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Supreme Court: डीएनए जांच से पिता का पता लगाने की अनुमति देते समय गोपनीयता अहम, केरल के केस में अदालत का फैसला

Wed, 29 Jan 2025 02:55 AM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 29 Jan 2025 02:55 AM IST
सार

पीठ ने कहा, जबरदस्ती डीएनए परीक्षण कराने से किसी व्यक्ति का निजी जीवन बाहरी दुनिया के छिद्रान्वेषण के दायरे में आ जाएगा। यह छिद्रान्वेषण, खासकर विवाहेतर संबंधों के मामलों में कठोर हो सकती है और समाज में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है। 

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Supreme Court says privacy violations need to taken account while allowing paternity testing through DNA test
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डीएनए परीक्षण से किसी के पितृत्व की जांच की अनुमति देते समय, अदालतों को बच्चे और माता-पिता की निजता के उल्लंघन के प्रति सचेत रहना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने केरल के एक व्यक्ति के पितृत्व संबंधी दो दशक पुराने विवाद का पटाक्षेप करते हुए यह प्रक्रिया तय की कि अदालत पितृत्व का पता लगाने के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश कब दे सकती है।

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पीठ ने कहा, जबरदस्ती डीएनए परीक्षण कराने से किसी व्यक्ति का निजी जीवन बाहरी दुनिया के छिद्रान्वेषण के दायरे में आ जाएगा। यह छिद्रान्वेषण, खासकर विवाहेतर संबंधों के मामलों में कठोर हो सकती है और समाज में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती है। यह भी हो सकता है कि किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके सामाजिक और व्यावसायिक जीवन को भी प्रभावित करे। पीठ ने कहा कि हितों में संतुलन होना चाहिए और कोर्ट को डीएनए परीक्षण की प्रमुख आवश्यकता जांचनी चाहिए।
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पीठ ने कहा, एक ओर, अदालतों को यह मूल्यांकन कर पक्षों की निजता और गरिमा के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए कि क्या उनमें से किसी एक को ‘नाजायज’ घोषित किए जाने से सामाजिक कलंक के कारण उन्हें असंगत नुकसान होगा। दूसरी ओर, बच्चे के वैध हित का आकलन करना चाहिए कि क्या उसके जैविक पिता को जानना व डीएनए परीक्षण की अत्यधिक जरूरत है। पीठ ने कहा कि अवैध संबंधों से जन्मे बच्चे से जुड़े सामाजिक कलंक का प्रभाव माता-पिता के जीवन में भी आ जाता है क्योंकि कथित बेवफाई के कारण छिद्रान्वेषण हो सकता है। अदालतों को इस बात से भी अवगत रहना चाहिए कि ऐसे छिद्रान्वेषण का अन्य संबंधित हितधारकों, विशेषकर महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसमें कहा गया है कि किसी विवाहिता की निष्ठा पर संदेह जताने से उसकी प्रतिष्ठा, सामाजिक स्तर व गरिमा नष्ट हो जाएगी। उसे अपमानित किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने गुजारा भत्ता के भुगतान के लिए बच्चे (अब वयस्क) के पितृत्व का पता लगाने के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश देने के केरल उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण से सहमत होने से इन्कार कर दिया। 
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ये है मामला
इस मामले में महिला ने शादी के 12 साल बाद बेटे को जन्म दिया। बेटे के जन्म के दो साल बाद उसका पति से तलाक हो गया। बाद में महिला ने कोच्चि नगर निगम में आवेदन देकर बच्चे के पिता का नाम बदलने का आग्रह किया। महिला का कहना था कि उसका बेटा उसके विवाहेतर संबंध से हुआ है और उसका पूर्व पति बच्चे का पिता नहीं है। हालांकि निगम ने बिना कोर्ट के आदेश के नाम बदलने से इन्कार कर दिया। महिला और उसके बच्चे ने इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई आरंभ की। ट्रायल कोर्ट से विवाहेतर संबंध वाले पुरूष के डीएनए टेस्ट का आदेश दिया ताकि बच्चे का पितृत्व स्थापित हो सके। हालांकि संबंधित व्यक्ति ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी और हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872 की धारा 112 का हवाला देते हुए डीएनए जांच से मना कर दिया।  


बच्चे को गुजारा भत्ता देने के लिए डीएनए टेस्ट की मांग मानी
बाद में बच्चे ने इस आधार पर हाईकोर्ट से राहत की मांग की कि वह जन्म से बीमार रहता है और उसका विधिक पिता इलाज का खर्च नहीं उठा रहा। ऐसे में उसके जैविक पिता को खर्च उठाते हुए गुजारा भत्ता देना चाहिए क्योंकि यह उसकी जिम्मेदारी है। हाईकोर्ट ने यह तर्क मानते हुए कथित जैविक पिता को डीएनए कराने का आदेश दिया।

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