं पर केन्द्र को नोटिस जारी कर चुका है। उसने तहसीन पूनावाला की ओर से दाखिल नयी याचिका को लंबित याचिकाओं में जोड़ने का शुक्रवार को आदेश दिया। 
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केन्द्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं जनहित अभियान और एनजीओ यूथ फॉर इक्वेलिटी सहित अनेक पक्षकारों ने दाखिल की हैं।

यूथ फॉर इक्वेलिटी ने अपनी याचिका में विधेयक को रद्द करने की मांग की है। एनजीओ के अध्यक्ष कौशल कांत मिश्रा की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि आरक्षण के लिए केवल आर्थिक कसौटी ही आधार नहीं हो सकता और यह विधेयक संविधान के बुनियादी नियमों का उल्लंघन करता है। क्योंकि आर्थिक आधार पर आरक्षण तक ही सीमित नहीं किया जा सकता और कुल 50 प्रतिशत की सीमा को भी पार नहीं किया जा सकता।

वहीं व्यावसायी पूनावाला की ओर से दाखिल नयी याचिका में विधेयक को रद्द करने की मांग करते हुए कहा गया है कि आरक्षण के लिए पिछड़ेपन को केवल आर्थिक स्थिति से परिभाषित नहीं किया जा सकता।


याचिकाओं में संविधान संशोधन (103वां संशोधन) अधिनियम, 2019 की वैधता को चुनौती दी गई है, जिसे संसद के दोनों सदनों ने बतौर 124वें संविधान संशोधन विधेयक, 2019 के तौर पर पारित किया था। याचिकाओं में अनुच्छेद-15(6) और 16 (6) जोड़े जाने को संविधान के मूल ढांचे में बदलाव बताया गया है। साथ ही इसके जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्फल करने की भी कोशिश का आरोप लगाया गया है।

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