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सुप्रीम कोर्ट ने भूषण और तेजपाल के खिलाफ 2009 के अवमानना मामले में अटॉर्नी जनरल से मदद मांगी

Thu, 10 Sep 2020 03:36 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Thu, 10 Sep 2020 03:36 PM IST
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Supreme Court seeks help from Attorney General in 2009 contempt case against Prashant Bhushan and Tarun Tejpal
प्रशांत भूषण (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना के एक मामले में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से मदद मांगी है। शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण और पत्रकार तरुण तेजपाल के खिलाफ लंबित 2009 के अवमानना मामले में गुरुवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से मदद करने का अनुरोध किया।

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कोर्ट ने तहलका पत्रिका में प्रकाशित साक्षात्कार में उच्चतम न्यायालय के कुछ तत्कालीन पीठासीन और पूर्व न्यायाधीशों पर कथित रूप से लांछन लगाने को लेकर भूषण और तेजपाल को नवंबर 2009 में अवमानना के नोटिस जारी किए थे। तेजपाल उस वक्त इस पत्रिका के संपादक थे।
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न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई के लिए यह मामला आया। भूषण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि इस मामले में कानून के बड़े सवालों पर विचार होना है और ऐसी स्थिति में इसमें अटॉर्नी जनरल की मदद की जरूरत होगी।
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धवन ने कहा कि ‘हम चाहते हैं कि हमारे द्वारा दिए गए सवालों पर अटॉर्नी जनरल इस न्यायालय की मदद करें। न्यायालय ने भी कुछ सवाल तैयार किए हैं।’ इस मामले में विचार के लिए उन्होंने कुछ सवाल दिए थे।

पीठ ने निर्देश दिया कि इसका सारा रिकॉर्ड अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को दिया जाए और इसके साथ ही अवमानना के इस मामले को 12 अक्तूबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया।

शीर्ष अदालत ने अवमानना के एक अन्य मामले में दोषी ठहराए गए अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर 31 अगस्त को एक रुपये का सांकेतिक जुर्माना लगाया था। यह मामला प्रशांत भूषण के न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक दो ट्वीट का था, जिसमें न्यायालय ने कहा था कि उन्होंने न्याय प्रशासन की संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया था।

न्यायालय ने 2009 का अवमानना मामला 25 अगस्त को किसी दूसरी पीठ को भेजने का निश्चय किया था जिसे अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायपालिका के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित व्यापक सवालों पर विचार करना है।

धवन ने न्यायालय से कहा था कि उन्होंने संवैधानिक महत्व के 10 सवाल उठाए हैं जिन पर संविधान पीठ द्वारा विचार करने की आवश्यकता है।

इस मामले की न्यायालय ने समय के अभाव की वजह से 25 अगस्त को सुनवाई नहीं की थी क्योंकि पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा दो सितंबर को सेवानिवृत्त हो रहे थे।

इस मामले में उठाए गए सवालों पर अटॉर्नी जनरल की मदद लेने के धवन के आग्रह से पीठ सहमत नहीं थी और उसने कहा था कि बेहतर होगा कि इसे प्रधान न्यायाधीश द्वारा गठित की जाने वाली नई पीठ पर छोड़ दिया जाए।

शीर्ष अदालत ने 17 अगस्त को इस मामले में कुछ सवाल तय किए थे और संबंधित पक्षों से इन तीन सवालों पर विचार के लिए कहा था। ये सवाल थे- क्या न्यायाधीशों और न्यायपालिका के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी बयान दिए जा सकते हैं, किन परिस्थितियों में दिए जा सकते हैं और पीठासीन तथा सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के मामले में क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।


भूषण ने भी अपने 10 सवाल दाखिल किए थे और इन पर संविधान पीठ द्वारा विचार करने का अनुरोध किया था। भूषण के सवालों में शामिल था कि ‘क्या न्यायपालिका के किसी भी क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बारे में वास्तविक राय व्यक्त करना न्यायालय की अवमानना माना जाएगा? क्या इस तरह की राय व्यक्त करने वाले व्यक्ति को इसे सही साबित करना होगा या अपनी राय को वास्तविक बताना ही पर्याप्त होगा।’

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