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सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब, आर्मी सर्विस कोर के अफसर को विद्रोही गतिविधि दबाने के लिए क्यों भेजा
एजेंसी, नई दिल्ली
Updated Wed, 11 Oct 2017 01:54 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
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सेना में गैर युद्ध भूमिका के लिए बहाल किए गए एक अफसर ने युद्ध क्षेत्र में अपनी पोस्टिंग को चुनौती दी है। इस अफसर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पूछा है कि जब उसकी भर्ती गैर युद्ध भूमिका के लिए की गई है तो दुश्मन से लड़ने के लिए उसकी पोस्टिंग ऑपरेशनल इलाके में क्यों की जानी चाहिए। अफसर की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है।
जस्टिस आर एस नरीमन और जस्टिस एस के कौल की बेंच ने इस मामले में सरकार को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है।
दरअसल आर्मी सर्विस कोर (एएससी) के मेजर आमोद कुमार ने एक याचिका दायर कर विद्रोही गतिविधियों को काबू करने वाली यूनिट राष्ट्रीय राइफल्स में तैनाती का विरोध किया था।
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दरअसल आमोद के प्रमोशन पर विचार करते समय सेना ने उसे गैर युद्ध भूमिका वाले सैनिकों की श्रेणी में रखा था। आमोद ने कहा था सेना दोहरा रुख नहीं अपना सकती। आर्मी सर्विस कोर के अफसर को उपद्रव को शांत करने के लिए ऑपरेशन में भेजा जाता है लेकिन प्रमोशन देने के वक्त उसे ‘नॉन ऑपरेशनल’ करार दिया जाता है।
अफसर की याचिका में कहा गया है कि सर्विसेज के अफसरों को ऑपरेशनल इलाकों में तैनात किया जाता है इस के बावजूद कि सेना उसे नॉन ऑपरेशनल कैटगरी में रखती है।
याचिका में कहा गया है कि उसे ऑपरेशनल एरिया में भेजा जाना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है और इससे स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत का भी उल्लंघन होता है।
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जस्टिस आर एस नरीमन और जस्टिस एस के कौल की बेंच ने इस मामले में सरकार को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है।
दरअसल आर्मी सर्विस कोर (एएससी) के मेजर आमोद कुमार ने एक याचिका दायर कर विद्रोही गतिविधियों को काबू करने वाली यूनिट राष्ट्रीय राइफल्स में तैनाती का विरोध किया था।
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दरअसल आमोद के प्रमोशन पर विचार करते समय सेना ने उसे गैर युद्ध भूमिका वाले सैनिकों की श्रेणी में रखा था। आमोद ने कहा था सेना दोहरा रुख नहीं अपना सकती। आर्मी सर्विस कोर के अफसर को उपद्रव को शांत करने के लिए ऑपरेशन में भेजा जाता है लेकिन प्रमोशन देने के वक्त उसे ‘नॉन ऑपरेशनल’ करार दिया जाता है।
अफसर की याचिका में कहा गया है कि सर्विसेज के अफसरों को ऑपरेशनल इलाकों में तैनात किया जाता है इस के बावजूद कि सेना उसे नॉन ऑपरेशनल कैटगरी में रखती है।
याचिका में कहा गया है कि उसे ऑपरेशनल एरिया में भेजा जाना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है और इससे स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत का भी उल्लंघन होता है।