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SC: 'पहली शादी कानूनी तौर पर कायम है, तो भी महिला दूसरे पति से भरण-पोषण पाने की हकदार', सुप्रीम कोर्ट का आदेश
Sat, 08 Feb 2025 01:05 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 08 Feb 2025 01:05 PM IST
सार
याचिकाकर्ता महिला साल 2005 में अपने पहले पति से अलग हो गई थी। दोनों ने आधिकारिक तौर पर तलाक नहीं लिया और एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर अपना रिश्ता खत्म कर लिया। इसके बाद महिला ने साल 2005 में ही पड़ोस में रहने वाले एक अन्य युवक से शादी कर ली।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि 'एक महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने दूसरे पति से भरण-पोषण पाने की हकदार होगी, भले ही उसका पिछला विवाह कानूनी रूप से कायम हो'। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि भरण-पोषण जैसे सामाजिक कल्याण प्रावधानों की व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए ताकि इनका मानवीय उद्देश्य विफल न होने पाए।
क्या है पूरा मामला
सर्वोच्च न्यायालय ने एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता महिला साल 2005 में अपने पहले पति से अलग हो गई थी। दोनों ने आधिकारिक तौर पर तलाक नहीं लिया और एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर अपना रिश्ता खत्म कर लिया। इसके बाद महिला ने साल 2005 में ही पड़ोस में रहने वाले एक अन्य युवक से शादी कर ली। हालांकि दोनों के बीच कुछ दिनों बाद ही मतभेद हो गए और दोनों ने शादी रद्द करने की मांग की, जिसे फरवरी 2006 में एक पारिवारिक अदालत ने मंजूरी दे दी। हालांकि कुछ समय बाद दोनों के बीच फिर सुलह हो गई और दोनों ने फिर से शादी कर ली। दोनों की शादी हैदराबाद में पंजीकृत में हुई।
साल 2008 में दंपति की बेटी का जन्म हुआ। बेटी के जन्म के बाद दोनों के बीच फिर से विवाद हुआ और महिला ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज करा दिया। महिला ने अपने और अपनी बेटी के लिए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पति से भरण पोषण की मांग की। पारिवारिक अदालत ने भरण पोषण की मांग को जायज माना, लेकिन पारिवारिक अदालत के फैसले को पति ने तेलंगाना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पति के पक्ष में फैसला सुनाया और भरण पोषण देने का आदेश रद्द कर दिया।
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उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट में महिला के दूसरे पति ने कहा कि उसकी पत्नी की पहली शादी अभी भी कानूनी रूप से मान्य है, ऐसे में महिला को उसकी कानूनी पत्नी नहीं माना जा सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दलील खारिज करते हुए दूसरे पति को महिला और उसकी बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
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क्या है पूरा मामला
सर्वोच्च न्यायालय ने एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिकाकर्ता महिला साल 2005 में अपने पहले पति से अलग हो गई थी। दोनों ने आधिकारिक तौर पर तलाक नहीं लिया और एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर अपना रिश्ता खत्म कर लिया। इसके बाद महिला ने साल 2005 में ही पड़ोस में रहने वाले एक अन्य युवक से शादी कर ली। हालांकि दोनों के बीच कुछ दिनों बाद ही मतभेद हो गए और दोनों ने शादी रद्द करने की मांग की, जिसे फरवरी 2006 में एक पारिवारिक अदालत ने मंजूरी दे दी। हालांकि कुछ समय बाद दोनों के बीच फिर सुलह हो गई और दोनों ने फिर से शादी कर ली। दोनों की शादी हैदराबाद में पंजीकृत में हुई।
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साल 2008 में दंपति की बेटी का जन्म हुआ। बेटी के जन्म के बाद दोनों के बीच फिर से विवाद हुआ और महिला ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज करा दिया। महिला ने अपने और अपनी बेटी के लिए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पति से भरण पोषण की मांग की। पारिवारिक अदालत ने भरण पोषण की मांग को जायज माना, लेकिन पारिवारिक अदालत के फैसले को पति ने तेलंगाना उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पति के पक्ष में फैसला सुनाया और भरण पोषण देने का आदेश रद्द कर दिया।
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उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट में महिला के दूसरे पति ने कहा कि उसकी पत्नी की पहली शादी अभी भी कानूनी रूप से मान्य है, ऐसे में महिला को उसकी कानूनी पत्नी नहीं माना जा सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दलील खारिज करते हुए दूसरे पति को महिला और उसकी बेटी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया।